सफलता की दौड़ में कहीं रिश्ते तो नहीं हार रहे

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– पंकज शर्मा
दिल्ली। समाज को झकझोर देने वाली कुछ घटनाएँ केवल समाचार नहीं होतीं, वे समय का नैतिक आईना बन जाती हैं। हरियाणा के सोनीपत से हाल में सामने आई एक घटना ने लाखों लोगों को भीतर तक विचलित किया। समाचारों के अनुसार एक वृद्ध पिता अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अपनी बेटियों के एक फोन का इंतज़ार करते रहे। उनके निधन के बाद भी परिस्थितियाँ ऐसी रहीं कि अंतिम विदाई में उनकी बेटियाँ उपस्थित नहीं हो सकीं। इस घटना के सभी व्यक्तिगत पक्ष और परिस्थितियाँ सार्वजनिक रूप से पूरी तरह ज्ञात नहीं हैं। इसलिए किसी परिवार पर निर्णय देना न उचित है और न मानवीय। किंतु यह घटना एक ऐसे प्रश्न को हमारे सामने अवश्य रखती हैए जिससे बचना अब संभव नहीं- क्या हम आने वाली पीढ़ी को केवल सफल बना रहे हैं, या संवेदनशील भी?
आज हर माता-पिता का सपना है कि उनका बच्चा अच्छी शिक्षा पाए, ऊँचा पद हासिल करे, आर्थिक रूप से सक्षम बने और दुनिया में अपना नाम कमाए। इस सपने में कोई बुराई नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सफलता की इस परिभाषा से संवेदनाएँ, कृतज्ञता और पारिवारिक उत्तरदायित्व धीरे.धीरे गायब होने लगते हैं। हम बच्चों को अंग्रेज़ी बोलना सिखाते हैं, लेकिन क्या उन्हें यह भी सिखाते हैं कि वृद्ध माता-पिता से रोज़ दो मिनट बात करना भी एक संस्कार है? हम उन्हें करियर बनाना सिखाते हैं, लेकिन क्या यह भी बताते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल ऊँचा वेतन नहीं, बल्कि अपने रिश्तों को सम्मानपूर्वक निभाना भी है, हम उन्हें दुनिया जीतने की प्रेरणा देते हैं, पर क्या यह याद दिलाते हैं कि जिस हाथ ने उन्हें चलना सिखाया उसे बुढ़ापे में सहारा देना भी जीवन का कर्तव्य है, यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमारा समाज तलाश रहा है।

आज शिक्षा का अर्थ अक्सर अंक, डिग्री और नौकरी तक सीमित होकर रह गया है। नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम में तो दिखाई देती है, लेकिन व्यवहार में कम होती जा रही है। हमारा संविधान हमें अधिकार देता है, हमारा समाज हमें अवसर देता है, लेकिन हमारे संस्कार हमें कर्तव्य सिखाते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने पेशे में अत्यंत सफल है, लेकिन अपने माता-पिता के प्रति संवेदनशील नहीं रह पाता, तो क्या उसकी सफलता पूर्ण कही जा सकती है?

संयुक्त परिवार अब छोटे परिवारों में बदल रहे हैं। करियर के कारण बच्चे देश.विदेश में रहते हैं। यह
परिवर्तन स्वाभाविक है और आधुनिक जीवन की आवश्यकता भी। लेकिन भौगोलिक दूरी और भावनात्मक दूरी एक जैसी नहीं होती। आज वीडियो कॉल, मोबाइल और इंटरनेट ने संवाद को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। फिर भी अनेक बुज़ुर्ग पूरे दिन केवल एक फोन कॉल का इंतज़ार करते रहते हैं। उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत महँगे उपहार नहीं, बल्कि यह एहसास है कि वे आज भी अपने बच्चों के जीवन में महत्वपूर्ण हैं।
यदि घर में बच्चे अपने माता-पिता को दादा-दादी का सम्मान करते, उनकी देखभाल करते और उनके साथ समय बिताते हुए देखेंगे तो यही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनेगा। लेकिन यदि वे यह देखेंगे कि बुज़ुर्ग केवल ज़िम्मेदारी हैं, सुविधा के अनुसार मिलने वाले रिश्ते हैं, तो वे भी अनजाने में वही सीखेंगे। समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हर पीढ़ी अगली पीढ़ी के व्यवहार की शिकायत करती है, जबकि उसका अधिकांश आधार पिछली पीढ़ी ही तैयार करती है।
बुज़ुर्गों की सुरक्षा के लिए कानून आवश्यक हैं, लेकिन कानून अपनापन नहीं दे सकते। समाधान परिवारों के भीतर शुरू होगा। प्रतिदिन माता.पिता से बातचीत, बच्चों को दादा-दादी के साथ समय बिताने के अवसर, परिवार में बुज़ुर्गों के अनुभवों को सम्मान, विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को केवल परीक्षा का विषय नहीं, जीवन कौशल बनाया जाए, सफलता की परिभाषा में संवेदनशीलता और पारिवारिक उत्तरदायित्व को भी स्थान दिया जाए, तो शायद आने वाली पीढ़ी अधिक सफल होने के साथ-साथ अधिक मानवीय भी होगी।
हर माता-पिता अपने बच्चों से संपत्ति नहीं चाहते। वे चाहते हैं समय, वे चाहते हैं अपनापन, वे चाहते हैं यह विश्वास कि जिन बच्चों के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया वे उन्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने देंगे।
किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, तेज़ अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक से नहीं होती।
उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह कमजोर, निर्भर और वृद्ध लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है? आज आवश्यकता केवल आर्थिक रूप से विकसित भारत की नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी समृद्ध भारत की है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भविष्य में हमारा सम्मान करें, तो हमें आज उन्हें सम्मान का अर्थ सिखाना होगा। क्योंकि विरासत केवल संपत्ति की नहीं, संस्कारों की भी होती है, और इतिहास गवाह है,- जिस समाज में संस्कार कमजोर पड़ते हैं, वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाते हैं।
आइए, अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, संवेदनशील भी बनाएं। यही भारतीयता है, यही संस्कृति है, और शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

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