माननीय प्रधानमंत्री महोदय,
भारत सरकार,
नई दिल्ली।
विषय: सभी उत्पादों पर राजभाषा हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं की अनिवार्यता एवं भाषाई भेदभाव को समाप्त करने के संबंध में।
महोदय,
एक उपभोक्ता होने के नाते इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान एक अत्यंत गंभीर एवं राष्ट्रव्यापी समस्या की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। यह विषय सीधे तौर पर देश के करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकारों और उनके आत्मसम्मान से जुड़ा है।
भारत में लगभग ९5 प्रतिशत नागरिक अंग्रेजी भाषा में पारंगत नहीं हैं। इसके उपरांत भी, देश में बिकने वाले सभी उत्पादों, जीवनरक्षक औषधियों, दैनिक उपयोग की वस्तुओं और भोजन सामग्रियों के विवरण पर पूर्ण रूप से आंग्ल भाषा का ही वर्चस्व है। उत्पादों में प्रयुक्त सामग्री, उसके उपयोग की विधि, वैधानिक चेतावनियों और दुष्प्रभावों की जानकारी केवल अंग्रेजी में छपी होती है जिसे देश के 95 प्रतिशत नागरिक समझ नहीं पाते हैं जिससे ऐसे उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य और जीवन सदैव संकट में रहता है। *भारत में कार्यरत बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ या बड़ी कम्पनियाँ अपने उत्पादों अथवा दवाओं के लेबल, चेतावनी व उपयोग विधि केवल अंग्रेजी मे छापती हैं क्योंकि सरकारी नियम कहते हैं कि अंग्रेजी में छापो, यदि देश के करोड़ों ग्राहक व उपभोक्ता अंग्रेजी नहीं समझते हैं तो यह सरकार या कंपनियों की समस्या नहीं है बल्कि उन करोड़ों ग्राहकों व उपभोक्ताओं की है जो अंग्रेजी सीख नहीं पा रहे हैं।* जिनको अंग्रेजी नहीं आते हैं उन्हें किसी उत्पाद या दवाई के बारे में जानने का कोई अधिकार नहीं है और आगे भी यह अधिकार नहीं मिलेगा क्योंकि भारतीय भाषाओं के आने से उपभोक्ताओं के जागरुक निर्णय लेने का अधिकार सुरक्षित होता है जबकि सरकार जनता के ऐसे किसी अधिकार को सुरक्षित करने के झमेले में नहीं पड़ना चाहती है।
यह स्थिति न केवल नागरिकों और उपभोक्ताओं के मौलिक अधिकारों का खुला हनन है, अपितु यह देश की बहुसंख्यक जनता के साथ घोर भाषाई भेदभाव भी है।
यदि हम विश्व के विकसित देशों और अत्यंत कम जनसंख्या वाले छोटे देशों के वैधानिक प्रावधानों का अवलोकन करें, तो स्थिति सर्वथा भिन्न है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी उन देशों में व्यापार करने के लिए वहाँ के स्थानीय भाषाई नियमों का अनिवार्य रूप से पालन करती हैं। *विश्व के १० प्रमुख देशों और उनके कानूनों के उदाहरण निम्नलिखित हैं: *
१. फ़्रांस: यहाँ ‘तूबों विधि’ लागू है। इस कानून के अंतर्गत यह अनिवार्य है कि किसी भी उत्पाद के लेबल, उपयोग के दिशा-निर्देश, और चेतावनी पूर्ण रूप से फ़्रांसीसी भाषा में ही मुद्रित हों।
२. जर्मनी: ‘जर्मन औषधि अधिनियम’ और ‘खाद्य सूचना विनियमन’ के अनुसार प्रत्येक उत्पाद और औषधि पर अनिवार्य रूप से जर्मन भाषा में जानकारी देना वैधानिक रूप से आवश्यक है, ताकि कोई भी उपभोक्ता जानकारी से वंचित न रहे।
३. जापान: ‘खाद्य स्वच्छता अधिनियम’ तथा ‘औषधि एवं चिकित्सा उपकरण अधिनियम’ के अंतर्गत यह कड़ा नियम है कि सभी उपभोक्ता उत्पादों का विवरण जापानी भाषा में ही मुद्रित होना चाहिए।
४. दक्षिण कोरिया: ‘खाद्य स्वच्छता अधिनियम’ के तहत लेबलों का कोरियाई भाषा में मुद्रण अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी विदेशी कंपनी अपना माल वहाँ नहीं बेच सकती।
५. रूस: ‘उपभोक्ता अधिकार संरक्षण विधि’ के अनुच्छेद ८ के अनुसार, उपभोक्ताओं को रूसी भाषा में उत्पाद की संपूर्ण और स्पष्ट जानकारी देना प्रत्येक निर्माता और विक्रेता का वैधानिक दायित्व है।
६. स्पेन: ‘उपभोक्ता और उपयोगकर्ता रक्षा सामान्य अधिनियम’ यह सुनिश्चित करता है कि उत्पादों से जुड़ी सभी आवश्यक जानकारियाँ अनिवार्य रूप से स्पेनी भाषा में उपलब्ध हों।
७. इटली: ‘उपभोक्ता संहिता’ के वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत यह अनिवार्य है कि उपभोक्ताओं के लिए सभी सुरक्षा चेतावनियाँ, संघटक और दिशा-निर्देश इतालवी भाषा में हों।
८. फ़िनलैंड: भारत के एक महानगर से भी कम जनसंख्या (लगभग ५५ लाख) वाले इस देश में ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लागू है, जिसके अंतर्गत उत्पादों पर फ़िनिश और स्वीडिश भाषा का प्रयोग पूर्णतः अनिवार्य है।
९. नॉर्वे: मात्र ५५ लाख की जनसंख्या वाले नॉर्वे में ‘खाद्य सूचना विनियमन’ के अनुसार सभी उपभोक्ता उत्पादों और भोजन सामग्रियों पर नॉर्वेजियन भाषा में विवरण देना अनिवार्य है।
१०. आइसलैंड: मात्र ४ लाख की जनसंख्या वाले इस छोटे से देश ने भी अपने ‘उपभोक्ता अधिकार अधिनियम’ के अंतर्गत यह अनिवार्य किया है कि सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उत्पादों की जानकारी आइसलैंडिक भाषा में ही दें।
महोदय, जब कुछ लाख की जनसंख्या वाले देश अपनी भाषा और नागरिकों के उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए विदेशी कंपनियों को विवश कर सकते हैं, तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? भारत के प्रत्येक राज्य की जनसंख्या करोड़ों में है और हर भारतीय भाषा को बोलने व समझने वाले नागरिक करोड़ों में हैं। ऐसे में यहाँ राजभाषा हिन्दी तथा संबंधित राज्य (जिसमें कंपनी अपना उत्पाद बेचती है) की भाषा में उत्पाद का विवरण छापने का नियम क्यों नहीं बन सकता?
यह अत्यंत चिंतनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है कि आंग्ल भाषा के वर्चस्व के समक्ष भारत सरकार इतनी असहाय है कि वह अपने ही नागरिकों के हितों व अधिकारों की निरंतर अनदेखी कर रही है। देश की बहुसंख्यक जनता पर एक विदेशी भाषा थोपकर उनके साथ जो भाषाई भेदभाव किया जा रहा है, वह किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए उचित नहीं है। पर, हम यह देखते हैं कि विश्व के किसी भी अन्य देश में आंग्ल भाषा की गुलामी इतनी गहरी नहीं है, जितनी हमारे देश में व्यवस्थाओं ने बना रखी है।
आप निरंतर देश को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने का आह्वान करते हैं। पर, यह कटु सत्य है कि यदि आप वास्तव में औपनिवेशिक मानसिकता से देश को मुक्त करना चाहते हैं, तो आंग्ल भाषा की गुलामी और इसके वर्चस्व को तोड़ना ही होगा। उसे तोड़े बिना औपनिवेशिक मानसिकता इस देश से कभी नहीं जाएगी।
अतः, आपसे सविनय निवेदन है कि भारत सरकार इस भाषाई विवशता को त्यागकर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु कठोर कदम उठाए। देश में बिकने वाले प्रत्येक उत्पाद पर राजभाषा हिन्दी तथा उस राज्य, जहाँ माल बेचा जा रहा है, की क्षेत्रीय भाषा में संपूर्ण विवरण अनिवार्य करने हेतु तत्काल प्रभाव से वैधानिक नियम बनाए जाएँ। ऐसा करके ही हम सही अर्थों में एक सशक्त, सुरक्षित और भाषाई गुलामी से मुक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे।
सधन्यवाद।
भवदीय,
प्रवीण कुमार जैन,
(एमकॉम, एफसीएस व एलएलबी)
मुंबई, महाराष्ट्र (भारत)



