नव ठाकुरीया
गुवाहाटी: क्या असम में डिजिटल पत्रकारिता अब परिपक्व हो गई है? कम से कम इस मामले में तो ऐसा जरूर लगता है, जहाँ डिजिटल माध्यम समाचार चैनलों के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं—खासकर तब, जब मुख्यधारा के मीडिया संस्थान ऐसा करने से कतराते हैं। गुवाहाटी के एक सैटेलाइट समाचार चैनल के मालिक ने एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के संपादक को ‘तथाकथित पत्रकार’ कहकर संबोधित किया। इस टिप्पणी की निंदा करते हुए कई वैकल्पिक मीडिया संस्थान एकजुट होकर समाचार चैनल के मालिक की आलोचना करने लगे और उन्हें चेतावनी दी कि वे डिजिटल पत्रकारों को कमतर न समझें। जैसे-जैसे यह मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बना, डिजिटल मीडिया के संचालकों ने इसे अपनी पहचान और मान्यता का सवाल उठाने के अवसर के रूप में देखा। उन्होंने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) सहित संबंधित प्राधिकरणों से मान्यता की माँग उठाने की संभावना पर भी विचार किया।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत व्हाट्सएप पर एक ऑडियो क्लिप से हुई, जिसमें दो लोगों के बीच असमिया भाषा में बातचीत रिकॉर्ड थी। एक वीडियो में मोबाइल फोन की स्क्रीन दिखाई गई, जिस पर ‘प्राग न्यूज़’ (Prag News) के मालिक का नाम नजर आ रहा था। मामला तब अधिक चर्चा में आया, जब ‘ईशान न्यूज़’ (Ishan News) के संपादक और पत्रकार सुशील पटवारी ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस ऑडियो को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने संजीव नारायण के स्वामित्व वाले समाचार चैनल की पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों पर सवाल खड़े किए।
पटवारी को उम्मीद थी कि ‘प्राग न्यूज़’ की ओर से प्रतिक्रिया आएगी और यह बताया जाएगा कि बातचीत किसी अनैतिक गतिविधि से संबंधित नहीं थी। जल्द ही ‘लेंगडोन बतोरी’ (Lengdon Batori), ‘प्रतिबिंब लाइव’ (Pratibimba Live) और ‘डीकेबीफैक्ट’ (DKBfact) जैसे अन्य समाचार पोर्टलों तथा डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने भी इस मुद्दे को उठाया।
बढ़ते दबाव के बीच नारायण ने एक औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज कर दिया। हालाँकि, उन्होंने घोष (Ghosh) नाम के एक व्यक्ति से बातचीत होने की बात स्वीकार की। उनका दावा था कि यह बातचीत घोष की लग्जरी गाड़ी के बकाया भुगतान से संबंधित थी। उन्होंने कहा कि इसका किसी ऐसी खबर से कोई संबंध नहीं था, जिसे घोष पैसे देकर ‘प्राग न्यूज़’ से हटवाना चाहते हों। कथित तौर पर पैसे एक तय व्यक्ति के माध्यम से भेजे जाने थे।
नारायण ने यह भी कहा कि उनके अपने समाचार चैनल ने कई मौकों पर घोष को अवैध ड्रग कारोबार में शामिल व्यक्ति के रूप में उजागर किया था। उन्होंने बातचीत के बारे में गलत रिपोर्टिंग करने वाले समाचार पोर्टलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात कही।
नारायण ने यह भी कहा कि उनके अपने समाचार चैनल ने कई मौकों पर घोष को अवैध ड्रग कारोबार में शामिल व्यक्ति के रूप में उजागर किया था। उन्होंने बातचीत के बारे में गलत रिपोर्टिंग करने वाले समाचार पोर्टलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात कही।
अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रतिक्रिया देते हुए नारायण ने गुवाहाटी के तीन स्थानीय डिजिटल पोर्टलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की बात कही। उनकी आपत्ति थी कि इन पोर्टलों ने वायरल ऑडियो-वीडियो के आधार पर, उनका पक्ष सुने बिना और ठोस आधार के अभाव में खबरें प्रसारित कीं। उन्होंने डिजिटल मीडिया और पोर्टलों को भी लाइसेंसिंग प्रक्रिया के दायरे में लाने की वकालत करते हुए सरकार से अपील की। उनका तर्क था कि सैटेलाइट समाचार चैनलों की तरह डिजिटल माध्यमों को भी जवाबदेही के दायरे में लाया जाना चाहिए, ताकि खबरें प्रसारित करने से पहले उनका सत्यापन सुनिश्चित हो सके और किसी व्यक्ति या प्रतिष्ठान को संभावित नुकसान से बचाया जा सके।
हैरानी की बात यह रही कि अगले ही दिन घोष खुद सामने आए और दावा किया कि ‘प्राग न्यूज़’ के मालिक उनसे बार-बार पैसों की माँग कर रहे थे। उनके अनुसार, वायरल बातचीत उस रकम से संबंधित थी, जिसकी माँग नारायण ने ‘प्राग न्यूज़’ पर अपने खिलाफ एक नुकसानदेह खबर के दूसरे हिस्से को प्रसारित होने से रोकने के लिए की थी।
इसके विपरीत, एक वीडियो क्लिप में खुद को कानून का पालन करने वाला कारोबारी बताते हुए—न कि अवैध ड्रग कारोबारी—घोष ने दावा किया कि नारायण विभिन्न गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल थे। घोष ने बताया कि वह चिकित्सा संबंधी कारणों से फिलहाल असम से बाहर हैं। उन्होंने दोहराया कि असम लौटने पर वह नारायण के कई कथित कारनामों का खुलासा करेंगे।
इस बीच, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने भी इस मामले पर टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दीं। उन्होंने मुख्य रूप से नारायण से सवाल किया कि वह ऐसे व्यक्ति के साथ इतने आत्मीय संबंध कैसे रखते थे, जिसे उनका अपना समाचार चैनल अक्सर ‘अवैध कारोबारी’ बताता रहा है। लीक हुई ऑडियो क्लिप में नारायण को घोष के लिए ‘तुमी’ संबोधन का इस्तेमाल करते सुना जा सकता है। असमिया भाषा में यह आत्मीयता दर्शाने वाला संबोधन है।
लोगों ने सवाल उठाया कि नारायण ने कथित ड्रग रैकेट से जुड़े व्यक्ति के साथ संबंध क्यों बनाए रखे और इसकी सूचना संबंधित सरकारी अधिकारियों को क्यों नहीं दी। असम पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए, खासकर तब, जब राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ड्रग तस्करी के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ यानी सख्त कार्रवाई की नीति की बात करते रहे हैं।
प्रभावशाली सामाजिक कार्यकर्ता सत्य रंजन बोरा ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए समाचार चैनल के मालिक की आलोचना की और उन पर असामाजिक तत्वों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाया। उन्होंने कानून लागू करने वाली एजेंसियों से घटना की गहन जाँच करने और उचित कार्रवाई की अपील की, ताकि भविष्य में असम को ड्रग-मुक्त बनाया जा सके।
वरिष्ठ पत्रकार मणिकुंतल सैकिया ने फेसबुक पर लिखा कि असम में भी अवैध ड्रग्स की एक काली दुनिया पनप गई है। हालाँकि, उन्होंने सवाल उठाया कि इस खतरे को समाप्त करने की पहल आखिर कौन करेगा? ‘डीकेबीफैक्ट’ के संस्थापक दीपक कुमार बरमन ने 14 अक्टूबर 2026 को गुवाहाटी के पलटन बाज़ार पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने नारायण और घोष के बीच हुई बातचीत की जाँच की माँग की, ताकि कथित अवैध ड्रग माफिया के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
जहाँ असम के मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने इस मामले पर चुप्पी साधे रखी—इसके पीछे के कारण वे ही बेहतर जानते होंगे—वहीं हजारों सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने अवैध ड्रग्स के खतरे और मीडिया की नैतिकता के सवाल पर एक मजबूत विमर्श खड़ा कर दिया है।
मीडिया पर नजर रखने वालों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को भाषा की बुनियादी समझ और कुछ आवश्यक कौशल हासिल हैं, तो वह डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी आवाज उठा सकता है। कई बार सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की सामूहिक आवाज पारंपरिक अखबारों और समाचार चैनलों द्वारा निर्धारित विमर्श को चुनौती देने में सक्षम होती है।हाल के दिनों में मीडिया बाजार के सिकुड़ने के कारण मुख्यधारा के मीडिया संस्थान भी डिजिटल माध्यमों की ओर रुख करने के लिए मजबूर हुए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब डिजिटल पत्रकारिता को औपचारिक मान्यता देने और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ-साथ उसे भी उचित स्थान देने का समय नहीं आ गया है? जरूरत पड़े तो संस्था का नाम बदलकर ‘मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया’ भी किया जा सकता है!
हालाँकि, किसी भी मामले में सही और गलत का अंतिम फैसला करना न्यायपालिका का काम है। इस लेख का उद्देश्य इस घटना के संदर्भ में डिजिटल मीडिया और सैटेलाइट समाचार चैनलों की भूमिका, जवाबदेही तथा कार्यप्रणाली का तुलनात्मक मूल्यांकन करना है, न कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष देना।
आज डिजिटल मीडिया की त्वरित प्रसारण क्षमता और व्यापक पहुँच को देखते हुए उसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस प्रसंग में एक सवाल यह भी विचारणीय है कि संबंधित व्यक्ति ने अपना ऑडियो-वीडियो संदेश पारंपरिक मीडिया संस्थानों के बजाय अपने सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से ही सार्वजनिक क्यों किया। यह पहलू भी डिजिटल माध्यमों की बढ़ती उपयोगिता और सार्वजनिक विमर्श में उनकी भूमिका पर विचार करने का अवसर देता है।
(लेखक उत्तर-पूर्व भारत के वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार तथा मीडिया विश्लेषक)



