जयपुर । शनि, नोआ और लेवी,इन तीनों महिलाओं के नाम अपने हृदय में कहीं गहरे लिख लीजिए। ये केवल तीन नाम नहीं हैं; ये उन असहनीय यातनाओं, टूटे हुए सपनों और मातम में डूबी उन ज़िंदगियों की कहानियाँ हैं, जिन्हें पढ़ते हुए इंसान का कलेजा मुँह को आने लगता है।
इन कहानियों में कुछ ऐसे दृश्य हैं, जिन्हें पढ़ना कठिन है और कल्पना करना उससे भी कठिन। इतिहास के पन्नों में दर्ज मध्यकालीन भारतीय स्त्रियों की पीड़ा की याद दिलाने वाली ये घटनाएँ हमें बताती हैं कि जब मनुष्य के भीतर से इंसानियत मर जाती है, तब उसकी जगह कैसी भयावह क्रूरता जन्म लेती है।इस लघु शृंखला में सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में प्रकाशित विवरणों के आधार पर इन तीन महिलाओं के साथ घटी घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन किया जाएगा। उद्देश्य किसी के घाव कुरेदना नहीं, बल्कि उन घावों को याद रखना है, जिन्हें समय की धूल के नीचे दबा देना सबसे बड़ा अन्याय होगा।
शनि लूक महज़ बाईस साल की एक युवती थी। जर्मनी और इसराइल की दोहरी नागरिकता रखने वाली शनि टैटू बनाने की कला में निपुण थी। उम्र का वह पड़ाव, जहाँ इंसान सपनों को आकार देता है, दुनिया को अपनी आँखों से देखता है और आने वाले कल के लिए न जाने कितनी योजनाएँ बनाता है,शनि भी उसी जीवन का हिस्सा थी।
उसकी दुनिया में भी हँसी थी, दोस्त थे, संगीत था और भविष्य के रंग थे।
लेकिन उसे क्या मालूम था कि सात अक्टूबर की वह सुबह और शाम उसके जीवन की आख़िरी कहानी लिखने वाली है!
उस दिन शनि इसराइल में आयोजित एक संगीत समारोह में मौजूद थी। चारों ओर संगीत, उत्सव और जीवन की चहल-पहल थी। फिर अचानक हमास के आतंकियों ने वहाँ धावा बोल दिया। कुछ ही क्षणों में उत्सव का वातावरण चीख़ों, भगदड़ और मौत के भय में बदल गया।
शनि ने घबराकर अपनी माँ को फ़ोन किया। एक बेटी ने उस क्षण अपनी माँ को पुकारा, जब उसे दुनिया में सबसे अधिक सुरक्षा की ज़रूरत थी। उसने बताया कि वह छिपने के लिए कोई जगह तलाश रही है।
कुछ घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो फैलने लगा। उसमें शनि का अचेत, लगभग निर्वस्त्र शरीर एक पिकअप ट्रक में दिखाई दे रहा था। उसके आसपास हथियारबंद हमलावर थे और कुछ लोग उस दृश्य पर जश्न मनाते दिखाई दिए।
यह दृश्य केवल एक युवती के साथ हुई बर्बरता का प्रमाण नहीं था; यह उस क्षण मनुष्यता के मुँह पर पड़ा एक ऐसा तमाचा था, जिसकी गूँज बहुत दूर तक सुनाई दी।
एसोसिएटेड प्रेस के एक फ़ोटोग्राफ़र द्वारा खींची गई तस्वीर भी दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी।
तस्वीर को देखकर शनि के परिवार ने क्या महसूस किया होगा, यह शब्दों में लिखना आसान नहीं है।
लेकिन इस कहानी का सबसे क्रूर हिस्सा अभी बाक़ी था।
तस्वीरों और वीडियो ने दुनिया को एक भयावह दृश्य दिखाया था, मगर शनि की माँ के मन में एक छोटी-सी उम्मीद अब भी जीवित थी।
उसे कुछ सूत्रों से जानकारी मिली कि शनि शायद जीवित है और ग़ाज़ा के किसी अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।
बस, एक माँ के लिए इतना ही काफ़ी था।
जब दुनिया आशंकाएँ व्यक्त कर रही थी, तब भी वह अपनी बेटी की साँसों की उम्मीद से चिपकी रही होगी। शायद वह सोचती होगी कि उसकी बच्ची घायल है, तकलीफ़ में है, मगर ज़िंदा है। शायद वह किसी दिन दरवाज़े पर दस्तक देगी। शायद फ़ोन बजेगा। शायद कोई कहेगा आपकी बेटी मिल गई है।
माता-पिता ने जर्मनी और इसराइल के अधिकारियों से गुहार लगाई कि उनकी बेटी को खोजा जाए और उसे वापस लाया जाए। लेकिन विशेषज्ञों की आशंकाएँ लगातार गहरी होती जा रही थीं।
एक ओर दुनिया की कूटनीति, युद्ध और खोजबीन थी; दूसरी ओर एक माँ थी, जिसके लिए पूरा संसार सिमटकर अपनी बाईस साल की बेटी तक रह गया था।
उम्मीद का बुझना भी एक यातना है, दिन बीतते गए।
फिर एक ख़बर आई कि शनि का क्रेडिट कार्ड ग़ाज़ा में इस्तेमाल हुआ था। इस सूचना ने मामले को एक नया मोड़ दिया। परिवार के लिए यह एक और बेचैन कर देने वाला संकेत था, लेकिन इससे शनि के जीवित होने की पुष्टि नहीं होती थी।
कुछ समय बाद इसराइली सेना को इसराइल ग़ाज़ा की सीमा के निकट मानव खोपड़ी का एक छोटा-सा अंश मिला।
डीएनए जाँच से उसकी पहचान शनि से जुड़ी पाई गई। जाँच के बाद यह स्पष्ट हो गया कि शनि अब जीवित नहीं थी।
मृत्यु की पुष्टि हो जाने पर भी प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती। मन पूछता रहता है,वह कहाँ है? उसके साथ आख़िर क्या हुआ? क्या हम उसे आख़िरी बार देख भी पाएँगे? क्या उसे अपनी परंपरा के अनुसार विदा कर सकेंगे?
शनि के परिवार के सामने भी यही प्रश्न था।
महीने गुज़रते गए।
एक दिन, दो दिन नहीं पूरा एक महीना, फिर दूसरा, फिर तीसरा। इस तरह आठ महीने बीत गए। आठ महीने, जिनमें शनि की माँ और पिता को अपनी बेटी के शरीर की तलाश की ख़बरों के साथ जीना पड़ा।
आख़िरकार, लगभग आठ महीने बाद, इसराइली सेना को ग़ाज़ा की एक सुरंग में शनि के अवशेष मिले।
लेकिन उसका सिर वहाँ नहीं था।
जाँच और उपलब्ध विवरणों से यह बात सामने आई कि जिस समय शनि का शरीर ट्रक में दिखाई दिया था, उस समय तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। बाद में उसके सिर को शरीर से अलग किया गया था।
यह विवरण पढ़ते हुए मन में एक ही प्रश्न उठता है,आख़िर किसी की मृत्यु के बाद भी उसके शरीर के साथ ऐसी बर्बरता करने वाला मनुष्य किस चीज़ से बना होता है? ठीक यही बर्बरता और करतूतें भारतीय स्त्रियों ने पाँच सौ साल पहले देखी थी, इनसे बचने हेतु अग्नि स्नान करना स्वीकारा था।
मृत्यु अपने आप में अंतिम पीड़ा है। लेकिन किसी मृत देह का अपमान करना, उसे उसके परिजनों से दूर कर देना और उन्हें महीनों तक उसके अवशेषों की तलाश में भटकने देना,यह उस पीड़ा को और गहरा कर देता है।
आठ महीने बाद शनि के अवशेष उसके परिवार तक पहुँचे और उसे पारंपरिक रीति से दफ़नाया जा सका।
माँ-बाप अपने बच्चों को जीवन देना जानते हैं। उनके लिए कब्र खोदने की घड़ी का इंतज़ार करना किसी भी माता-पिता के हिस्से आने वाली सबसे असहनीय विडंबनाओं में से एक है।
शनि चली गई, लेकिन उसकी कला रह गई
शनि की मृत्यु के बाद उसके टैटू-आर्ट से जुड़े काम को ‘फ़ॉरएवर यंग’ नाम से सहेजने की पहल हुई। उसकी कला को जीवित रखने का यह प्रयास उस युवती की याद को सँभालने का एक माध्यम बना, जिसके जीवन को हिंसा ने असमय समाप्त कर दिया।
आज सामने आई ख़बरों के अनुसार, इसराइली सेना ने उस हमलावर को मार गिराया, जिसके बारे में बताया गया था कि वह उस दिन शनि के शरीर के साथ ट्रक में मौजूद था।
शनि लूक के साथ हुई बर्बरता को पढ़ते हुए भारतीय इतिहास के वे अध्याय भी स्मरण हो आते हैं, जिनमें युद्धों, आक्रमणों और सत्ता के संघर्षों के बीच असंख्य भारतीय स्त्रियों ने अपमान, हिंसा और असहनीय यातनाएँ झेलीं। मध्यकालीन भारत की अनेक स्त्रियों की पीड़ा हमारी ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा है।
शनि इसराइल की बेटी थी, लेकिन उसे खोने का दुःख समझने के लिए इसराइली होना आवश्यक नहीं। उसके जीवन और मृत्यु की कहानी सुनने के लिए केवल एक संवेदनशील हृदय होना पर्याप्त है।
ईश्वर शनि की आत्मा को शांति दें। उसके माता-पिता को वह शक्ति दें, जिसकी कल्पना करना भी हमारे लिए कठिन है।



