क्या भाजपा अपने समर्थकों की बैचेनी को समझ रही है ?

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सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर : प्रश्न यह है की क्या भाजपा मतदाताओं की बैचेनी और बदलते व्यवहार को पहचान रही है ? क्या भाजपा नेतृत्व को अपने परम्परागत मतदाताओं की नाराजगी और उसके कारण समझ में आ रहे हैं ? और ये भी कि यदि विपक्ष तर्कसंगत और मजबूत हो तो क्या मतदाता अपने मत का प्रयोग भाजपा के विरुद्ध करने में एक बार विचार करेंगे या नहीं ? इन्ही प्रश्नों में भाजपा के लिए आगामी चुनावों का परिणाम नहीं टिका है ? हालांकि अभी उत्तर प्रदेश सहित पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में पाँच महीने से ज़्यादा का समय बाक़ी है लेकिन अभी से भाजपा के परम्परागत मतदाताओं का रुझान भाजपा विरोधी होता दिखाई दे रहा है। इसका प्रमाण राजस्थान में संपन्न हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में आए परिणामों से मिल रहा है। यह सही है कि भाजपा लगभग 200 स्थानों पर अपना बोर्ड बनाने में तकनीकी रूप से सफल हुई है लेकिन मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों के प्रति जिस तरह की उदासीनता और बेरुखी दिखाई है, वह राजस्थान के साथ साथ आने वाले पाँच राज्यों के चुनाव में खतरे की ओर संकेत कर रहे हैं।

इन सबके मूल में हैं भाजपा से सवर्ण मतदाताओं के बीच पनप रही असुरक्षा की भावना। इन मतदाताओं के मन में यह बात गहरे पैठ गई है कि जिस तुष्टिकरण का विरोध कर भाजपा ने इस वर्ग का समर्थन हासिल किया था, अब भाजपा भी उसी तुष्टिकरण को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। मुस्लिम मतदाताओं के प्रति उदारता तो राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन हिंदू समाज के बीच जातीय वर्चस्व की लड़ाई के अवसर उपलब्ध कराना इन मतदाताओं के ग़ुस्से का बड़ा कारण है। *जातीयता विहीन समाज को बनाने की दिव्य दृष्टि लेकर राजनीति करने उतरी भाजपा का मतदाताओं को जातीय चश्मे से देखना हतप्रभ करता है।*

भाजपा के इस परिवर्तन का प्रभाव इतना गहरा है कि मोदी सरकार द्वारा किये गए कार्य जैसे कश्मीर से धारा 370 का हटना , भव्य राम मंदिर का निर्माण, जान धन खाते, हर घर में स्वच्छ पानी, निर्धन को आवास, पाकिस्तान को बेचारा बना देश बना देना जैसी उपलब्धियां भी बौनी नजर आने लगी हैं। यू जी सी द्वारा जारी दिशा निर्देशों ने हर घर में चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि सवर्ण समाज को अनुसूचित जाति/ जनजाति को दिए जाने वाले आरक्षण से कोई असहमति नहीं थी। लेकिन अनुसूचित जाति/ जनजाति क़ानून में किए गए अनुचित बदलाव और बिना जाँच के ग़ैर जमानती अपराध बनाने व झूठी शिकायत पर भी मिलने वाले वित्तीय मुआवजे के प्रावधान ने जातीय संघर्ष की एक नई पटकथा तैयार कर दी है। जिसका प्रमाण मुंबई आईआईटी के प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला का प्रकरण है, जिसमें उन्होंने बी टेक के छात्र साहिल वोकडे को नकल करते पकड़ा और आईआईटी प्रशासन को इसकी जानकारी दी। अगले दिन साहिल ने आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद साहिल के परिजनों ने प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला के खिलाफ अनुसूचित जाति / जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज करा दी। यह एक ऐसा मामला बना है कि पूरे भारत में कोई भी सवर्ण या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति अनुसूचित जाति / जनजाति में संरक्षण पाये नागरिकों की मनमानी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेगा। उनके मन में यह डर बैठ जाएगा कि मेरे विरोध करने पर मुझे ही बिना अपराध जेल जाना पड़ेगा और मुकदमा झेलना पड़ेगा। इसका दूसरा परिणाम यह भी हो सकता है कि पूरे भारत में अनुसूचित जाति / जनजाति के लोगों का अघोषित बहिष्कार हो जाये और सामाजिक समरसता का स्थान सामाजिक विद्वेश ले ले।

जानकार लोग यह भी मानते हैं की 2014 के बाद भाजपा के जनाधार बढ़ा है लेकिन देश का लगभग 20 प्रतिशत सवर्ण मतदाता बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ ही मजबूती से खड़ा रहा है और यदि मतदाताओं का यह वर्ग भाजपा से मुंह मोड़ लेता है तो भाजपा की सत्ता में वापसी मुश्किल ही होगी। अब यह भाजपा को देखना है कि वो इस तुष्टिकरण के अभियान में आगे बढ़ती है या रुककर सर्व समावेशी राजनीति के नए मापदण्ड स्थापित करती है।

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