दिल्ली प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड पत्रकारों के संगठन हैं। इनका उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना और पत्रकारों के अधिकारों की हिफाजत करना होना चाहिए, न कि किसी वैचारिक खेमे की। जब कोई पत्रकार परेशानी में हो, तो संगठन को उसकी विचारधारा देखे बिना आवाज उठानी चाहिए। लेकिन व्यवहार में अक्सर ऐसा नहीं होता।
क्विंट, वायर, कारवां या कुछ यूट्यूब चैनलों से जुड़े पत्रकारों पर जब कोई कार्रवाई होती है, तो प्रेस क्लब बेचैन हो जाता है। वहीं अर्णब गोस्वामी, अशोक श्रीवास्तव, मनीष कश्यप या रचित जैसे दर्जनों पत्रकारों पर हमले, गिरफ्तारी या पुलिस कार्रवाई हुई, तो ये संगठन चुप रहे। कुछ सदस्यों ने तो मजाक भी उड़ाया।
यह दोहरा मापदंड संगठन की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। देश के प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे 140 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री बनकर काम करें, किसी एक वर्ग के नहीं। उसी तर्क से प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड से भी अपेक्षा है कि वे कुछ हजार पत्रकारों की नुमाइंदगी करते हुए भी सबके लिए समान रूप से काम करें। अपने लोगों के प्रति झुकाव स्वाभाविक है, लेकिन संगठन का कर्तव्य व्यक्तिगत झुकाव से ऊपर होना चाहिए।
अगर प्रेस क्लब सचमुच पत्रकारों का संगठन है, तो उसे विचारधारा के आधार पर पत्रकारों को ‘अपना’ और ‘पराया’ नहीं बांटना चाहिए। हर पत्रकार की सुरक्षा और सम्मान उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी विचारधारा का हो। भविष्य में जब भी कोई पत्रकार परेशानी में आए, तो संगठन को एक स्वर में आवाज उठानी चाहिए। तभी वह अपनी भूमिका को सही मायने में निभा पाएगा और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा कर पाएगा।



