मनोज श्रीवास्तव
भोपाल: ‘साहित्य क्रांति’ पत्रिका आज ढाई दशक से अधिक समय की यात्रा के बाद अपने उद्यापन-क्षण तक पहुँची है।
आज याद करें कि इस पत्रिका के 90 के दशक में शुरू होने का अर्थ क्या था? धर्मयुग वर्ष 1993 में बंद हुआ था ।साप्ताहिक हिंदुस्तान का प्रकाशन दिसंबर 1992 में बंद कर दिया गया था।सारिका लगभग 1990-1991 में बंद हुई।दिनमान वर्ष 1990 के आसपास बंद हुआ था। ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’, ‘दिनमान’ जैसी पत्रिकाएँ साहित्य को अलग-थलग कोने में नहीं रखती थीं। साहित्य, संस्कृति, राजनीति, कला, समाज, विज्ञान और सामान्य जीवन एक ही पाठकीय संसार में आते थे। इसी कारण साहित्यिक लेखक को अपने पाठक तक पहुँचने के लिए केवल “साहित्यिक पत्रिका” की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी।
इसके बावजूद वे बन्द हुईं। ऐसे समय हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका शुरू करने का निर्णय करना ही बहुत बड़ी आस्था, बहुत बड़े विश्वास का परिणाम था।
31 दिसंबर 2024 को PRGI के अनुसार कुल 1,54,362 पंजीकृत पत्रिकाएँ/प्रकाशन थे। इनमें से 1,02,092 को ‘defunct’ यानी निष्क्रिय चिह्नित किया गया था, क्योंकि उनके प्रकाशकों ने लगातार पाँच वर्षों तक वार्षिक विवरण दाखिल नहीं किया था। उसी अवधि में केवल 36,369 प्रकाशनों ने 2023–24 का वार्षिक विवरण दाखिल किया।अर्थात मोटे तौर पर: 1,54,362 पंजीकृत → 1,02,092 निष्क्रिय → लगभग 66 प्रतिशत।और केवल लगभग 23.6 प्रतिशत ने उस वर्ष वार्षिक विवरण दाखिल किया।

भारतीय मुद्रित पत्रिका-संस्कृति का पंजीकृत ढाँचा जितना विशाल दिखाई देता है, उसका सक्रिय हिस्सा उतना विशाल नहीं है।
31 मार्च 2023 तक भारत में कुल 1,48,363 पंजीकृत मुद्रित पत्रिकाएँ/प्रकाशन थे। इनमें अकेले हिंदी के 57,050 पंजीकृत प्रकाशन थे—अर्थात कुल पंजीकृत प्रकाशनों का लगभग 38.4 प्रतिशत। अंग्रेजी के 10,929 और मराठी के 10,659 पंजीकृत प्रकाशन थे। हिंदी की संख्या इसलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वह केवल अंग्रेजी से बड़ी नहीं, बल्कि कई गुना बड़ी है।लेकिन यही वह आँकड़ा है जिसे देखकर कोई जल्दबाजी में कह सकता है—“फिर हिंदी पत्रिकाएँ संकट में कैसे हैं? हिंदी में तो 57 हजार से अधिक पत्रिकाएँ हैं!”
यहीं असली बात छिपी है। 57,050 ‘हिंदी पंजीकृत प्रकाशन’ का अर्थ 57,050 साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं है। इनमें समाचार-पत्र, साप्ताहिक, धार्मिक, व्यावसायिक, संस्थागत, शैक्षिक, स्थानीय और अनेक अन्य प्रकार के प्रकाशन सम्मिलित हैं। इसलिए हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की स्थिति जानने के लिए यह आँकड़ा सीधे इस्तेमाल करना गलत होगा। यह केवल हिंदी मुद्रित प्रकाशन-जगत का आकार बताता है।
आज हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या यदि कम है, तो इसके पीछे एक बड़ा कारण उन हिन्दीभाषियों का भी है जो हिन्दी साहित्य पत्रिकाओं को खरीदकर नहीं पढ़ते और अब तो उनका माइग्रेशन डिजिटल संसाधनों और सोशल मीडिया की तरफ उत्तरोत्तर बढ़ रहा है तब तो इन साहित्यिक पत्रिकाओं के सामने चुनौती और बड़ी हो गई है।
आज हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या यदि कम है, तो इसके पीछे एक बड़ा कारण उन हिन्दीभाषियों का भी है जो हिन्दी साहित्य पत्रिकाओं को खरीदकर नहीं पढ़ते और अब तो उनका माइग्रेशन डिजिटल संसाधनों और सोशल मीडिया की तरफ उत्तरोत्तर बढ़ रहा है तब तो इन साहित्यिक पत्रिकाओं के सामने चुनौती और बड़ी हो गई है।
आज साहित्यकारों का भी सम्मान है।साहित्यकार होना आसान इसलिए नहीं है कि साहित्य केवल लेखन नहीं है। साहित्यकार को पहले जीवन पढ़ना पड़ता है। उसे मनुष्य के सुख में छिपे हुए दुःख को और दुःख में बची हुई आशा को पहचानना पड़ता है। उसे यह जानना पड़ता है कि इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और विजयों से नहीं बनता; वह उन साधारण मनुष्यों से भी बनता है जिनके नाम इतिहास की पुस्तकों में नहीं आते, लेकिन जिनके जीवन के बिना कोई समाज बन ही नहीं सकता। साहित्यकार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी संवेदना है। लेकिन संवेदना अकेली पर्याप्त नहीं। उसके साथ स्मृति चाहिए, अध्ययन चाहिए, भाषा का अनुशासन चाहिए और अपने समय से संवाद करने का साहस चाहिए। इसीलिए किसी साहित्यकार को सम्मानित करना उस श्रम को सम्मानित करना है जिसे अक्सर समाज देख नहीं पाता। मंच पर लेखक की पुस्तक दिखाई देती है; उसके पीछे वर्षों का एकांत दिखाई नहीं देता। प्रकाशित कविता दिखाई देती है; उसके पीछे की असंख्य काट-छाँट दिखाई नहीं देती। लेखक का नाम दिखाई देता है; उसके पीछे की वह लंबी साधना दिखाई नहीं देती जिसमें उसने स्वयं को शब्द के योग्य बनाया है।
साहित्य-साधना भी ऐसा ही व्रत है। लेखक जब लिखना आरंभ करता है तो वह केवल शब्दों को कागज पर नहीं रखता; वह अपने जीवन का एक अंश शब्दों के हवाले कर देता है। और जब कोई साहित्यिक पत्रिका पच्चीस वर्षों से अधिक समय तक निरंतर निकलती है, तो वह किसी व्यक्ति की निजी साधना नहीं रह जाती—वह एक सामूहिक व्रत बन जाती है।
‘साहित्य क्रांति’ का यही अर्थ है।
मुझे यह उद्यापन शब्द अच्छा लगा। पत्रिकाएँ बंद होती हैं लेकिन कोई इस तरह उनका उद्यापन नहीं करता। उद्यापन व्रत का ही होता है। उद्यापन शब्द अपने भीतर ही एक विलक्षण सांस्कृतिक गरिमा रखता है। हम किसी ऐसी वस्तु का उद्यापन करते हैं जिसका जीवन हमारे लिए केवल उपयोग का नहीं, अनुष्ठान का रहा हो। दीप का उद्यापन हो, व्रत का उद्यापन हो, किसी धार्मिक अनुष्ठान का उद्यापन हो-उसमें समाप्ति का अर्थ विनाश नहीं होता। वह कहता है कि जो कार्य आरंभ हुआ था, वह अपने नियत पड़ाव तक पहुँच गया; अब उसकी लौ किसी दूसरे हाथ में, किसी दूसरी स्मृति में, किसी दूसरी संभावना में चली जाएगी।
दउद्यापन का अर्थ यह नहीं कि व्रत विफल हो गया। इसके ठीक विपरीत—उद्यापन इस बात की घोषणा है कि व्रत ने अपनी नियत यात्रा पूरी कर ली। जिस संकल्प के साथ आरंभ किया गया था, वह अब एक पड़ाव तक पहुँच गया है। इसलिए उद्यापन में दीप भी है और आँसू भी; संतोष भी है और विरह भी; पीछे मुड़कर देखने की तृप्ति भी है और आगे की ओर देखने की बेचैनी भी।
बिना व्रत के इतनी मेहनत नहीं होती। ढाई दशकों से अधिक तक शब्द को स्थान देना, रचनाकारों को बुलाना, नई आवाज़ों को सुनना, पांडुलिपियों के बीच से रचना चुनना, अंक तैयार करना, उसे पाठकों तक पहुँचाना—यह केवल प्रकाशन-व्यवस्था नहीं थी। यह साहित्य के प्रति लिया गया एक दीर्घ संकल्प था। इसीलिए आज उसका उद्यापन हो रहा है।
और यहाँ ‘उद्यापन’ शब्द को समझना बहुत आवश्यक है।
इसलिए आज का दिन केवल ‘साहित्य क्रांति’ को नहीं, उसके पीछे खड़े उन सभी अदृश्य हाथों को भी प्रणाम करने का दिन है।उन हाथों को, जिन्होंने पांडुलिपियाँ संभालीं।उन आँखों को, जिन्होंने प्रूफ पढ़े।उन डाकियों को, जिन्होंने अंक पहुँचाए।उन पाठकों को, जिन्होंने सदस्यता ली।उन लेखकों को, जिन्होंने अपनी रचनाएँ भेजीं।उन मित्रों को, जिन्होंने संकट के समय साथ दिया।और उन परिवारों को, जिन्होंने साहित्यिक पत्रिका के कारण घर में आने वाली अनेक अतिरिक्त चिंताओं को चुपचाप स्वीकार किया।साहित्य का इतिहास अक्सर बड़े नामों से लिखा जाता है; लेकिन साहित्यिक संस्कृति का इतिहास अनाम श्रम से बनता है।आज उस अनाम श्रम को भी स्मरण किया जाना चाहिए।
समय की नदी बहती रही और ‘साहित्य क्रांति’ उसके किनारे एक दीप की तरह जलती रही।
आज वह दीप अपने नियत अनुष्ठान के बाद बुझाया जा रहा है; लेकिन उसकी रोशनी उन आँखों में रह गई है जिन्होंने उसे देखा है।
आज वह दीप अपने नियत अनुष्ठान के बाद बुझाया जा रहा है; लेकिन उसकी रोशनी उन आँखों में रह गई है जिन्होंने उसे देखा है।
मुद्रित शब्द की अपनी एक अद्भुत नियति होती है—वह अपने वर्तमान से निकलकर स्मृति का हिस्सा बन जाता है।
अभी पूर्व वक्ता कह रहे थे कि इसे खत्म न करिये जारी रखिए, तब मुझे मेरी माँ की याद आयी। वे भी बार बार व्रत का उद्यापन करती थीं और थोड़े अंतराल के बाद फिर शुरू कर देती थीं। तो उद्यापन शब्द से निराश न हों। मैं धर्मवीर भारती की एक कविता की याद दिलाऊँ-
सृजन की थकन भूल जा देवता!
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अभी तो पलक में नहीं खिल सकी
नवल कल्पना की मधुर चाँदनी
अभी अधखिली ज्योत्सना की कली
नहीं ज़िंदगी की सुरभि में सनी—
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अधूरी धरा पर नहीं है कहीं
अभी स्वर्ग की नींव का भी पता!
सृजन की थकन भूल जा देवता!
रुका तू गया रुक जगत् का सृजन
तिमिरमय नयन में डगर भूल कर
कहीं खो गई रोशनी की किरन
बादलों में कहीं सो गया
नई सृष्टि का सप्तरंगी सपन
रुका तू गया जगत् का सृजन
अधूरे सृजन से निराशा भला
किस लिए; जब अधूरी स्वयं पूर्णता
सृजन की थकन भूल जा देवता!
तो हम उम्मीद कर सकते हैं।
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अभी तो पलक में नहीं खिल सकी
नवल कल्पना की मधुर चाँदनी
अभी अधखिली ज्योत्सना की कली
नहीं ज़िंदगी की सुरभि में सनी—
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अधूरी धरा पर नहीं है कहीं
अभी स्वर्ग की नींव का भी पता!
सृजन की थकन भूल जा देवता!
रुका तू गया रुक जगत् का सृजन
तिमिरमय नयन में डगर भूल कर
कहीं खो गई रोशनी की किरन
बादलों में कहीं सो गया
नई सृष्टि का सप्तरंगी सपन
रुका तू गया जगत् का सृजन
अधूरे सृजन से निराशा भला
किस लिए; जब अधूरी स्वयं पूर्णता
सृजन की थकन भूल जा देवता!
तो हम उम्मीद कर सकते हैं।



