राहुल गांधी की कांग्रेस: जनता को भाषण नहीं, सरकार चलाने का भरोसा चाहिए

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दिल्ली । क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस हमेशा विपक्ष की राजनीति करती रहेगी, या कभी सत्ता पक्ष की अगली कतार यानी ट्रेजरी बेंच तक पहुंचने का सपना भी देखेगी?
क्या कांग्रेस का मकसद सिर्फ मोदी सरकार को घेरना है, या देश की बागडोर संभालने की तैयारी भी है?
क्या वह चुनाव जीतने वाली पार्टी बनेगी या चुनाव हारकर सवाल पूछने वाली पार्टी बनकर रह जाएगी?
ये सवाल आज कांग्रेस के सामने खड़े हैं। 2029 की लड़ाई अभी दूर है, लेकिन तैयारी का वक्त आ चुका है। कांग्रेस को तय करना होगा कि उसे स्थायी विपक्ष बनना है या सत्ता की मजबूत दावेदार।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर वापसी के संकेत दिए। 2019 में उसे सिर्फ 52 सीटें मिली थीं। यह निश्चित रूप से राहत की खबर थी। कार्यकर्ताओं में उत्साह लौटा और राहुल गांधी को विपक्ष के एक मजबूत चेहरे के रूप में पहचान मिली। लेकिन सीटें बढ़ना और संगठन का मजबूत होना दो अलग बातें हैं। चुनावी कामयाबी सत्ता की गारंटी नहीं होती।
पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “कांग्रेस को अब शिकायतों की राजनीति से आगे बढ़ना होगा। मोदी सरकार की आलोचना जरूरी है, लेकिन केवल आलोचना से देश नहीं चलता। जनता महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट और आर्थिक असमानता से परेशान है। उसे यह जानना है कि कांग्रेस इन समस्याओं का इलाज क्या करेगी।”

कांग्रेस को बताना होगा कि सत्ता में आने पर कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए क्या करेगी। सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि मौजूदा सरकार नाकाम है। जनता पूछेगी, आप क्या बेहतर करेंगे? हर बड़े वादे के साथ समयसीमा, बजट और जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ता विद्या झा कहती हैं, “देश का नौजवान डिग्रियां लेकर घूम रहा है। सरकारी भर्तियां अटकी हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियां हैं। छोटे उद्योग दम तोड़ रहे हैं। कांग्रेस को रोजगार का ठोस ब्लूप्रिंट देना होगा। पर्यटन, विनिर्माण, कृषि आधारित उद्योग और छोटे कारोबार रोजगार के बड़े स्रोत बन सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीक से डरने के बजाय युवाओं को इनके लिए तैयार करना होगा।”

दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर चुनाव नहीं जीते जाते। गांव, कस्बे और बूथ जीतने पड़ते हैं। कांग्रेस को बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की जरूरत है। गुटबाजी, चाटुकारिता और दरबारी संस्कृति से छुटकारा पाना होगा। टिकट वफादारी देखकर नहीं, जीतने की क्षमता और जनाधार देखकर मिलने चाहिए। चुनाव हारने वाले नेताओं की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और राष्ट्रीय जनता दल जैसे सहयोगियों को छोटा भाई समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। क्षेत्रीय दलों की अपनी ताकत और जनाधार है। गठबंधन अहंकार से नहीं, आपसी सम्मान से चलता है। सीटों के बंटवारे पर आखिरी समय तक खींचतान और सार्वजनिक बयानबाजी से बचना होगा।

क्या कांग्रेस के पास राहुल गांधी के अलावा भी भरोसेमंद चेहरे हैं? अर्थव्यवस्था कौन संभालेगा? विदेश नीति, रक्षा, कृषि, शिक्षा और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी किसे मिलेगी? जनता को केवल एक नेता का चेहरा नहीं, पूरी टीम चाहिए। कांग्रेस को अनुभवी और सक्षम नेताओं की टोली सामने रखनी होगी। देश को यह भरोसा होना चाहिए कि सत्ता मिलने पर सरकार चलाने वाले लोग तैयार बैठे हैं।

मुफ्त सुविधाओं के वादे करना आसान है, लेकिन सरकारी खजाना कोई अलादीन का चिराग नहीं। किसानों की आमदनी कैसे बढ़ेगी? महंगाई पर लगाम कैसे लगेगी? छोटे उद्योगों को राहत कहां से मिलेगी? निजी निवेश कैसे बढ़ेगा? इन सवालों के व्यावहारिक जवाब देने होंगे।

चीन, पाकिस्तान, आतंकवाद और सीमाओं की सुरक्षा गंभीर विषय हैं। इन पर राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा जरूरी स्पष्ट नीति है। रक्षा आधुनिकीकरण, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर कांग्रेस को अपना नजरिया बताना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक अखाड़ा बनाने से बचना चाहिए।

सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता जरूरी हैं। संविधान की रक्षा का दावा तभी सार्थक होगा, जब उसके मूल्य व्यवहार में दिखाई दें।

जनता को भारी-भरकम भाषण नहीं, सीधी और सरल भाषा चाहिए। सोशल मीडिया पर शोर मचाने से जनाधार नहीं बढ़ता। नेताओं को गांवों और कस्बों में जाकर लोगों की सुननी होगी। पार्टी के भीतर भी असहमति की जगह होनी चाहिए। हां में हां मिलाने वाले दरबारी नेताओं से घिरे रहना किसी भी नेतृत्व के लिए खतरनाक है। सच्चाई अक्सर चापलूसी की दीवार के बाहर खड़ी मिलती है।

कांग्रेस को साबित करना होगा कि पार्टी किसी एक परिवार की जागीर नहीं है। नेतृत्व का रास्ता योग्यता, मेहनत और जनसमर्थन से खुलना चाहिए। आंतरिक लोकतंत्र केवल संविधान में दर्ज शब्द नहीं, पार्टी की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली में दिखना चाहिए। कांग्रेस को अपने पुराने शासनकाल का हिसाब भी देना होगा। भ्रष्टाचार के आरोपों, प्रशासनिक विफलताओं और गलत आर्थिक फैसलों पर सफाई देनी होगी। जो दूसरों से हिसाब मांगता है, उसे अपना बहीखाता भी खोलना चाहिए।

कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि विपक्ष की राजनीति और शासन की राजनीति में जमीन-आसमान का फर्क है। विपक्ष सवाल पूछता है, सरकार को जवाब देना पड़ता है। विपक्ष वादे करता है, सरकार को उन्हें पूरा करना पड़ता है। विपक्ष गलतियों पर उंगली उठाता है, सरकार को खुद गलती करने से बचना पड़ता है।
2029 का चुनाव कांग्रेस के लिए एक और इम्तिहान होगा। सवाल केवल कितनी सीटें मिलेंगी, यह नहीं है। असली सवाल है कि क्या पार्टी जनता को वैकल्पिक सरकार का भरोसा दे पाएगी?

कांग्रेस को अब तय करना है कि वह इतिहास की पार्टी बनकर रहना चाहती है या भविष्य की सरकार बनना चाहती है।
लोकतंत्र में विपक्ष होना जरूरी है, लेकिन किसी बड़ी पार्टी का स्थायी विपक्ष बन जाना उसकी राजनीतिक नाकामी है। जनता को कांग्रेस से सिर्फ मोदी का विकल्प नहीं चाहिए। उसे एक ऐसी सरकार का भरोसा चाहिए, जो देश चला सके।
आखिर सवाल यही है: राहुल गांधी की कांग्रेस सत्ता के दरवाजे पर दस्तक देगी या विपक्ष की बेंच पर बैठकर अगली पीढ़ी को भी इंतजार कराएगी?

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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