शशि शेखर
दिल्ली। 17 साल पहले राय साहब से उनके गाजियाबाद स्थित आवास पर मिला था. चूंकि, तब मैं मनीष सिसोदिया के साथ मिल कर सूचना का अधिकार क़ानून पर एक पत्रिका ‘अपना पन्ना’ निकालता था और राय साहब उसके सलाहकार संपादक थे. मनीष जी के कहने पर सलाह लेने चला गया था. नि:संदेह राय साहब एक उच्च कोटि के विद्वान है और उनकी पत्रकारिता के बारे में कुछ लिखने की मेरी हैसियत है नहीं. राय साहब आजकल चर्चा में हैं. उन्होंने गांधी मार्ग के बाद, ‘मोदी मार्ग’ की संकल्पना पेश की हैं. बुद्ध के ‘मध्य मार्ग’ को वे शायद अप्रसांगिक मान रहे हो. अस्तु.
साल 2004 के दौर में, दिल्ली में मैंने पत्रकारों की एक ऐसी समृद्ध परंपरा देखी, जिनके बारे में आप कुछ भी कर ले, यह अंदाज तक नहीं लगा सकते थे कि उनकी खुद की विचारधारा क्या है? कांग्रेस की सरकार में खामोशी से सम्मान और रोजगार मिलता रहा. साल 2014 के बाद तो भाई साहब, क्या ही कहने? कहीं वीसी, कहीं एचओडी, कहीं किसी संस्थान के अध्यक्ष. अलबत्ता, ये गुण इंसान में होना श्रेष्ठीजन होने की निशानी है और हमजैसे लोग बेसिकली ‘बिग सल्फेट’ थे या हैं. अस्तु.
बहरहाल, मित्र राजेश कुमार ने लिखा है “जितना तुम बदले उतना नहीं बदला जाता.” मित्र राजेश, कहाँ कुछ बदला है. जाड़े के दिनों में गाँव में घोंघा देखा होगा या कछुआ? विपरीत हालात में दोनों अपनी गर्दन एक सुरक्षित शेल के भीतर घुसा लेते हैं. और जिस जनसत्ता के पर्याय राय साहब हैं, उसी जनसत्ता के मालिक गोयनका साहब विदिशा से जनसंघ के सांसद हुआ करते थे. पत्रकारीय क्रान्ति तो आपातकालीन बाय-प्रोडक्ट था. भड़ास वाले युवा तुर्क यशवंत सिंह भी ‘मोदी मार्ग’ संकल्पना पेश किए जाने के बाद से आहत दिख रहे हैं. बड़े भाई, आहात न होइए. सीखिए कि श्रेष्ठीजन कैसे बनते हैं? यह भी सीखिए कि हर दौर में डार्विन की संकल्पना (सर्वाइवल) को कैसे सही सिद्ध किया जाना चाहिए?
अक्सर श्रेष्ठीजन गैंडे से भी मजबूत कवच के स्वामी होते हैं. शब्दों का कवच तो और भी मजबूत होता है. जेपी के साइलेंट सहयोगी बने कई लोगों को बाद के कई सालों तक वो नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. 14 के बाद कुछ मिलने का समय आया तो ‘त्याग’ कर पाना मुश्किल हुआ. लेकिन, इस सबके बीच, सबसे महत्वपूर्ण है ‘विचार’, मोदी मार्ग की संकल्पना महज कोई ‘मक्खनबाजी’ नहीं है. यह एक विचार को एंडोर्स करने का बौद्धिक प्रयास हैं. और इस प्रयास की छटपटाहट भी कोई नई नहीं है. जागरूक लोग यकीनन ‘प्रभाष परंपरा’ के संस्थापक स्वयं प्रभाष जी के सती प्रथा वाले आलेख से परिचित होंगे.
तो विचारों का द्वन्द और टकराव कोई नया कहाँ है? कांग्रेस के भीतर कई ‘प्रभाष जी’, कई ‘राय साहब’ आपको मिल जाएंगे. दिग्गी राजा अपडेटेड वर्जन थे ही कांग्रेस के पास. और मैं तो आज भी मानता हूँ कि कांग्रेस से ज्यादा ‘हिंदूवादी’ आज तक भाजपा भी न हो सकी है. अन्यथा, एक प्रधानमंत्री चिठ्ठी भेजता रहा, लेकिन पन्त साहब ने कह दिया कि राम लला की मूर्ती अब नहीं हटाई जाएगी. और एक और प्रधानमंत्री भरी दुपहरिया भात-सांभर खा कर सो गए और उधर अयोध्या में जो होना था, होता रहा.
अस्सी के राय साहब शतायु हो. ईश्वर से मेरी प्रार्थना है. हिन्दुस्तान ने हर मार्ग को जगह दी हैं. जिस मार्ग में दम होता है, उसी पर चलना लोग पसंद करते हैं.
(सोशल मीडिया से)



