राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा के संदर्भ में इस इन्फो पैक में चार प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है। इनमें संघ का कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य, संघ–यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव; तथा पंच परिवर्तन जैसे पहलू प्रमुख हैं। इन विषयों के माध्यम से संघ की स्थापना से लेकर उसके विकास, परंपराओं और राष्ट्रजीवन में उसके योगदान तक की एक समग्र जानकारी प्रस्तुत की जा सकती है।
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संघ : कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य
संघ की स्थापना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितम्बर 1925 (विजयादशमी, विक्रम संवत् 1982) को हुई। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन था। तब से सहयोग और सहभागिता के बल पर संघ का कार्य निरंतर बढ़ता गया है। प्रतिदिन चलने वाली शाखाओं के माध्यम से बालक, युवा और प्रौढ़ अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव करते हैं, जिससे समाज में संघ की शक्ति और स्वीकृति सतत बढ़ रही है।आज 100 वर्ष की इस यात्रा ने समाज में उत्सुकता जगाई है कि लोग संघ कार्य को जानें और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उससे जुड़ें।
डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। अंग्रेजों की गुलामी उन्हें गहरी चुभती थी, पर वह मानते थे कि केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सोचा कि भारत गुलाम क्यों बना, इसका मूल कारण खोजकर उसका समाधान करना होगा। आत्मजागृति, स्वाभिमान, एकता, अनुशासन और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण को उन्होंने आवश्यक माना। इसी उद्देश्य से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
श्री गुरूजी के अनुसार,“विजयादशमी के शुभ प्रसंग पर स्वर्गीय डॉक्टर हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर विसृंखलित हिंदू समाज को संगठित करने का कार्य प्रारंभ किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भगवा ध्वज के नीचे संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने का निरंतर कार्य कर रहा है। आज चारों ओर भीषण परिस्थिति उपस्थित है। ऐसी अवस्था में संगठन के बिना बचना संभव नहीं है। हजारों वर्ष की अवनति चुटकी बजाते दूर नहीं हो सकती, यह संघ जानता है। पर इससे हम निराश नहीं हैं। हमारा पूर्ण विश्वास है कि हिंदू समाज संगठित होकर अपने पूर्व गौरव को अवश्य प्राप्त करेगा।“
संघ के प्रारंभिक 15 साल
डॉ. हेडगेवार के निधन के तेरहवें दिन, यानि 3 जुलाई 1940 को नागपुर में डॉ. साहब की श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। सरसंघचालक के नाते श्री गुरूजी ने डॉ. हेडगेवार जी को याद करते हुए बताया कि डॉ. साहब के कार्य की परिणति पंद्रह वर्षों में एक लाख स्वयंसेवकों के संगठित होने में हुई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते हैं, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण किसी भावना या उत्तेजना में आकर नहीं हुआ है। श्रेष्ठ पुरुष, जन्मजात देशभक्त डॉक्टर जी, जिन्होंने बचपन से ही देशभक्ति का परिचय दिया, सब प्रकार का अध्ययन किया और अपने समय में चलने वाले सभी आंदोलनों और कार्यों में हिस्सा लिया, कांग्रेस और हिंदू सभा के आंदोलनों में भाग लिया, क्रांतिकार्य का अनुभव लेने के लिए बंगाल में भी रहे, उन्होंने गहन चिंतन के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना बनाई।”
नागपुर के बाद 1929 में वर्धा और फिर 1932 में पुणे में संघकार्य की शुरुआत हुई। जल्दी ही महाराष्ट्र के अन्य शहरों में भी विस्तार होने लगा। जहाँ 1929 में शाखाओं की संख्या 37 थी, वह 1933 तक 125 हो गई। डॉ. हेडगेवार एक पत्र के माध्यम से लिखते हैं, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य हमने किसी एक नगर या प्रांत के लिए आरंभ नहीं किया है। अपने अखिल हिंदुस्थान देश को यथाशीघ्र सुसंगठित करके हिंदू समाज को स्वसंरक्षण एवं बलसंपन्न बनाने के उद्देश्य से इसे प्रारंभ किया गया है।“
संघ का यह विचार और विस्तार दोनों ब्रिटिश सरकार के लिए अनुकूल नहीं थे। दिल्ली में ब्रिटिश अधिकारी एम. जी. हालौट द्वारा मध्य प्रांत सरकार पर दबाव बनाया गया कि वह संघ को रोकने का प्रयास करे। आखिरकार दिसंबर 1933 में मध्य भारत के शिक्षकों और निकायों के कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से रोक लगा दी गई। मार्च 1934 में प्रतिबंध के विरोध में एक कटौती प्रस्ताव विधानसभा के समक्ष रखा गया। इसके पक्ष में टी.एच. केदार, आर.डब्ल्यू. फुले, रमाबाई तांबे, बी.जी. खापर्डे, आर.ए. कानिटकर, सी.बी. पारेख, यू.एन. ठाकुर, मनमोहन सिंह, एम.डी. मंगलमूर्ति, एस.जी. सपकल और डब्लू.वाई. देशमुख सहित अन्य सदस्यों ने अपनी बात रखी। संघ की अवधारणा का इस प्रकार समर्थन अभूतपूर्व था। बहस के अंत में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध वापस ले लिया गया।
डॉ हेडगेवार के निर्देशन में देशभर में प्रवास होने लगे। भाऊराव देवरस (लखनऊ), राजाभाऊ पातुरकर (लाहौर), वसंतराव ओक (दिल्ली), एकनाथ रानाडे (महाकौशल), माधवराव मूळे (कोंकण), जनार्दन चिंचालकर एवं दादाराव परमार्थ (दक्षिण भारत), नरहरि पारिख एवं बापूराव दिवाकर (बिहार) और बालासाहब देवरस (कोलकाता) ने संघ कार्य का विस्तार करना शुरू किया।
परिणामस्वरूप, लगभग एक दशक बाद देशभर में 600 से अधिक शाखाएँ और लगभग 70,000 स्वयंसेवक नियमित अभ्यास करने लगे।1939 तक दिल्ली, पंजाब, बंगाल, बिहार, कर्नाटक, मध्य प्रांत, बंबई (वर्तमान महाराष्ट्र और गुजरात) में संघ शाखाएँ लगनी शुरू हो गईं।
डॉ. साहब 15 वर्षों तक संघ के पहले सरसंघचालक रहे। इस दौरान संघ शाखाओं के द्वारा संगठन खड़ा करने की प्रणाली डॉ. साहब ने विचारपूर्वक विकसित कर ली थी। संगठन के इस तंत्र के साथ राष्ट्रीयता का महामंत्र भी बराबर रहता था। वे दावे के साथ आश्वासन देते थे कि अच्छी संघ शाखाओं का निर्माण कीजिए, उस जाल को अधिकतम घना बुनते जाइए, समूचे समाज को संघ शाखाओं के प्रभाव में लाइए, तब राष्ट्रीय आज़ादी से लेकर हमारी सर्वांगीण उन्नति करने की सभी समस्याएँ निश्चित रूप से हल हो जाएँगी। इन वर्षों में जिनसे भी उनका संपर्क हुआ, उन्होंने उनकी और उनके कार्यों की हमेशा सराहना की। जिनमें महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, बी. एस. मुंजे, विट्ठलभाई पटेल, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और के. एम. मुंशी जैसे नाम प्रमुख थे।
संघ का कार्य : व्यक्ति निर्माण
1935 में एक भाषण के दौरान डॉ. हेडगेवार कहते हैं, “कोई स्वयंसेवक आज अच्छी तरह से काम कर रहा है और कल वह अपने घर बैठ जाए। यदि किसी दिन कोई स्वयंसेवक शाखा में उपस्थित न रहे, तो तुरंत उसके घर पहुँचकर यह जानकारी लेनी चाहिए कि क्यों नहीं आया।”
राष्ट्रीय चारित्र्य निर्माण और सामूहिक गुणों की उपासना (साधना), उन राष्ट्रीय गुणों का सामूहिक अभ्यास करने तथा अपने ध्येय का नित्य स्मरण करने के लिए संघ में शाखा नामक कार्यपद्धति विकसित हुई। प्रतिदिन एक घंटा चलने वाली शाखा में यह भाव जगाया जाता है कि भारत का सम्पूर्ण समाज एक है, समान है और सभी अपने हैं। साथ ही, उद्यम, साहस, धैर्य, शक्ति, बुद्धि और पराक्रम जैसे गुण विकसित करने हेतु खेल आदि विविध कार्यक्रम शाखा पर होते हैं। अनुशासन, एकता, वीरत्व और सामूहिकता का भाव निर्माण करने के लिए समता-अभ्यास (परेड), बैंड के ताल पर पथ संचलन (Route March) और योग-व्यायाम (पीटी) जैसे कार्यक्रम शाखा में प्रारम्भ हुए और आज भी हो रहे हैं।
शाखा व्यक्ति-निर्माण की सतत साधना है। समाज को अपना मानकर उसके लिए कुछ न कुछ और कभी-कभी सब कुछ अर्पित करने का संस्कार यहीं से मिलता है। इस विचार को व्रत के रूप में स्वीकार कर जीवन भर उसका पालन करने का संकल्प लेकर जीने वाले हजारों स्वयंसेवक सक्रिय हैं। ऐसे सहयोगी कार्यकर्ताओं को देखकर प्रेरित हुए हजारों-लाखों स्वयंसेवकों के द्वारा आनंदपूर्वक यह समर्पण-यज्ञ अविरल चल रहा है।
श्री गुरुजी का मानना है कि संघ केवल संगठन का काम करने वाला है। उसे न तो नाममात्र के अनुयायियों की फौज खड़ी करनी है और न ही किसी प्रकार की राजनीति करनी है। संघ तो सामाजिक जीवनयुक्त उत्कृष्ट नागरिक तैयार करना चाहता है और इसके लिए वह आवश्यक अनुशासन उन्हें सिखाता है। यह सीधा-साधा काम हैं।
श्री गुरूजी के अनुसार संघ की आवश्यकता
संघ के 20 वर्ष पूरे होने पर श्री गुरुजी ने कहा था,“20 वर्ष पूर्व जब संघ का जन्म हुआ, तब यह बात तो नहीं थी कि भारतवर्ष में कोई दूसरी संस्था ही नहीं थी। देश में कितनी संस्थाएँ थीं, जो अपने-अपने पथ पर चलकर, अपने-अपने तरीके से काम कर रही थीं, परंतु ‘हिंदुस्थान हिंदुओं की स्वाभाविक जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि है’, इसका ध्यान किसी को भी नहीं था। इस बात का विस्मरण ही हो गया था। अपनी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता, इतिहास आदि को भुलाकर लोग नए सिरे से काम करने निकले, मानो यहाँ पहले कभी कुछ था ही नहीं। विद्वान लोग कहते थे – हमारा राष्ट्र अभी बनने जा रहा है। प्राचीनकाल से भारतवर्ष में एक सभ्य समाज है और यह स्वयं एक महान राष्ट्र है, इसका ज्ञान लुप्त-सा हो गया था। अपने अतीत को हम भूल गए थे, उससे हमें घृणा होने लगी थी। हमें ‘हिंदू’ नाम से भी घृणा हो गई थी। परंतु जो मनुष्य अपने अतीत से घृणा करता है, वह भविष्य कदापि नहीं बना सकता।”
श्रीगुरुजी का मानना है कि हिंदुओं की यह प्रवृत्ति एक अतीव भव्य संस्कृति का विनाश करने की प्रवृत्ति है। हमारी संस्कृति विशाल है, जो केवल मनुष्य को ही नहीं, अपितु अखिल चराचर सृष्टि को आत्मवत् मानती है। हमारी संस्कृति के स्थापक ऋषि-मुनियों ने दूसरों को अवश्य अपनाया है, पर अपने आत्मीयजनों को ठुकराकर नहीं। ‘स्वयं जीवित रहो और दूसरों को भी रहने दो’ की नीति पर भारतीय चलते हैं। हम समझने लगे हैं कि केवल गत सौ वर्षों से ही हमें नया ज्ञान होने लगा है, उसके पहले देश में अंधकार था।
श्रीगुरुजी कहते हैं निःस्वार्थ भाव से देशकार्य के लिए अपना जीवन लगा देने का निश्चय कितने अंतःकरणों में है? वह आगे कहते है, कि ‘मेरा समाज मेरा देव है, मेरा ध्येय है’ — यह भाव दिखाई नहीं देता।
श्रीगुरुजी के अनुसार संघ इसलिए पैदा हुआ कि हर एक हिंदू हिंदूपन, अपने हिंदू गौरव, हिंदू जीवन, हिंदू परंपरा, हिंदू इतिहास का अभिमान करे, अपने को हिंदू समझे।”
गुरुजी कहते हैं कि हिंदू समाज के संगठन के लिए व्यक्ति को समष्टि जीवन जीने का अभ्यास होने की आवश्यकता है, यही बताने के लिए संघ का जन्म हुआ है। हमें हिंदू समाज को इतना सामर्थ्यशाली बनाना है कि कोई उसकी ओर गलत दृष्टि से देखने की हिम्मत न कर सके।
वर्तमान में संगठन का विस्तार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वार्षिक रिपोर्ट में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष देशभर में 51,740 स्थानों (स्थान) पर 83,129 शाखाएँ संचालित हो रही थीं। अब यह संख्या बढ़कर 55,683 स्थानों पर 88,949 शाखाओं तक पहुँच गई है। इस प्रकार, एक वर्ष में 3,943 नए स्थान जुड़े हैं और शाखाओं की कुल संख्या में 5,820 की वृद्धि हुई है। यह संगठन की गतिविधियों के निरंतर और व्यापक विस्तार को दर्शाता है।
संघ और युवा
राष्ट्र–निर्माण के लिए युवकों को आह्वान : सामान्यतः अपने भाषणों में श्री गुरुजी युवकों का उत्साह बढ़ाते हुए उनका आह्वान कर कहा करते थे कि “हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति से देशभक्ति की यह ज्योति जगाएँ। उसे देशव्यापी व प्रखर बनायें। उस प्रकाश में सम्पूर्ण अज्ञानान्धकार लुप्त हो जाएगा। वह प्रकाश दुनिया की समस्त आसुरी शक्तियों को चुनौती देगा, दृढ़ नींव पर अजेय खड़ा रहेगा और सम्पूर्ण दुनिया को सिद्ध कर देगा कि हम इस श्रेष्ठ राष्ट्र के सुपुत्र हैं। केवल इसी मार्ग से हम सफल हो सकते हैं।”
श्री गुरूजी का मानना है कि “कार्य को करने का निश्चय करो, लोगों के पास जाओ, उनसे सम्पर्क स्थापित करो और ऐसा दृढ़ संगठन बनाओ, जो किसी भी परिस्थिति में भी अडिग रहे। कंधे से कंधा लगाकर काम करो। आगे बढ़ो, बढ़ते ही रहो। समय व्यर्थ नष्ट मत करो। व्यक्ति-व्यक्ति को सुसंगठित करो और संगठन से राष्ट्र निर्माण करो। आपमें युवकोचित उत्साह, साहसवृत्ति, संकटों से लड़ने और सफलता प्राप्त करने की शक्ति है। बढ़ते जाओ, भविष्य उज्ज्वल है।”
5 जुलाई 1955 को रविशंकर शुक्ल की 79 वीं वर्षगाँठ पर अभिनन्दन करते हुए देश की युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए श्री गुरूजी कहते हैं कि उनका यह परिश्रम से भरा हुआ जीवन, देश के हित सर्व प्रकार के कार्यों में अविरत रूप से व्यस्त जीवन आज की तरुण पीढी में अध्यवसायी वृत्ति, श्रम करने का उत्साह, कर्तव्य-पथ पर अडिग रहने का धैर्य प्रदान करने में समर्थ है। मैं आशा करता हूँ कि इन गुणों का तथा धर्मप्रेम एवं आचरण का यह आदर्श अपनाकर देश का युवक वर्ग अपने-आपको योग्य राष्ट्रसेवक के रूप में उपस्थित करने में यत्नशील होगा।
श्रीगुरूजी का मानना है कि राष्ट्रोत्थान साहसी युवक ही कर सकते हैं। वे कहते हैं किजीवन में भोगप्रवणता को त्याग केवल राष्ट्रहितसाधक, स्वार्थशून्य भाव भरकर यह राष्ट्रोत्थान कार्य सफल करने का साहस आज का युवक वर्ग ही कर सकता है। आप तथा अन्य छात्रबंधु अपनी इस श्रेष्ठता को पहचानते ही हैं! अत सद्य स्थिति में जो अनेकविध समस्याएँ राष्ट्र के सम्मुख खडी हैं, उन्हें नष्ट करने के दायित्व को निभाने के लिए योग्यतम बनने का उद्योग आप सब मिलकर करें।
5 जुलाई 1955 को श्री नाना ढोबले को लिखे पत्र में श्रीगुरूजी कहते हैं कि हमें राष्ट्रनिर्माण में अभी कितने ही उत्साही युवकों की आवश्यकता है। वर्ष दो-वर्ष घर की चिंता छोड़कर कार्य करनेवाले तथा परिस्थिति के अनुसार घर जाकर उसके बाद व्यक्तिगत उद्योग करने को विवश होने पर, काम-धंधा शुरू कर पहले जैसे उत्साह और शक्ति से खून-पसीना एक कर कार्यरत होनेवाले अनेक युवक सामने आएँ, यह कार्य की आवश्यकता है। परंतु यह एकदम कैसे संभव है? जिस प्रकार एक-एक मणि जोड़कर माला गूँथी जाती है, इस प्रकार धीमे-धीमे कार्य करना होगा। आपके (नासिक) विभाग में शांति से प्रयत्न करने पर कुछ मात्रा में सफलता मिलेगी ही।
4 सितंबर 1959, डॉ. सबा जोशी को लिखे एक पत्र में गुरूजी कहते हैं कि धीरे-धीरे प्रयत्न किया तो अच्छे एवं जीवन में ध्येय की खोज करनेवाले बुद्धिमान शीलवान युवक खोजे जा सकते हैं।
श्री गुरूजी 14 जुलाई 1969 में लिखे एक पत्र में कहते हैं कि बालकों-युवकों को अपने धर्म की महत्ता समझाएँ। अपने बालकों-युवकों को संक्षेप में, सरल भाषा में, अपने धर्म की तर्कसंगत महत्ता समझा कर, उसके योग्य श्रेष्ठ पवित्र जीवन जीने की तथा उस जीवन की निस्वार्थ कर्तव्यनिष्ठा में से स्वसमाज, स्वराष्ट्र को पवित्र गुणसपन्न, समृद्धिसंपन्न ऐश्वर्ययुक्त बनाने की शुद्ध आकांक्षा जागृत करनेवाली विचारप्रवर्तक पुस्तकें तथा अन्य प्रकार का प्रचार अत्यंत आवश्यक है। यह आवश्यकता पूर्ण करने का प्रयास प्रत्येक को करना चाहिए। इस दिशा में यह अल्प-सा, परंतु बहुगुणी प्रयत्न अत्यंत उपयोगी और अभिनंदनीय है।(मूल मराठी)
साहित्य के माध्यम से युवकों का संस्कार : श्रीगुरूजी साहित्य के माध्यम से युवकों का संस्कारदेने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि अपनी संस्कृति की आस्था के अभाव में कितने ही अच्छे युवक राष्ट्रविरोधी शक्तियों के समर्थक बने हैं, बनते जा रहे हैं। बडे-बडे जननेता भी अपनी सांस्कृतिक परंपरा के प्रतिकूल मानव का वास्तविक कल्याण सिद्ध करने में अक्षम विचारधाराओं का प्रचार कर अपने ही देशबांधवों को स्वदेश-विरोधी बनाने में प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता दे रहे हैं। इस वायुमंडल को विषमुक्त कर उसे शुद्ध, पवित्र भारतीयत्व से भरने का कार्य साहित्यकार उत्तम रीति से कर सकते हैं।
देश के तरुणों के प्रति चिंता : श्री गुरूजी देश के तरुणों के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि राष्ट्रीयता को सांप्रदायिक और संकुचित कहकर उसकी भीषण अवहेलना हुई है। इससे राष्ट्र के सच्चे स्वरूप का विस्मरण हो चुका है। इन कारणों से समाज की तरुण पीढी वैचारिक क्षेत्र में आधारहीन हो गई है। तरुणों की बुद्धि के लिए कोई आधार ही शेष नहीं बचा। देश, धर्म, राष्ट्र किसी भी प्रकार की शुद्ध भावना उन्हें नहीं मिलती। परिणाम यह है कि उन्हें चारों ओर अराष्ट्रीय विचारों के जो बवंडर दिखाई पडते हैं, उनकी और वे खींचे जाते हैं। इन बवंडर का विस्तार होता रहता है। इन कारणों से हमारे राष्ट्रीय जीवन पर जो आघात होते हैं, उनका लाभ अहिंदू लोगों को ही होता है। इससे उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं। विभिन्न दल और जातियों के बीच आपसी संघर्ष की जो दुर्भाग्यपूर्ण क्रिया चल पडी है, वह हमारे मार्ग में बडा रोडा बनी है। साथ ही कुछ लोग सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए उन सभी लोगों को, जो राष्ट्रविरोधी, धर्मविरोधी, हिंदू-समाज विरोधी हैं, एकत्र करने का प्रयत्न कर रहे हैं। समाजविरोधियों को आत्मीय मानना और अपनों को तिरस्कृत करने की यह प्रवृत्ति हिंदू समाज पर बहुत बडा आघात करनेवाली है।
संगठित युवा–शक्ति : श्रीगुरूजी युवा शक्ति को स्वस्थ कार्यों में लगाने पर विशेष बल देते हैं। उनका विचार है कि विद्यार्थी-संगठनों का अन्य राजनैतिक या आंदोलनकारी पक्षों से पूर्ण विच्छेद कर देना चाहिए और उनकी शक्तियों को ज्ञान-संवर्धक, सेवाभावी, श्रम-प्रतिष्ठा बढानेवाले, बंधुभाव एवं सामूहिक जीवन निर्माण करनेवाले स्वस्थ कार्यों में लगाना चाहिए। विद्यार्थी संगठन बंद कर देना- यह समस्या का कोई उपाय नहीं है। विद्यार्थी-संगठनों को बढावा देना, विशेषत महाविद्यालय के स्तर पर अत्यावश्यक है। शालेय अवस्था में विद्यार्थी बहुत अपरिपक्व रहते हैं। न वे विद्यार्थी-संगठन का अर्थ समझ सकते हैं और न वे उनको चला ही सकते हैं। महाविद्यालय में संगठनों का कार्य एक और बात के लिए भी आवश्यक है। इन संगठनों के कार्य द्वारा तरुणों में विद्यमान अतिरिक्त शक्ति को समुचित दिशा प्राप्त होती है।
युवकों की निराशा के कारणों पर विचार : श्री गुरूजी युवकों की अनुशासनहीनता के पीछे छिपे कारणों पर बात करते हुए कहते हैं कि आज के युवकों पर सद्वर्तन के कोई भी संस्कार नहीं किए जाते। उन्हें जीवन में एक प्रकार की अस्थिरता एव असुरक्षितता दिखाई देती है। परिणाम यह हुआ है कि वे हताश हो गए हैं। जिसके लिए वे अपनी शक्तियाँ लगाएँ और यत्न करें, ऐसा न तो कोई ध्येय उनके सामने है और न जनता में तथाकथित नेताओं अथवा मार्गदर्शकों का कोई प्रेरणादायक आदर्श ही है। ‘गृह’ नाम की संस्था आज पूरी तरह ढह गई है। ये कुछ कारण हैं, जिनके फलस्वरूप क्षोभ, अशांति, आदि बातें उत्पन्न होती हैं। इन्हीं को हम युवकों, अर्थात् विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता कहते हैं।श्री गुरूजी का विचार है कि विद्यार्थी अवस्था में सादगी व संयम-नियमपूर्वक रहने, मन को व्यसनों और दुर्गुणों की ओर जाने का अवसर न देने आदि की सतर्कता यदि हम रखते हैं, तो युवक अवांछनीय कार्यो एव अवांछनीय व्यवहार से दूर रह सकते हैं।
विद्यार्थियों और युवकों के लिए ध्येयोन्मुख शिक्षा–प्रणाली जरूरी : श्री गुरूजी चिंतन करते हैं कि अपने इस विशाल युवक समुदाय को महान समाज-रचना में योग्य एव गुणवान नागरिक किस प्रकार बनाया जाए, यही आज की वास्तविक समस्या है। इस समस्या का हल केवल सतही विचार करने से अथवा ऊपर-ऊपर मरहम-पट्टी करने से नहीं निकलेगा। इसके लिए श्रीगुरूजी ध्येयोन्मुख शिक्षा-प्रणाली को उपाय के रूप में देखते हैं। उनका विचार है कि विद्यार्थियों की ग्रहणशील आयु में, उनके मन पर सतत संस्कारों से यह सत्य अंकित कर देना चाहिए कि कर्त्तव्य सर्वोपरि है और सब अधिकार, चाहे व्यक्ति के हों, चाहे समूह के, कर्त्तव्य-सापेक्ष हैं और कर्त्तव्य की तुलना में गौण हैं। विद्यार्थियों में समुचित कर्त्तव्य-भावना जागृत करने के लिए हमारी शिक्षा-प्रणाली ध्येयोन्मुख होनी चाहिए।
संघ और महिलाएँ
हमारी परिवार व्यवस्था की धुरी माँ होती है। मातृशक्ति का सम्मान करने का स्वभाव परिवार के प्रत्येक सदस्य में आना चाहिए। सामूहिक निर्णय हमारे परिवार की परंपरा बननी चाहिए। परिवार के सदस्यों में अधिकारों की जगह कर्तव्यों पर चर्चा होनी चाहिए। प्रत्येक के कर्तव्य-पालन में ही दूसरे के अधिकार निहित हैं। (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, ग्वालियर, 10 मार्च 2019, प्रस्ताव-1)
मातृशक्ति पर सरसंघचालक जी के विचार :
- संघ में महिलाओं की स्थिति : डॉ. हेडगेवार से एक महिला ने 1931 में पूछा कि आप बात कर रहे हो हिन्दू समाज के संगठन की, लेकिन 50 प्रतिशत महिलाओं को तो वैसे ही छोड़ दिया आपने। तब डॉ. हेडगेवार ने उनको कहा कि आपकी बात बिल्कुल ठीक है, परंतु आज वातावरण ऐसा नहीं है कि पुरुष जाकर महिलाओं में काम करे। इससे कई प्रकार की गलतफहमियों को मौका मिलता है। कोई महिला अगर काम करने को जाती है तो हम उसकी पूरी मदद करेंगे। तब उस महिला ने इसी प्रकार चलने वाला एक ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नाम का संगठन चलाया। आज वह भी भारतव्यापी संगठन बन गया है। संघ के संस्कारों की कार्यपद्धति पुरुषों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में, महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति में, ये दोनों समानांतर चलेंगे। एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र में काम नहीं करेंगे, एक-दूसरे की हमेशा मदद करके चलेंगे। ये उस समय तय हुआ। अगर इसको बदलना है तो दोनों तरफ लगना चाहिए कि इसको बदलना है तब वह होगा, नहीं तो नहीं होगा, ऐसे ही चलेगा। परंतु संघ के स्वयंसेवक जो अन्य काम करते हैं, सेवा कार्य करते हैं, 1 लाख 70 हजार से ऊपर छोटे-बड़े सेवा प्रकल्प चलते हैं। यह 5 साल के पहले का आँकड़ा है, 5 साल के बाद की गिनती अभी हो रही है। इस साल वह आँकड़ा आ जाएगा। उसमें तो महिला, पुरुष सभी काम करते हैं। संघ कोई संन्यासियों का संगठन नहीं है। अधिकांश स्वयंसेवक गृहस्थ कार्यकर्ता हैं। घरों में आना-जाना रहता है। हमारी माताएँ, बहनें अपनी-अपनी जगह से भी बहुत मदद सीधे संघ के कार्य को करती हैं। इतने सारे विविध कार्य चलते हैं, उसमें महिलाएँ आई हैं और आगे भी आएंगी। (भविष्य का भारत, पृष्ठ 37)
- संघ में महिलाओं की भागीदारी : संघ के प्रारम्भिक दिनों में, 1933 के आस पास, यह व्यवस्था बनी कि महिलाओं में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा ही होगा। वह व्यवस्था चल रही है। जब राष्ट्र सेविका समिति कहेगी कि संघ भी महिलाओं में यह काम करे, तभी हम उसमें जाएंगे। दूसरी बात ये है कि संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है। उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं। परन्तु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता। हमारी माता-बहनों का हाथ लगता है, तभी संघ चलता है। संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में हैं। विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है। इन महिलाओं ने पहली बार भारत के महिला जगत का व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसको शासन ने भी स्वीकारा है। उन्हीं के द्वारा पिछले वर्ष सारे देश में बहुत बड़े महिला सम्मेलन हुए, जिनमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया। इन सब कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन व सहयोग रहा। हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उद्धार पुरुष नहीं कर सकते। महिलाएं स्वयं अपना उद्धार करेंगी, उसमें सबका उद्धार हो जाएगा। इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उनको सशक्त बनाते हैं। (डॉ. मोहन भागवत, साक्षात्कार@संघ शताब्दी, 10 अप्रैल 2025, विमर्श प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 26)
- महिलाओं का विचार करते समय भी हमारा विचार यही है। हमारे देश में प्राचीन समय से ही महिलाओं को अत्यंत बड़ा स्थान दिया है। वैचारिक रूप से उन्हें हम शक्तिस्वरूपा, जगदंबा का रूप मानते हैं, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। अब ये तो ठीक है कि उनको भगवान बनाकर मंदिर में स्थापित करके पूजने की भी आवश्यकता नहीं और ना ही उनको दासता की कड़ी में ढकेलने की जरूरत है। महिला समाज का एक हिस्सा होने के नाते समाज जीवन के सब प्रयासों में बराबरी की हिस्सेदार है, बराबरी की जिम्मेदार है और उसी तरह उनके साथ व्यवहार होना चाहिए। लेकिन यह इस ढंग से नहीं होना चाहिए कि बेचारी महिला का ‘हम उद्धार करेंगे’। हमारा और आपका भी यह अनुभव होगा कि कई मामलों में महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा समर्थ हैं, पुरुषों की तुलना में वे उसी काम को अधिक कुशलता और निपुणता से कर लेती हैं। उनको और सशक्त करने की जरूरत है, स्वतंत्रता देने की जरूरत है और ऐसे काम करने के लिए उनको प्रबुद्ध बनाने की जरूरत है। (डॉ. मोहनराव भागवत, भविष्य का भारत, विमर्श प्रकाशन, नई दिल्ली,पृष्ठ 44)
- संघ की इच्छा है कि अपने घर से लेकर समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वत्र मातृशक्ति जागरण का काम होना चाहिए। संघ के स्वयंसेवक और संघ के साथ जुड़े हुए परिवारों की महिलाएँ, स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे अनेक संगठनों में सहभागी महिलाएँ मिलकर ये काम करती हैं। महिला और पुरुष एक–दूसरे के पूरक हैं, सार्थक जीवन के लिए दोनों को बराबरी से काम करना होगा। निर्णयों से लेकर दायित्वों तक में उनकी बराबरी से सहभागिता होनी चाहिए, राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका भी होनी चाहिए। महिलाओं के बारे में संघ का यह सुविचारित मत है। (डॉ. मोहनराव भागवत, भविष्य का भारत, विमर्श प्रकाशन, नई दिल्ली,पृष्ठ 44)
- महिलाएँ और संघ का दृष्टिकोण : लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा- यह सुनिश्चित करने के लिए दो-तीन बातें करनी पड़ेंगी। पुराने जमाने में महिलाओं का जब घर के अंदर बंद होना निश्चित रहता था तब उसकी जिम्मेवारी परिवार पर रहती थी। लेकिन अब महिलाएँ भी पुरुषों की बराबरी से बाहर आकर कर्तृत्व दिखा रही हैं और उन्होंने दिखाना चाहिए। तो उनको अपनी सुरक्षा के लिए भी सजग और सक्षम बनाना पड़ेगा। इसलिए किशोर आयु के लड़के और लड़की दोनों का प्रशिक्षण करना पड़ेगा- किशोरी विकास, किशोर विकास। ये काम संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं, क्योंकि महिला असुरक्षित कब हो जाती है, जब पुरुष उसकी ओर देखने की अपनी दृष्टि को बदलता है। (भविष्य का भारत, पृष्ठ 77)
- जब सुप्रीम कोर्ट से बलात्कारियों को कड़ी सजा हो गई थी, उसकी चर्चा टी.वी. पर चल रही थी। मैं बैठा सुन रहा था तो एक महिला पत्रकार कह रही थी कि केवल अपराधियों को सजा होने से काम नहीं चलता। मूल समस्या यह है कि महिलाओं को देखने की पुरुष की दृष्टि बदलनी पड़ेगी। यह दृष्टि हमारी परम्परा में है ‘मातृवत् परदारेषु‘। अपनी ब्याहता पत्नी छोड़कर बाकी सबको माता के रूप में देखना। यह अपना आदर्श है। उन संस्कारों को पुरुषों में भी जगाना पड़ेगा। इसलिए किशोर और किशोरी विकास के उपक्रम चलें और महिलाओं को आत्मसंरक्षण की कला सिखाने वाले उपक्रम भी बढ़ें। इसमें भी स्वयंसेवकों ने काम प्रारंभ किया है। बड़ी मात्रा में स्कूल, कॉलेज की छात्राओं को इसका प्रशिक्षण देना और फिर प्रशिक्षण की स्पर्धाएँ भी आयोजित करना, पिछले वर्ष से ये उपक्रम शुरु हुआ है। आगे चलकर देश के सब राज्यों में ये शुरु होगा। संघ के स्वयंसेवक इसको करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल शाखा चलाता है, और कुछ नहीं करता। लेकिन संघ के स्वयंसेवक ये करते हैं तो विद्यार्थी परिषद् के द्वारा यह उपक्रम शुरु किया गया है और उसके बड़े-बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं और यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वे देशव्यापी कार्यक्रम चलाएंगे। (भविष्य का भारत, पृष्ठ 77)
- मातृशक्ति के सशक्तिकरण की बात आज हम करते हैं, लेकिन मातृशक्ति कितनी सशक्त है और क्या- क्या कर सकती है, कैसे कर सकती है? इसका अनुकरण करने लायक आदर्श देवी अहिल्याबाई ने अपने जीवन से हम सब लोगों के सामने रखा है। उन्होंने जो काम किया वो अनेक प्रकार से विशेष है। राज्य को उन्होंने कुशलतापूर्वक चलाया। उस समय सभी राज्यकर्ताओं से उनके संबंध मित्रता के थे, इतना ही नहीं तो आसपास के सभी राज्यकर्ता भी उनको देवी स्वरूपा मानते थे। इतनी श्रद्धा और आदर उनके बारे में समकालीन राज्यकर्ताओं में था। राज्य पर कोई आक्रमण न हो, इसलिए समरनीति की जानकार के रूप में भी उनको जाना जाता है। बड़ी सेना लेकर राघोबा दादा आए थे, लेकिन उन्होंने अपनी नीति से और बिना संघर्ष के उस आपत्ति का निवारण कर दिया। ऐसी कुशल प्रशासक, उत्तम राज्यकर्ता, सामरिक और राजनयिक कर्तव्यों में माहिर राज्यकर्ता थीं, और केवल अपने राज्य की उन्होंने चिंता नहीं की पूरे देश की चिंता की।
- अपने देश की संस्कृति का जो आधार है, उसको पुष्ट करने के लिए देश में अनेक स्थानों पर उन्होंने मंदिर बनवाए। स्वयं राज्य करती थीं, तो भी अपने को राजा नहीं मानती थीं। “श्री शंकर कृपे करूण” ऐसा लिखती थीं। श्री शंकर आज्ञेकरूण – शिव भगवान की आज्ञा से राज्य चला रहीं हैं, ऐसा उनका भाव था। उन्होंने कई जगह मंदिर बनवाए, नदियों पर घाट बनवाए, धर्मशालाएं बनवाई। उन्होंने सारे भारत में यह कार्य किया। जो धर्मयात्राओं के मार्ग थे और व्यापारिक आने जाने के मार्ग थे, उन पर यह सारे काम किए ताकि पूर्ववत भारत की सारी जनता का आना जाना अपने सांस्कृतिक स्थलों में और अपनी आजीविका के लिए सर्वत्र चलता रहे। एकात्मता बनती रहे, बढ़ती रहे। इतना दूर का विचार करके उन्होंने यह काम किया और विशेष है कि अपनी धर्म श्रद्धा के कारण किया। इसलिए उन्होंने यह सारा काम अपनी निजी संपत्ति में से किया।
- स्वयं रानी होकर बहुत सादगी से रहती थीं। इस प्रकार प्रजा का पालन, राज्य का संचालन, राज्य की सुरक्षा, देश की एकात्मता-अखंडता, सामाजिक समरसता, सुशीलता और सादगी, इनका आदर्श रखने वाली एक महिला राज्यकर्ता, आदर्श महिला इस प्रकार पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई का चित्र हमारे सामने है। (पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर महिलाओं के कर्तृत्व की क्षमता की प्रतीक हैं – पूजनीय सरसंघचालक जी)
मातृशक्ति संगम : जयपुर में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी का व्याख्यान 29 सितम्बर, 2018
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि भारतीय विचार परम्परा में पुरुष और महिला को एक–दूसरे का पूरक माना गया है। महिला और पुरुष दोनों के अपनी–अपनी प्राकृतिक गुण संपदा के आधार पर साथ चलने से ही सृष्टि चलती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं में कई भिन्न–भिन्न कार्यों को साथ–साथ कर पाने की नैसर्गिक क्षमता होती है। पुरुष अपनी आजीविका के माध्यम से परिवार को चलाने और उसे सुरक्षा प्रदान करने का काम करते हैं, तो महिलाएं इन कार्यों के साथ–साथ संतान को अपने वात्सल्य भाव से योग्य बनाने और परिवार को एक बनाए रखने की जिम्मेदारी भी कुशलता से निर्वहन करती हैं। महिलाएं पुरूषों से किसी भी तरह कमतर नहीं हैं, अपितु जो कार्य पुरुषों के लिए सम्भव नहीं, वह कार्य भी महिला करने में समर्थ है। देश का 50% हिस्सा महिलाओं का है,उनके सहयोग के बिना देश की उन्नति संभव नहीं। सरसंघचालक जी शनिवार 29 सितंबर को जयपुर के इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान में आयोजित मातृशक्ति संगम को सम्बोधित कर रहे थे।
- उन्होंने कहा कि संघ में व्यक्ति नहीं परिवार जुड़ता है। महिलाओं के सहयोग के बिना पुरूषों के लिए संघ कार्य को पर्याप्त समय देना सम्भव नहीं।संघ के व्यापक तौर में सीधे रूप से सेवा, संपर्क, प्रचार, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता आदि में भी मातृशक्ति सहयोग कर रही है। जिस प्रकार महिलाएं परिवार का कुशल नेतृत्व करती आई हैं, उसी प्रकार आज के समय में समाज के भी प्रमुख कार्यों में नेतृत्व दे रही हैं, यह हमारे लिए अच्छे संकेत हैं।
- महिला सुरक्षा के लिए कठोर कानून क़ी आवश्यकता है, परंतु कानून की अपनी सीमाएं है। सिर्फ कठोर कानून बनाने से नहीं समाज जागरण से ही पूर्ण समाधान संभव है। विवेक विकसित करने और संस्कारों के संपादन से ही यह हमको करना होगा। उन्होंने कहा कि इसी कारण भारतीय संस्कृति में वह नारी शक्ति के बजाय मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है, जबकि पश्चिम में महिला को मात्र स्त्री और पत्नी के रूप में देखा गया।
- डॉ मोहन जी ने कहा कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में नारी सशक्तिकरण आंदोलन पश्चिम की देन माना जाता है, लेकिन वहां पुरुष को अधिकार-सक्षम और महिला को गुलाम मान कर नारी मुक्ति पर बल दिया गया। इसका परिणाम वहां परिवार और विवाह संस्था पर खतरे के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा कि भारत में परिवार संस्था कई विषम परिस्थितियों को झेलने के बाद भी सुदृढ़ बनी हुई है, जिससे सीख लेते हुए आज पश्चिम में भी परिवार संस्था को पुनः मजबूत करने के प्रयास होने लगे हैं।
- पुरुषों को महिलाओं को देवी अथवा दासी मानने के स्थान पर वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप उनके प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। पौराणिक कथाओं में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं कि जब देवता भी किसी कार्य को पूर्ण नहीं कर सके तो वे उसके लिए जगतजननी की शरण में गए। इसलिए महिलाओं का अपने कल्याण के लिए पुरुषों की ओर देखने के बजाय स्वयं ही जाग्रत होना होगा।
- सरसंघचालक जी ने कहा कि मातृशक्ति का उत्थान इस राष्ट्र की उन्नति के लिए अनिवार्य शर्त है, जबकि रीति-रिवाज, परिवेश और परिस्थिति के अनुसार भारत में अलग-अलग स्थानों पर महिलाओं की स्थिति में बहुत बड़ा अंतर है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुख भूमिका निभा रही महिलाएं मातृशक्ति के उत्थान के लिए आगे आएं।
- उन्होंने कुटुम्ब में संस्कारों का स्तर गिरने और इंटरनेट सहित बाहरी प्रभावों के कारण बाल मनोवृत्ति पर हो रहे दुष्प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि दबे पांव, चोरी छिपे आ रहे सांस्कृतिक संकट से अपने परिवार और समाज को बचाने के लिए महिलाओं को आगे आना होगा।वर्तमान समय में हमें अपने अंदर नीतिकारक और अनीतिकारक में भेद करने की दृष्टि विकसित करनी होगी, इसके लिए हमें Legality (विधि संगत) के साथ Morality (नैतिकता) और Naturality (प्रकृति सम्मत) का भी विचार करना होगा।
- मातृशक्ति संगम में राजस्थान के सभी जिलों के विभिन्न स्थानों पर समाज जीवन में अग्रणी भूमिका निभा रही 284 महिलाएं उपस्थित रहीं।
प्रश्न : संघ में महिलाओं की भागीदारी को लेकर क्यों प्रश्न खड़े होते हैं ?
जवाब : संघ की मुख्य संगठनात्मक संरचना का प्रारूप शुरुआत से ही ऐसा है, जिसमें पुरुषों को शामिल किया जाता है। किन्तु इसका आशय यह नहीं है कि यह महिला विरोधी है अथवा महिलाओं को लेकर समाज से कोई भिन्न राय रखता है। सरसंघचालक डॉ. भागवत के अनुसार “संघ महिलाओं को हाशिये पर नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र-निर्माण की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखता है। संगठनात्मक संरचना भले भिन्न हो, पर वैचारिक स्तर पर पुरुष और महिला – दोनों की भूमिका समान रूप से अनिवार्य मानी जाती है।“
सितंबर 2025 में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा था, “मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि संघ में कितनी महिलाएँ हैं। मेरा उत्तर है, संघ में जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएँ भी हैं।” उन्होंने आगे कहा कि संघ का कार्य महिलाओं के बिना संभव ही नहीं है। कोई भी स्वयंसेवक अपनी माँ, पत्नी या बहन के सहयोग और सहमति के बिना संघ कार्य नहीं कर सकता। समाज के लिए स्वयंसेवक जो दायित्व निभाते हैं, उसके पीछे परिवार की महिलाओं की मौन लेकिन निर्णायक भूमिका होती है।“
संघ का मानना है कि समाज में वास्तविक परिवर्तन लाना है, तो आधी आबादी को अलग रखकर ऐसा संभव नहीं है। इसी सोच के अनुरूप महिलाओं के लिए संघ की विचारधारा से प्रेरित राष्ट्रीय सेविका समिति कार्यरत है, जो महिलाओं के चरित्र-निर्माण, नेतृत्व विकास, सामाजिक सेवा और राष्ट्रबोध के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाती है।
यह सर्वविदित है संघ की स्थापना के एक दशक के बाद, 1936 में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ का गठन हुआ था। यह कार्य डॉ. हेडगेवार के समय ही हुआ था। इसकी संस्थापक वन्दनीय लक्ष्मीबाई केलकर ‘मौसी जी’थी और वह श्रीगुरूजी के समकालीन थी। उनके बाद, सेविका समिति का कार्य सरस्वती बाई आपटे जी, उषा ताई चाटी जी, प्रमिलाताई मेढे जी ने आगे बढ़ाया और वर्तमान में शान्ताक्का जी इसे संभाल रही है।
सेविका समिति की लगभग 4900 दैनिक शाखाएं लगती है। साथ ही, इसके वार्षिक प्रशिक्षण वर्गों में 10,000 महिलायें हिस्सा लेती हैं। इसके साथ-साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में 1948 से ही छात्राएं शामिल होती रही है।
यही नहीं, संघ से जुड़े कई अनुषांगिक संगठनों – अधिवक्ता परिषद, इतिहास संकलन समिति, भारतीय मजदूर संघ, विज्ञान भारती, विद्या भारती, भारतीय जनता पार्टी, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम,संस्कार भारती, और प्रज्ञा प्रवाह में न सिर्फ महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी देखी जा सकती है बल्कि महिला-विमर्श से जुड़ें प्रत्येक पहलू पर भी ये सभी संगठन विचार-विमर्श करते रहते हैं।



