कहानी, अभिनय और परिवार का भाव
खुशाली कुमार नव्या को सहज और ईमानदार अंदाज में निभाती हैं। फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है कि पूरी फिल्म का बोझ आकाशादित्य ने खुशाली के नाजुक कंधे पर ही डाल रखा है। वे फिल्म के लगभग हर फ्रेम में दिखाई देती हैं।

महेश मांजरेकर पिता के रूप में कमाल करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के शब्दों में उन्होंने फिल्म को थाम लिया। खुशाली और महेश का पिता-पुत्री वाला रिश्ता फिल्म की असली ताकत है। पीयूष मिश्रा सीमित भूमिका में भी वजन देते हैं। वैसे उनकी भूमिका कोई भी हो। अंदाज एक ही रहता है। स्नेहिल दीक्षित मेहरा और ओमकार कपूर हल्के हास्य में कामयाब हैं
छोटे किरदारों में अतुल गंगवार मिरेकल बाबा बने हैं। उन्होंने भूमिका को सादगी से निभाया है और कुछ दृश्यों में हल्की मुस्कान छोड़ जाते हैं। लड़की के फूफा का किरदार अरुण अरोरा के पास था। सेहत की वजह से उनका किरदार विस्तार नहीं पा सका है, वरना उनका यह नया अवतार दर्शकों को पसंद आता। फिल्म में ईशान तुली की एक झलक भी है। समीक्षक विष्णु शर्मा के अनुसार उन्होंने छोटी भूमिका को ईमानदारी से निभाया।
निर्देशन, संगीत और कुछ खामियां
लामा ने गंभीर विषय को उपदेश जैसा नहीं बनने दिया। गीत ‘बिटिया पराई नहीं होती’ खास तौर पर छूता है। दूसरी ओर पटकथा कई पुरानी शादी वाली फिल्मों जैसा चलती है और दूसरे भाग में गति कुछ ढीली पड़ जाती है। संपादन और तेज होता तो फिल्म और निखरती।

कुल मिलाकर फिल्म साफ-सुथरा फैमिली एंटरटेनर है। कॉमेडी, इमोशन और संदेश का संतुलन इसे परिवार के साथ देखने लायक बनाता है। रेटिंग करीब साढ़े तीन स्टार और आईएमडीबी पर अच्छा स्कोर बताता है कि फिल्म पसंद की जा रही है। लड़कियों की शादी में जल्दबाजी की सोच रखने वालों के लिए यह मार्गदर्शन देने वाली फिल्म है।



