सुप्रीम कोर्ट की दोटूक टिप्पणी: विरोध के नाम पर सार्वजनिक जगहों पर अनिश्चितकालीन कब्जा नहीं चलेगा,

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दिल्ली । क्या लोकतंत्र में धरना देने का मतलब सड़क, मैदान और सार्वजनिक जगहों पर अनिश्चितकालीन कब्जा है? क्या एक संगठन की आवाज इतनी बुलंद हो सकती है कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी दबकर रह जाए? और क्या विरोध के नाम पर दूसरों के अधिकारों को कुचलना भी लोकतांत्रिक आजादी कहलाएगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इसी पेचीदा सवाल पर अहम टिप्पणियां कीं। दिल्ली के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर लंबे समय से चल रहे प्रदर्शनों के संदर्भ में अदालत ने साफ संकेत दिया कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार असीमित नहीं हो सकता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि निर्धारित धरना स्थलों पर भी कोई संगठन अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं जमा सकता। आखिर एक ही संगठन को हमेशा वहां बैठे रहने का अधिकार कैसे मिल सकता है?
मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि अगर एक समूह किसी धरना स्थल पर स्थायी डेरा डाल दे, तो किसान, पत्रकार, मजदूर संगठन और दूसरे नागरिक अपनी आवाज कहां उठाएंगे?
अदालत की टिप्पणी का सीधा मतलब है कि सार्वजनिक धरना स्थलों पर सबका बराबर हक है। कोई भी संगठन किसी मैदान को अपनी जागीर नहीं बना सकता। धरना देने की अनुमति भी निश्चित अवधि के लिए होनी चाहिए।
यह लोकतंत्र के लिए एक अहम संदेश है। विरोध का अधिकार जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति पर अनिश्चितकालीन कब्जे का अधिकार किसी को नहीं मिल सकता।

यह मामला दिल्ली के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर लंबे समय से चल रहे प्रदर्शनों से जुड़ा है। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध कर रहे हैं।
किराना कमेटी दिल्ली, दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन और अन्य व्यापारिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
इनका कहना है कि लंबे धरनों से आसपास के व्यापारिक इलाकों में कारोबार प्रभावित हो रहा है। दुकानदारों, कर्मचारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और रोज कमाकर खाने वाले लोगों की आजीविका पर चोट पड़ रही है।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अधिवक्ता जय अनंत देहराई ने व्यापारिक संगठनों की तरफ से अदालत में पक्ष रखा।
व्यापारियों का सवाल जायज है। बाजार में ग्राहक नहीं आएगा, तो दुकानदार क्या बेचेगा? दुकान बंद होगी, तो कर्मचारी की तनख्वाह कहां से आएगी? गाड़ी नहीं चलेगी, तो चालक घर कैसे चलाएगा?
बात सिर्फ दुकानदार की नहीं है। बाजार की एक छोटी-सी दुकान से लेकर ट्रांसपोर्टर, मजदूर, ठेलेवाला और घरेलू कामगार तक सबकी रोजी-रोटी जुड़ी होती है।

इस मामले में दो महत्वपूर्ण अधिकार आमने-सामने दिखाई देते हैं।
एक तरफ संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने का अधिकार देता है। दूसरी तरफ नागरिकों को अपना कारोबार करने और आजीविका कमाने का अधिकार भी हासिल है।
क्या एक अधिकार की रक्षा के नाम पर दूसरे अधिकार का गला घोंटा जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां इसी संतुलन की जरूरत बताती हैं। अदालत ने धरना-प्रदर्शन पर रोक लगाने की बात नहीं कही है। उसने सवाल उठाया है कि विरोध की आजादी की भी कुछ वाजिब हदें होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि प्रदर्शन आयोजित करने वाले संबंधित संगठनों को भी मुकदमे में पक्षकार बनाया जाए। अदालत का मानना है कि सभी संबंधित पक्षों को सुनना जरूरी है।
इसका मतलब है कि मामला अभी विचाराधीन है। अदालत ने न तो धरनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है और न ही अंतिम फैसला सुनाया है।
सुनवाई के दौरान पुलिस कार्रवाई, हिरासत और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से जुड़े दूसरे मुद्दे भी सामने आए हैं। इन पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का असर दिल्ली से बाहर भी पड़ सकता है। देशभर में धरना-प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल पर नई बहस छिड़ सकती है।
सरकार और प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। धरना स्थलों की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए। सभी संगठनों को बराबर मौका मिले। समय सीमा तय हो और बाजार, अस्पताल, यातायात तथा आम नागरिकों की जिंदगी बेवजह अस्त-व्यस्त न हो।
लेकिन सरकारें भी इस फैसले की आड़ में विरोध की आवाज दबाने की कोशिश न करें। असहमति लोकतंत्र की जान है। सत्ता से सवाल पूछना कोई गुनाह नहीं।
आखिर लोकतंत्र कोई ऐसी बारात नहीं, जिसमें एक ही बैंड-बाजा हमेशा बजता रहे और बाकी लोग सड़क किनारे खड़े तमाशा देखते रहें।
धरना दीजिए, आवाज उठाइए, सरकार को घेरिए। मगर दूसरों की रोजी-रोटी पर ताला लगाकर नहीं।
लोकतंत्र में विरोध का हक सबको है, लेकिन सार्वजनिक मैदान किसी की निजी जागीर नहीं। आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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