दिल्ली । आज मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में कई मुद्दे एक साथ गूंज रहे हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर फैलाए जा रहे दावे, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दबाव और अब सर्वोच्च न्यायालय को भी विवाद में घसीटने की कोशिश। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये एक बड़े संस्थागत दबाव का हिस्सा लगते हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों के जवाब दिए हैं। लेकिन अगर ये दबाव और भ्रम फैलाने वाले दावे कामयाब हो गए, तो असर सिर्फ मतदाता सूची तक नहीं रुकेगा। न्यायपालिका, चुनावों की वैधता और कानून-व्यवस्था तक पहुंच सकता है।
*विपक्ष का चयनात्मक आक्रोश*: *बिहार-बंगाल पर हमला, केरल-तमिलनाडु पर चुप्पी*
सबसे साफ विरोधाभास यहीं दिखता है। विपक्ष लगातार बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों पर SIR का हवाला देकर सवाल उठा रहा है। चुनाव रद्द करने या उनकी वैधता पर शक जताने की बात भी हो रही है। लेकिन केरल और तमिलनाडु में भी SIR की प्रक्रिया चली थी। वहां भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण हुआ था। फिर वहां के चुनाव परिणामों पर विपक्ष क्यों चुप है? अगर SIR बिहार और बंगाल में गलत था, तो केरल और तमिलनाडु में सही कैसे हो गया? अगर बिहार और बंगाल के चुनाव रद्द होने चाहिए, तो क्या विपक्ष केरल और तमिलनाडु के चुनाव भी रद्द करने की मांग करेगा? यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बताता है। एक ही प्रक्रिया पर जहां नुकसान दिखे वहां हमला, जहां फायदा हो वहां मौन। यह प्रक्रिया की शुद्धता की लड़ाई कम, राजनीतिक सुविधा की लड़ाई ज्यादा लगती है।
मीडिया में फैलाया जा रहा प्रचार और आयोग के जवाब
मीडिया और राजनीतिक चर्चा में लगातार यह बात कही जा रही है कि SIR बड़े पैमाने पर मतदाताओं का नाम काट रहा है, तकनीकी सिस्टम वैधानिक सुरक्षा को दरकिनार कर रहा है और आयोग की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है। चुनाव आयोग ने इन बातों पर अपनी स्थिति साफ की है। प्रक्रिया कई चरणों में चलती है। नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई होती है। फैसला वैधानिक अधिकारियों के हाथ में है। सुविधा बढ़ाने वाले कदमों को असफलता बताना तथ्यों को उल्टा पेश करना है। लेकिन असल मुद्दा सिर्फ इन जवाबों का नहीं है। मुद्दा यह है कि ये दावे आयोग की विश्वसनीयता को लगातार निशाना बना रहे हैं और संस्था पर दबाव बना रहे हैं।
*सुप्रीम कोर्ट को विवाद के केंद्र में लाने की कोशिश*
अब यह दबाव सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अदालत की टिप्पणियां, CEC की भूमिका और SIR से जुड़ी अलग-अलग याचिकाएं—इन सबको जोड़कर एक बड़ा प्रचार अभियान खड़ा किया जा रहा है। कुछ संगठनों ने न्यायाधीशों की निष्पक्षता और संभावित हित-संघर्ष पर भी सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि आरोप, याचिका, मीडिया रिपोर्ट और सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को अंतिम फैसले की तरह पेश किया जाने लगे। कानूनी रूप से ये सब अलग-अलग चीजें हैं। कोई याचिका या संगठन का सवाल अदालत का फैसला नहीं होता। जब तक अदालत खुद कोई आदेश नहीं देती, इन्हें आरोप ही माना जाना चाहिए।
*न्यायिक प्रक्रिया को दबाव का हथियार बनाने का खतरा*
अगर न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल CEC ज्ञानेश कुमार पर राजनीतिक या संस्थागत दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो अदालत की किसी टिप्पणी को उनके खिलाफ चल रहे अभियान के समर्थन के रूप में पेश किया जा सकता है। मीडिया ट्रायल, सोशल मीडिया अभियान और लगातार याचिकाएं इसी दिशा में काम करती दिखती हैं। मीडिया को अपनी भूमिका निभाने का हक है, लेकिन न्यायिक फैसला कानून, तथ्य और संविधान पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी मुद्दे के इर्द-गिर्द बने सार्वजनिक दबाव पर।
*अगर दबाव सफल हो गया तो क्या हो सकता है*
अगर दबाव कामयाब हो जाता है तो राजनीतिक दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यकाल के फैसलों, खासकर SIR और मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों की दोबारा समीक्षा की मांग कर सकते हैं। लेकिन किसी CEC का इस्तीफा अपने आप उनके सारे फैसलों को रद्द नहीं कर देता। न ही किसी चुनाव को सिर्फ राजनीतिक मांग पर रद्द किया जा सकता है। इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया, ठोस आधार और अदालत का रास्ता जरूरी है। फिर भी बिहार और बंगाल के चुनावों को सवालों में घेरने की कोशिशें पहले से दिख रही हैं। अगर ये आगे बढ़ीं, तो सिर्फ चुनाव ही नहीं, कानून-व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। कुछ दावों में इसे बांग्लादेश जैसे मॉडल से जोड़ने की कोशिश भी नजर आती है। संस्थाओं पर लगातार हमला लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
*मतदाताओं को असली सवालों के जवाब जो समझने चाहिए*
क्या SIR संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अंदर हुआ?
क्या किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया और क्या यह साबित हुआ?
क्या किसी चुनाव को रद्द करने के कानूनी आधार मौजूद हैं?
क्या अदालत की टिप्पणी को उसके असली मतलब से आगे बढ़ाकर राजनीतिक दबाव का औजार बनाया जा रहा है?
और सबसे जरूरी—क्या एक ही प्रक्रिया पर अलग-अलग राज्यों में अलग रवैया अपनाकर दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है?
*मतदाताओं को सतर्क रहने की जरूरत*
अगर ये भ्रम फैलाने वाले दावे सफल हो गए, तो नुकसान सिर्फ एक संस्था का नहीं होगा। चुनाव आयोग की साख घटेगी, न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे और कानून-व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है, लेकिन संस्थाओं को राजनीतिक अभियान का अखाड़ा बनाना और चयनात्मक हमले लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।
यह बहस सिर्फ SIR या CEC तक सीमित नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि हम संस्थाओं को उनके काम करने देंगे या उन्हें लगातार दबाव, प्रचार और दोहरे मापदंड के चक्र में धकेलते रहेंगे।
नागरिकों को तथ्यों और प्रक्रिया का फर्क समझना होगा। वरना संस्थागत कमजोरी का खामियाजा पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को भुगतना पड़ेगा।



