कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
रायपुर । किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उस देश का युवा होता है। युवा वह है, जो समय की सामर्थ्य को जानता है। युवा वह है जो अपने अतीत के गौरव के बोध से लेकर — वर्तमान की परिस्थितियों को समझता है। भविष्य की दृष्टि के साथ जीवन के विविध क्षेत्रों में गतिमान होता है। युवा यानी सृजन की वो शक्ति, जो असंभव को भी संभव बना देता है।
यही युवा जब ठानता है तो अभेद्य लक्ष्यों को पूर्ण कर देता है। यही युवा जब संकल्प लेता है, तो चंद्रयान और गगनयान जैसे मिशन को पूरा करता है। आसमान में तिरंगा फहराता है। यही युवा जब ठानता है तो विश्व की खेल प्रतिस्पर्धाओं में से देश के लिए मेडल लाता है। आईटी के सेक्टर में, सेमीकंडक्टर के सेक्टर में आगे ले जाता है और ऑपरेशन सिंदूर के जरिए देश की सीमाओं की रक्षा-सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यही युवा जब संकल्पित होता है, तो इसरो से लेकर डीआरडीओ तक और समाज जीवन के जितने भी क्षेत्र हैं—चाहे शिक्षा हो, कला हो, संस्कृति हो, ज्ञान हो, विज्ञान हो या अनुसंधान हो ।हर क्षेत्र में अपने साहस, शक्ति, संकल्प, समन्वय, समझ और सृजनात्मकता के साथ नए मानक गढ़ता है।
यही कारण है कि किसी भी राष्ट्र के भविष्य की चर्चा करते समय उसकी युवा शक्ति सबसे महत्वपूर्ण केंद्र में होती है। भारत भी इससे अलग नहीं है। आज भारत के सामने एक ओर अपनी युवा शक्ति की अपार संभावनाओं को राष्ट्र निर्माण में लगाने का अवसर है, तो दूसरी ओर युवाओं के सामने मौजूद चुनौतियों को समझने और उनका समाधान करने की आवश्यकता भी है।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में कोई उत्सव नहीं मना रहा है। बल्कि समाज के मध्य पांच कार्यों को लेकर जा रहा है। संघ – पर्यावरण , नागरिक कर्तव्य, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी और सामाजिक समरसता को समाज का आंदोलन बनाने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहा है। आवाहन कर रहा है।ये वो पांच कार्य हैं, जो भारतीय समाज को दृढ़ करते हैं।जो भारतीय समाज को अभिव्यक्त करते हैं और इनके माध्यम से हम अपने राष्ट्र और समाज को समृद्ध, समुन्नत और खुशहाल बना सकते हैं।
इन सभी कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण है भारत की युवाशक्ति की सहभागिता। इसी के निमित्त देश भर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘युवा संवाद’ के कार्यक्रमों के जरिए भारत की युवा शक्ति का प्रबोधन कर रहा है । युवाओं से संवाद कर रहा है।
संवाद के कार्यक्रम केवल युवाओं को कुछ बताने के माध्यम नहीं हैं। बल्कि यह भारत की युवा पीढ़ी के अंतर्मन को समझने, उसके विचारों को जानने, उसकी अभिव्यक्ति को समझने और उसकी सृजनात्मकता की गति और प्रगति को सुनिश्चित करने के हेतु हैं। संघ के द्वारा शुरू किए गए ‘युवा संवाद’ को लेकर संपूर्ण भारत देश में अच्छा प्रतिसाद मिला है।
देश के विभिन्न हिस्सों में गांव से लेकर महानगर तक—लाखों की संख्या में भारत की युवा शक्ति – ‘युवा संवाद’ के कार्यक्रमों से जुड़ी। इसमें स्कूल के विद्यार्थी से लेकर कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले विद्यार्थी, युवा उद्यमी, आर्थिक क्षेत्र में काम करने वाले युवा, युवा चिकित्सक, युवा शिक्षक, युवा प्राध्यापक, युवा इंजीनियर, साहित्यकार, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वाले युवा—यानी सार्वजनिक जीवन के जितने क्षेत्र होते हैं। भारत की संपूर्ण युवा शक्ति युवा संवाद के कार्यक्रमों से जुड़ी।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से संघ के पदाधिकारी युवाओं की बातों को सुन रहे हैं। युवाओं के प्रश्नों को समझ रहे हैं और उनकी जिज्ञासाओं के समाधान को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रकार युवा संवाद कोई एकतरफा संवाद न होकर युवाओं और संघ के बीच विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम बन रहा है। समाज को लेकर संघ किन-किन क्षेत्रों में कार्य कर रहा है? युवाओं के मन में समाज की उन्नति के लिए कौन-कौन से संकल्प हैं? वो क्या सोचते हैं और वर्तमान में क्या कर रहे हैं? भविष्य की कौन सी योजनाएं हैं? उनके कार्य का केंद्रीय आधार क्या है? इन सभी विषयों को लेकर समाज के मध्य संवाद हो रहा है।
युवा संवाद के जितने भी कार्यक्रम हो रहे हैं, उनमें युवाओं के सामने आने वाली अनेक कार्य और चुनौतियाँ प्रमुखता से सामने आ रही हैं। इनमें स्वावलंबन, स्वदेशी का आग्रह, नशे का दुष्प्रभाव, डिप्रेशन और एकाकीपन जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं। इन सभी बातों को लेकर समाज में चर्चा, युवाओं की नशे से दूरी को समाज, प्रशासन, पुलिस सबके मध्य चिन्तन मंथन पर बल दिया गया।
आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में संघ प्रेरित विविध संगठनों की अखिल भारतीय समन्वय बैठक में भी इस दिशा पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सी आर मुकंद ने प्रेस वार्ता में बताया कि — “देश में युवाओं और विद्यार्थियों तक मादक पदार्थों की बढ़ती पहुँच पर बैठक में गंभीर चिंता व्यक्त की गई। इस समस्या को केवल सरकार या पुलिस के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे समाज की सहभागिता से हल करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।शिक्षण संस्थानों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों, प्रशासन, पुलिस तथा अन्य संबंधित पक्षों को साथ लेकर नशामुक्त समाज के लिए समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई।”
(विशाखापट्टणम, 21 अगस्त 2026 )
इतना ही नहीं उन्होंने ये भी बताया कि –
“संघ का कार्य बड़ी संख्या में युवाओं के बीच चल रहा है। इस वर्ष संघ के 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्गों में लगभग 21,000 युवा स्वयंसेवकों ने भाग लिया। देशभर की दैनिक शाखाओं में उपस्थित स्वयंसेवकों में 60 प्रतिशत से अधिक युवा हैं।”
(सी आर मुकंद, सह सरकार्यवाह, विशाखापट्टणम, 21 अगस्त 2026 )
यानी युवाओं में बढ़ती नशे की लत को लेकर बिल्कुल स्पष्ट है। साथ ही संघ के अधिसंख्य स्वयंसेवक युवा होना ये बताता है कि — भारत की युवा शक्ति सर्जन के साथ गतिमान है।
वहीं हमें भी ये सोचना होगा कि – नशे, डिप्रेशन , एकाकीपन जैसी इन समस्याओं से युवा कैसे दूर हो सकता है? इसके लिए घर, परिवार और समाज के बीच निरन्तर बातचीत का व्यवहार अपनाना पड़ेगा। घर-परिवार में युवा अपनी बातों को बताएँ, बड़े उनकी बातों को सुनें, उन्हें समझें और उनके साथ अपनेपन के साथ व्यवहार करें। यदि ऐसा वातावरण निर्मित होता है, तो हम नशे, डिप्रेशन और एकाकीपन जैसी समस्याओं को जड़मूल से समाप्त कर सकते हैं। परिवार और समाज का यह संवाद युवाओं को मानसिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
दूसरी ओर युवा संवाद कार्यक्रमों में – युवाओं के मन में धर्म, समाज, सामाजिक समरसता, कन्वर्जन और बदलते परिवेश को लेकर भी प्रश्न और जिज्ञासाएँ सामने आ रही हैं। ऐसे में युवाओं को युवा संवाद के जरिए यह प्रबोधन किया जा रहा है कि — हमें अपने प्रत्येक कार्य, विचार और व्यवहार में यह देखना पड़ेगा कि राष्ट्र और समाज प्रथम होना चाहिए। हमारे समाज में कहीं भी कोई अलगाव, विद्रूपता, उपद्रव और ऐसे कोई भी कार्य, जो भारतीय समाज को नुकसान पहुँचाते हैं। उनका मुखरता और प्रखरता से प्रतिकार हम युवाओं को करना ही पड़ेगा। यह हम सबका साझा कर्तव्य है।
इसी के साथ एक बड़ी चुनौती यह भी है कि युवाओं का उद्देश्य क्या होना चाहिए? क्या केवल करियर ही युवाओं का उद्देश्य हो सकता है? नहीं। करियर — यानी नौकरी अथवा कोई व्यवसाय भले ही हमारे जीविकोपार्जन का उद्देश्य हो सकते हैं। किंतु हम युवाओं का उद्देश्य केवल सफल होना नहीं, बल्कि सार्थक जीवन जीना होना चाहिए। इसके साथ ही अधिकारों को लेकर ख़ूब चर्चा होती है। किन्तु हमें ये ध्यान रखना होगा कि – संविधान ने हमें मौलिक अधिकारों के साथ साथ ढेर सारे अधिकार दिए हैं, किंतु इसके साथ संविधान ने मौलिक कर्तव्यों की भी स्पष्ट रूप से उद्घोषणा की है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम अपने अधिकारों की बात करते हुए अपने कर्तव्यों को कभी भी न भूलें। अपने नैतिक कर्तव्यों को भी ध्यान रखें।
हम सबकी— एक व्यक्ति और एक समाज के नाते, महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हो जाती है कि हम अपने परिवेश को, अपने घर को, अपने परिवार को, अपने समाज को और अपने राष्ट्र को बेहतर बनाएँ। हमारी युवा ऊर्जा शक्ति यदि सकारात्मक प्रयोजन में लगती है, तो उसका परिणाम निश्चित ही समाज के लिए हितकारी होगा । यही भारत को उन्नति के शिखर तक पहुंचाएगा।
वहीं युवा संवाद के साथ-साथ संघ से युवाओं के जुड़ने का एक दूसरा पक्ष भी सामने आया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ऑफिशियल वेबसाइट http://rss.org के माध्यम से ‘जॉइन आरएसएस’ के माध्यम से लाखों की संख्या में लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों को देखकर उससे जुड़ने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन किया है। इसमें सर्वाधिक लगभग 65 फीसदी संख्या युवाओं की है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर बताते हैं—“संघ की वेबसाइट (http://rss.org) पर ‘जॉइन आरएसएस’ के माध्यम से वर्ष 2025 में जनवरी से जुलाई के बीच 55,423 लोगों ने संघ से जुड़ने के लिए पंजीकरण करवाया, जबकि 2026 में इसी अवधि के दौरान संख्या ढाई गुना बढ़कर 1,23,287 हो गई है।जुलाई 2025 में संख्या 9,718 रही, जबकि जुलाई 2026 में 24,086 लोगों ने संघ से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की है। इनमें 30 वर्ष से कम आयु के युवा लगभग 65 प्रतिशत हैं और 40 वर्ष से कम आयु के लोग 85 प्रतिशत हैं।” (सुनील आंबेकर-18 अगस्त 2026 | गुडिलोवा, विशाखापट्टनम आंध्रप्रदेश)
यानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर युवाओं के मन में आकर्षण है। यह आकर्षण केवल एक दिन या किसी अभियान के जरिए नहीं, बल्कि लोगों ने स्वप्रेरणा से रजिस्ट्रेशन किया है। 100 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज के बीच जो कार्य कर रहा है, यह उसका बड़ा प्रतिसाद है। यानी समाज में सकारात्मक कार्य के प्रति समर्पित युवाओं की एक बड़ी संख्या है, जो निःस्वार्थ भाव से समाज के लिए कुछ बेहतर करना चाहते हैं।यही कारण है कि प्रत्यक्ष शाखा और विविध संगठनों के अलावा भी लाखों की संख्या में लोग ऑनलाइन पंजीयन कर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ना चाहते हैं। ये संख्या उनकी है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों को समाज में देखते हैं किन्तु उसकी सांगठनिक पद्धति से परिचित नहीं हैं।
ये आंकड़े और सकारात्मक परिवर्तन यह बताते हैं कि – भारत का युवा अपने देश और समाज के प्रति समर्पण के साथ कार्य कर रहा है। भारत के युवाओं ने यह कर दिखाया है। इस दिशा में ‘युवा संवाद कार्यक्रम’ एक महत्वपूर्ण कड़ी बने हैं। युवाओं के मन में तमाम परिवर्तनों, तमाम मृगमरीचिकाओं के बावजूद जो प्रश्न थे, उन्हें संघ ने समझा है। संघ ने वन-वे कम्युनिकेशन नहीं किया बल्कि युवाओं के प्रश्न और तर्कों के साथ संवाद किया है।
संवाद यानी समाधान का माध्यम। इस संवाद का ये सुफल है कि भारत का युवा नकारात्मकता की ओर आकर्षित नहीं होता है, बल्कि समय की गति के साथ अपनी आत्मशक्ति को पहचानता है और ध्येयनिष्ठा के साथ अपने कार्य में लग जाता है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक और पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ के अनुसार, “15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 8.7 करोड़ भारतीय युवा NEET (न तो शिक्षा, न रोजगार और न ही प्रशिक्षण) श्रेणी में आते हैं। इसका अनुमान 2021 में हुए नेशनल सैंपल सर्वे के 78वें दौर के आँकड़ों के आधार पर लगाया गया है।”
रिपोर्ट का यह आँकड़ा चौंकाने वाला है। क्योंकि भारत की 140 करोड़ की संख्या में से यदि 8.7 करोड़ युवा शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण की श्रेणी से कटे हुए मिलते हैं, तो यह एक गंभीर चुनौती है। नीति आयोग इनकी बेहतरी के लिए नए इंफ्रास्ट्रक्चर पर बल दे रहा है। नई कार्ययोजनाओं पर काम कर रहा है।
ऐसे में समाज और सरकार के स्तर पर यह आवश्यक है कि हम अपनी युवा शक्ति को उत्कृष्ट शिक्षा, प्रशिक्षण, रोजगार और उद्यम आदि से जोड़ें। इसके लिए हमें ‘ग्राउंड जीरो से लेकर मास लेवल’ तक कार्य करना पड़ेगा। एक बेहतर शिक्षा का वातावरण निर्मित हो। जो व्यवस्थागत खामियाँ हैं, उन्हें दूर किया जाए। युवाओं को शिक्षा के साथ-साथ कौशल से जोड़ा जाए और उनकी अभिरुचि के अनुसार उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए। उन्हें इंटर्नशिप के अवसर दिए जाएँ, ताकि भारत की युवा शक्ति अपनी संपूर्ण ऊर्जा और सामर्थ्य के साथ भारत को गढ़ने में लगे।
युवा शक्ति की इसी ऊर्जा, सामर्थ्य और संकल्प को सही दिशा देने का संदेश हमें विजयादशमी का पर्व भी देता है। शारदीय नवरात्र यानी अश्विन माह में आने वाला विजयादशमी का यह पर्व हमें जागृत करता है। विजयादशमी का यह पर्व बताता है कि भारत में शक्ति की साधना की जाती है। समाज केवल माँ भगवती दुर्गा की आराधना ही नहीं करता है बल्कि समाज की शक्ति को संगठित करता है।यह शक्ति की साधना इसलिए है, ताकि समाज जीवन व्यवस्थित रहे और हमारी शक्ति प्रकट हो। विजयादशमी समाज के मानस को आत्मशक्ति से परिचित कराने का पर्व । यह पर्व ‘धर्म और अधर्म’ में से ‘धर्म’ की जीत का प्रतीक है। ‘सत्य और असत्य’ में से ‘सत्य’ की जीत का प्रतीक पर्व है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि —यदि हम सदाचरण करते हैं, अच्छे रास्ते पर चलते हैं, तो कोई भी संकट हमारे सामने ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता है और हम अपनी साधना के बलबूते हर संकट को, हर परेशानी को, हर चुनौती को मात दे सकते हैं।
तो आइए, हम संकल्प लें इस विजयादशमी के पर्व पर। आइए, हम संकल्प लें शक्ति साधना के हर दिन पर कि हम युवा अपने राष्ट्र, अपने समाज के लिए कार्य करेंगे। हम अपनी शक्ति को नकारात्मक चिंतन में नहीं लगाएंगे, बल्कि अपनी परंपराओं, अपने समाज, अपनी परंपरा के संस्कार, आदर्शों और परिवार की शक्ति के माध्यम से स्वयं को जानेंगे, अपनी आत्मशक्ति को पहचानेंगे और पूरी ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण के पथ पर लग जाएंगे।
यानी, हम अपना कर्तव्य इतना बेहतर करेंगे कि समाज में उसका अनुकरण हो। कहा जाता है कि हम जो परिवर्तन देश और समाज में देखना चाहते हैं, सबसे पहले उस परिवर्तन की शुरुआत हम अपने आप से करें। आइए, हम युवा इस बात का संकल्प लें कि हम अपने समाज को समरस बनाएँगे। अपने समाज में जो भी समस्याएँ होंगी, जो विकृतियाँ आएँगी, उनका मिल-बैठकर चर्चा करके हम समाधान करेंगे। किंतु किसी भी प्रकार की अराजकता, उपद्रव, हिंसा, नशा जैसे किसी भी कृत्य के शिकार और भागीदार नहीं बनेंगे। क्योंकि ये सब हमारी शक्ति को क्षीण करते हैं, हमें दुर्बल बनाते हैं।हम ऐसा कतई नहीं होने देंगे।क्योंकि हम सिर्फ कहने के लिए युवा नहीं हैं। हम अपने कार्य से, अपनी शक्ति और सामर्थ्य से यह सिद्ध करेंगे कि भारत का युवा वह है, जो सृजन के परिवर्तन का नया शंखनाद करता है, महाभारती का जयगान करता है।



