डॉ. मयंक चतुर्वेदी
अयोध्या । भारतीय सनातन परंपरा के संदर्भ में ‘भक्ति साहित्य’ का जितना आप अध्ययन करेंगे आपको कई कहानियां भक्त और भगवान के परस्पर संबंधों को लेकर मिलेंगी। उनमें अनेक कहानियां तो ऐसी हैं जो यह कहती हैं कि भगवान के पास जब भक्त आता है तो उसे अपार कष्टों का सामना करना पड़ता है। परीक्षा की घड़ी, लगता है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही…! एक समस्या समाप्त होती है तो कहीं दूसरी समस्या खड़ी हो जाती है, कष्ट अनवरत जीवन में चलते रहते हैं, वह समाप्त नहीं होते।
शायद, इसलिए अंतत: भक्त तुलसीदास को भी कहना पड़ गया था कि
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥
अर्थात् चाहे कोई मुझे धूर्त कहे अथवा परमहंस कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसी की बेटी से तो बेटे का ब्याह करना नहीं है, न मैं किसी से संपर्क रखकर उसकी जाति ही बिगाड़ूँगा। तुलसीदास तो श्रीराम का प्रसिद्ध ग़ुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो। मुझको तो माँग के खाना और मसजिद (देवालय) में सोना है, न किसी से एक लेना है, न दो देना है। (पुस्तक : कवितावली (पृष्ठ 120) रचनाकार : तुलसी प्रकाशन : गीताप्रेस संस्करण : 2017)
यानी आप यहां देखिए कि भक्त आखिर बोल क्या रहा है! अब इस तरह की बातें भक्त जब बोल रहा है तो आप समझ लीजिए कि वह जो है, पूरी तरह अपनी देह से मुक्त हो चुका है। अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति से परे हो चुका है और अपने को उसने ईश्वर की आराधना में पूरी तरह तल्लीन कर लिया है। इस परिस्थिति में अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे कष्ट कितने मिलने है, वह देह से कष्ट में होगा या मानसिक कष्ट (जैसा कि इन दिनों चंपतराय जी के ऊपर आए कष्ट को देखा जा सकता है) उसे मिलेगा।
वैसे श्रीराम का संपूर्ण जीवन भी कष्टों का अनुपम उदाहरण हैं; जन्म के बाद कुछ बड़े हुए तो ऋषि विश्वामित्र आ गए, आश्रम की शिक्षा और वन में साधना, पूरी तरह से भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर एक तपस्वी जीवन। वहां भी असुरों (जिनके सुर समाज जीवन से मेल नहीं खाते) से लगातार संघर्ष करते हुए जीवन आगे बढ़ता है। विवाह योग्य हुए, अभी विवाह हुआ ही था कि “वन गमन” की दुंदुभी बज उठी। संयोग देखिए; इस बार अकेले नहीं जाना था, भाई के साथ भार्या (पत्नि) को भी साथ लेकर जाना था। फिर एक नई परीक्षा जीवन में आरंभ हो चुकी थी, वह भी पूरे 14 वर्षों के लिए!
अनन्त कठोर तपश्चर्या, तमाम देहिक, मानसिक कष्टों को झेलने का यह समय श्रीराम जी के जीवन में हम देखते हैं, इस बार तो संघर्ष असुरों के साथ-साथ राक्षसों (स्वभावगत दुष्ट), निशाचरों, (निशायाम् चरति इति) यानी जब संसार में सभी जीव आराम करते हैं, तब ये जागते हैं और ऐसे कृत्य करते हैं जो सभ्य समाज में मान्य नहीं, और दानवों (क्रूर अथवा अनैतिक व्यक्तियों) से भी रहा। अपनी भार्या का बिछोह झेला, एक लम्बा युद्ध और उसके बाद अयोध्या के लिए प्रस्थान।
पर, रामजी को यहां भी कहां शांति थी! अभी कुछ समय ही बीता था कि एक नई परीक्षा उनका इंतजार कर रही थी, इस बार उन्हें अपनी पत्नि को सदैव के लिए खो देना था! फिर राजा का पहला और अंतिम कर्तव्य ही है, प्रजा का सुख। इसलिए तुलसीबाबा करते भी हैं-
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
अर्थात् श्री राम के राज्य में किसी को भी दैहिक (शारीरिक और मानसिक), दैविक (दैवीय या प्राकृतिक) और भौतिक (संसार से मिलने वाले)- इन तीनों प्रकार के ताप (कष्ट) नहीं सताते। सभी मनुष्य आपस में प्रेम करते हैं और वेदों में बताई गई मर्यादा और नीति के अनुसार अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। (गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘श्रीरामचरितमानस’ के उत्तरकांड)।
यानी कि रामराज्य में “स्वधर्म” का पालन पूरे मनोयोग से हर कोई करता हुआ हमें दिखाई देता है। फिर दिखाई भी क्यों न दे, आखिर राज्य भी तो श्रीराम जी का है, जिसका आदर्श वाक्य ही है-
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥”
“जिस राजा (शासक) के राज्य में प्यारी प्रजा दुखी रहती है, वह राजा निश्चय ही (अवश्य) नरक का भागी होता है।”। हालांकि यह प्रसंग अयोध्याकाण्ड में तब आता है जब भरत अपने ननिहाल से वापस अयोध्या पहुँचते हैं और उन्हें अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु तथा श्री राम के वनवास का पता चलता है। माता कैकेयी से बातचीत के दौरान और अयोध्या की प्रजा की दुर्दशा को देखकर भरत स्वयं के लिए या राज्य की नीतियों के संदर्भ में यह बात कहते हैं।
इस पंक्ति के माध्यम से तुलसीदास जी ने यह बताया है श्रीराम के समय में ‘राजधर्म’ को सबसे ऊपर रखा गया है। एक राजा का सबसे पहला कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा करना और उन्हें सुखी रखना है। यदि शासक अपनी जिम्मेदारी में विफल रहता है और जनता कष्ट में है, तो उसे पाप का भागी माना जाता है और मृत्यु के पश्चात उसे नरक प्राप्त होता है।
स्वभाविक है कि श्रीराम ने जीवन भर इन पंक्तियों का अनुसरण किया। अपनी भार्या (पत्नि) सीता (जानकी) जी को ऋषि बाल्मिकी के आश्रम में पहुंचाने के साथ अयोध्या नरेश, कण-कण के स्वामी श्रीराम की यात्रा एक पुरुष रूप में दुख और कष्टों से भरी हुई ही दिखी। सीता का विछोह फिर एक बार हुआ, बच्चे भी आश्रम में ही जन्में। इसके बाद जब पुन: मिलना भी हुआ तो बच्चे ही सिर्फ मिले, जानकी जी सदैव के लिए पृथ्वी में समा चुकी थीं।
तब कुल मिलाकर श्रीराम का जीवन चरित्र देह के स्तर पर सतत संघर्ष का, यश, कीर्ति, लाभ, हानि, अपयश से परिपूर्ण नजर आता है। फिर भला उनके भक्त इन गुणों से कैसे मुक्त हो सकते हैं ? वैसे भी हरि (विष्णु) के लिए कहा भी गया है कि उनके भक्त एक समय के बाद सांसारिक पदार्थों से मुक्त हो जाते हैं, भगवान स्वयं ऐसी लीला रचते हैं कि जो थोड़ी बहुत आसक्ति शेष भी रहती है, वह उन कारणों से समाप्त हो जाती है, जोकि जीवन व्यवहार में घटित होते हैं।
सच, राम नाम, राम संकीर्तण, राम ध्यान, राम चरण, राम भाव, राम आस्था, राम स्नेह, राम समर्पण, राम जाप एवं इस तरह से अन्य जो भी कुछ राम मय है, वह कल्याणकारी एवं मोक्षकारी है। फिर अयोध्या के कण-कण में राम बसे हैं! राममंदिर के लिए अनेक आहुतियां सतत दी जाती रही हैं, जो भी श्रीराम के नजदीक पहुंचा है, उसका मोक्ष होना तय है। वैसे भी मोक्ष शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘मुच्’ धातु (जिसका अर्थ ‘छुटकारा पाना’ या ‘मुक्त होना’ है) से हुई है। मोक्ष का शाब्दिक अर्थ है; जन्म-मरण के सांसारिक चक्र और सभी दुखों से सदा के लिए मुक्ति।
आध्यात्मिक संदर्भ में इसे मोह + क्षय के रूप में समझा जाता है, जिसका अर्थ है; सांसारिक मोह (आसक्ति) का नष्ट हो जाना और आत्मा का शुद्ध स्वरूप में स्थापित होना। मोक्ष = मोह + क्षय (दीर्घ और व्यंजन के मेल की सैद्धांतिक अवधारणा) में मोह (संसार के प्रति लगाव, अज्ञान और भ्रम) का पूर्ण क्षय (नाश) हो जाना ही मोक्ष है।
सांख्य, न्याय और वेदांत के अनुसार मोक्ष, वस्तुत: आत्मज्ञान की प्राप्ति: “आत्मानम् विद्धि” है। आत्मज्ञान द्वारा मायिक (माया के) बंधनों से रहित होकर अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना मोक्ष है। न्याय दर्शन में इसे लेकर इसीलिए यहां तक कहा गया कि “दुःखस्य आत्यन्तिको विमोक्षः मोक्षः।” अर्थात्, सांसारिक दुखों (दैहिक, दैविक और भौतिक) का हमेशा के लिए समूल नाश हो जाना ही मोक्ष है।
इस तरह से मोक्ष की परिभाषा से मोक्ष सर्वकल्याणकारी है। फिर भाग्यवान और श्रेष्ठ लोगों को ही यह मोक्ष मिल पाता है। फिर भले ही “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥” जैसी स्थिति हो।
वास्तव में यह चौपाई हमें याद दिलाती है कि मनुष्य जीवन सिर्फ खाने, सोने और सांसारिक भोग-विलास में बिताने के लिए नहीं है। यह हमें ईश्वर की भक्ति, अच्छे कर्म और आत्म-कल्याण (मोक्ष) प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर प्रदान करता है। अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव रहे चंपत राय जी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है।
वे ईश्वर आराधना के अपने वर्षों के पुण्य-प्रताप से पूर्ण मोक्ष के अधिकारी हैं। जहां तक यश-अपयश की बात है तो भगवान श्रीराम, मां जानकी भी उससे अछूते नहीं रहे, तो भला उनका भक्त कैसे रह सकता है इससे अछूता! अब भला जो दिन-रात अयोध्या में रहते हुए भगवान राम के साथ को अनुभव नहीं कर पा रहे, उनके लिए क्या ही कहें!
वास्तव में उनसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण मनुष्य इस संसाद में कोई अन्य नहीं होगा। वे भगवान के धाम में रहते हुए भी माया का गुणगान कर रहे हैं, माया का ध्यान कर रहे हैं, मौका मिलते ही माया को पार कर रहे हैं! किंतु कुछ ऐसे भी हैं, जो माया के बीच रहते हुए उन्हें माया से नहीं अपने भगवान राम से प्रेम है। वे वहां भगवान श्रीराम के लिए हैं।
तभी तो भगवान ऐसे ही अपने अनन्य भक्त को उनके अथक समर्पण और मंदिर के हर कोने-विवरण की गहरी जानकारी के कारण उन्हें जनमानस से ‘रामलला का पटवारी’ नाम दिलवाते हैं। उनके तप का ही यह फल है कि वे राम मंदिर आंदोलन के रणनीतिकार और सर्वोच्च न्यायालय में केस के प्रमुख समन्वयक बनाए जाते हैं। नहीं तो कितने लोग हैं, जिनको भगवान अपने करियर को दांव पर लगाने की हिम्मत देते हैं। ‘भौतिकी’ का प्राध्यापक देखते ही देखते सब कुछ छोड़कर संघ प्रचारक बन जाता है।
चंपत राय के रामलला के पटवारी बन जाने की कहानी कुछ ऐसी ही है, जोकि साधारण तो बिल्कुल भी नहीं है, जितनी आज कोई कल्पना कर रहा हो! वे अपने जीवन में आपातकाल का सिर्फ दौर ही नहीं देखते, उसे भोगते भी हैं, 18 महीने जेल में बिताते हैं। अपनी सरकारी नौकरी छोड़ते हैं। रामजन्म भूमि से जुड़ी गहराइयों में वे इतना उतर जाते हैं कि एक समय के बाद उनकी इसमें गहरी पैठ देखकर लोग उन्हें ‘अयोध्या का एनसाइक्लोपीडिया’ (विश्वकोश) कहने लगते हैं।
एक पटवारी (भूमि का लेखा-जोखा रखने वाला) की भांति, उनके पास राम जन्मभूमि से जुड़ा हर कानूनी दस्तावेज, नक्शा और साक्ष्य मौजूद रहते हैं। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में वकीलों को अकाट्य ऐतिहासिक और दस्तावेजी तथ्य चंपत राय ने ही उपलब्ध कराए, आज यह भी एक एतिहासिक सच है! उनके पास मौजूद सबूतों ने कानूनी टीम को न्यायालयीन बहस में बहुत मजबूती दी।
1990 और 1992 के निर्णायक कारसेवक आंदोलनों के दौरान, उन्होंने देश भर से लाखों रामभक्तों को अयोध्या पहुंचने और जुटाने में महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाई। 1991 में क्षेत्र संगठन मंत्री और बाद में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव बनने तक, उन्होंने आंदोलन को एक जन-आंदोलन का रूप देने में अथक परिश्रम किया। इस तरह से देखें तो राम मंदिर आंदोलन और उसके बाद के समय में चंपत राय जी का योगदान पांच दशकों से भी अधिक लंबा और विस्तृत है।
जब 2020 में उच्चतम न्यायालय का निर्णय आता है, तब वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में गठन के साथ महासचिव नियुक्त होते हैं। मंदिर निर्माण के प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी कार्यों का नेतृत्व वे करते हुए हम सभी को दिखते हैं। राम मंदिर के लिए विशाल स्तर पर हुए क्राउड-फंडिंग (जन-सहयोग) अभियान का नेतृत्व उन्होंने ही किया। प्राण प्रतिष्ठा तक की यात्रा में, उन्होंने देश और दुनिया को मंदिर निर्माण की नियमित और सटीक जानकारी देने में मुख्य प्रवक्ता की भूमिका निभाई।
अब वक्त उनका इस दैनन्दिन कार्यों से मोक्ष पाने का है! तभी तो रामजी ने उनके साथ ये लीला रची है! हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे और दान (नकद और स्वर्ण-आभूषणों) में कथित अनियमितताओं का विवाद सामने आ खड़ा हुआ है। इन गंभीर आरोपों के बीच और वित्तीय कोष की देखरेख की जवाबदेही लेते हुए, चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव पद से अपना इस्तीफा दे दिया है।
वे इसके साथ ही अब पूरी तरह माया के विविध बंधनों से मुक्त हो जाने की घोषणा करते दिखते हैं। अपने जीवन के कई दशक श्री राम को समर्पित कर चुके चंपत राय का इतिहास भव्य मंदिर के निर्माण का साक्षी रहा है। वैसे प्रभु श्रीराम ने ही तुलसी बाबा के मुख के संभवत: भक्त के सामने आनेवाले इसी संकट के लिए ही कहलवाया है-
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहुँ मुनिनाथ।
हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाँथ॥
अर्थात, महर्षि वशिष्ठ भरत जी को समझाते हुए कहते हैं कि हानि-लाभ, जीवन-मृत्यु और यश-अपयश (बदनामी) सब विधाता (ईश्वर) के हाथ में हैं।(गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड)। अब जो कुछ भी सामने है, वह सब रघुवीर की माया है!
लग यही रहा है कि चंपत राय जी को प्रभु ने अपने इस संसार का सही पाठ पढ़ाया है। मोह-माया से पूर्ण मुक्ति के लिए श्रीहरि (विष्णु) राम ने कभी नारद को दिए अपने हरि रूप (वानर/बंदर) की तरह ही माया का पाठ पढ़ाया है!
ऐसे में एक भक्त के लिए भगवान का यही संदेश है, भक्ति जितनी प्रवल होगी, भगवान अनेक यश-अपयश का भागी बनाकर अंतत: अपने भक्त की मति को कर्मों की गति से आखिरकार उसके हित में अपनी ओर मोड़ ही लेते हैं। अयोध्या, रामलला, राममंदिर प्रकरण और चंपतराय जी के बीच कुछ ऐसा ही प्रसंग घटता हुआ आज नजर आ रहा है! अब चंपत राय राममय है रामजी भी अपने भक्त में प्रेम में प्रेममय है, अब भगवान और भक्त के बीच कोई माया का बंधन नहीं, सिर्फ यदि कुछ है तो वह मोन समर्पण है, पूर्ण समर्पण है एक भक्त का अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों में…….जहां परम शांति है, परम सुख हैं और अंतत: मोक्ष है, इस भवसागर से……



