सृजनशील सोच, समाधानकारी संस्कार और समर्थ भारत

india-name-change-to-bharat.jpg

Caption: HerZindagi

लखनऊ।  भारत की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे यह तय करना है कि वह विद्यार्थियों को केवल जानकारी का भंडार बनाएगी या उन्हें भविष्य का निर्माता बनाएगी। सदियों से चली आ रही परीक्षा-केंद्रित मानसिकता ने शिक्षा को ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से अधिक अंक प्राप्त करने की प्रतियोगिता में बदल दिया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लाखों विद्यार्थी प्रतिवर्ष असंख्य तथ्यों, परिभाषाओं और उत्तरों को याद करके परीक्षाएँ उत्तीर्ण करते हैं, किंतु जब वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना करने का अवसर आता है तो उनमें से बड़ी संख्या स्वयं को असहाय पाती है। इसका कारण प्रतिभा का अभाव नहीं, बल्कि ऐसी शैक्षिक संरचना है जो जिज्ञासा से अधिक स्मरणशक्ति को, प्रश्नों से अधिक उत्तरों को और सृजन से अधिक पुनरुत्पादन को महत्व देती रही है। आज जब विश्व ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, तब भारत के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह अपनी शिक्षा को रटने की संस्कृति से मुक्त कर रचनात्मकता, समस्या-समाधान और नवोन्मेष की संस्कृति से जोड़े।

वर्तमान युग में ज्ञान का स्वरूप बदल चुका है। कभी पुस्तकालयों और ग्रंथों में सीमित रहने वाली जानकारी आज कुछ क्षणों में उपलब्ध हो जाती है। ऐसे समय में किसी विद्यार्थी का मूल्य इस बात से नहीं आँका जाएगा कि उसे कितने तथ्य कंठस्थ हैं, बल्कि इस बात से आँका जाएगा कि वह उपलब्ध ज्ञान का उपयोग करके क्या नया सोच सकता है, क्या नया बना सकता है और समाज की चुनौतियों के समाधान में कितना योगदान दे सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, रोबोटिकी, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के विस्तार ने कार्यक्षेत्र की प्रकृति को बदल दिया है। जो कार्य केवल स्मृति और दोहराव पर आधारित हैं, वे तेजी से मशीनों के दायरे में जा रहे हैं। मनुष्य की विशिष्टता अब उसकी रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति, संवेदनशीलता और जटिल समस्याओं को समझकर उनका समाधान खोजने की क्षमता में निहित है। यदि हमारी शिक्षा इन गुणों का विकास नहीं कर रही है, तो वह भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं कही जा सकती।

दुर्भाग्यवश भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अभी भी उस औपनिवेशिक सोच की छाया में दिखाई देता है जिसका उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन करने वाले नागरिक नहीं, बल्कि निर्देशों का पालन करने वाले कर्मचारी तैयार करना था। पाठ्यपुस्तक के निश्चित उत्तर, परीक्षा में अपेक्षित भाषा और अंक प्राप्ति की निरंतर चिंता ने विद्यार्थियों के भीतर से प्रश्न पूछने का साहस कम किया है। अनेक बार कक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी भी किसी वास्तविक समस्या पर स्वतंत्र रूप से विचार करने में कठिनाई अनुभव करता है। यह स्थिति केवल व्यक्ति के विकास को ही बाधित नहीं करती, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक सृजनात्मक क्षमता को भी सीमित कर देती है। एक ऐसा देश जो विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, उसे केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का उत्पादक बनना होगा।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित संभावनाओं का विकास करना है। जब किसी विद्यार्थी को किसी समस्या को समझने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, विभिन्न विकल्पों पर विचार करने और अपने समाधान प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है, तभी उसकी बौद्धिक क्षमता का वास्तविक विस्तार होता है। यही प्रक्रिया वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जन्म देती है, यही नवाचार की आधारशिला रखती है और यही लोकतांत्रिक समाज में सक्रिय नागरिकता का निर्माण करती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ जल संकट से लेकर पर्यावरणीय चुनौतियों तक और ग्रामीण विकास से लेकर शहरी प्रबंधन तक अनेक जटिल प्रश्न उपस्थित हैं, वहाँ ऐसी शिक्षा की आवश्यकता और भी अधिक है जो विद्यार्थियों को समस्याओं की पहचान करने और उनके व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए प्रेरित करे।

यह परिवर्तन केवल पाठ्यक्रम बदल देने से नहीं आएगा। इसके लिए शिक्षा के पूरे दर्शन में परिवर्तन आवश्यक है। विद्यालयों को ऐसी जगह बनना होगा जहाँ जिज्ञासा का सम्मान हो, जहाँ प्रश्न पूछना अनुशासनहीनता नहीं बल्कि सीखने का संकेत माना जाए, जहाँ गलती को दंड का नहीं बल्कि सुधार और खोज का अवसर समझा जाए, और जहाँ विद्यार्थी केवल सुनने वाले नहीं बल्कि सक्रिय भागीदार हों। शिक्षा को पुस्तकों की सीमाओं से निकालकर प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, समुदायों, खेतों, उद्योगों और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ना होगा। जब विद्यार्थी अपने आसपास की समस्याओं को समझेंगे और उन्हें हल करने का प्रयास करेंगे, तभी शिक्षा उनके लिए जीवंत अनुभव बन सकेगी।

इस परिवर्तन में शिक्षकों की भूमिका निर्णायक है। शिक्षक केवल जानकारी देने वाले नहीं, बल्कि प्रेरणा देने वाले मार्गदर्शक होने चाहिए। उन्हें विद्यार्थियों को तैयार उत्तर देने के बजाय सही प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना होगा। शिक्षा का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर ज्ञान की खोज करें। इसके लिए शिक्षकों के सतत प्रशिक्षण, शैक्षणिक स्वतंत्रता और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। यदि शिक्षक स्वयं सृजनात्मक और शोधपरक वातावरण में कार्य करेंगे, तभी वे विद्यार्थियों में इन गुणों का विकास कर पाएँगे।

परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार भी समय की मांग है। जब तक सफलता का निर्धारण मुख्यतः याद की गई सामग्री के आधार पर होगा, तब तक रटने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी। मूल्यांकन को इस प्रकार पुनर्गठित करना होगा कि वह विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मक अभिव्यक्ति, परियोजना-आधारित कार्य, सहयोगात्मक प्रयास और वास्तविक जीवन में ज्ञान के अनुप्रयोग को महत्व दे। विद्यार्थियों को यह अनुभव होना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक अर्जित करना नहीं, बल्कि जीवन को समझना और समाज को बेहतर बनाना है।

भारत के पास इस परिवर्तन के लिए मजबूत सांस्कृतिक आधार भी मौजूद है। हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा प्रश्न, संवाद और चिंतन पर आधारित रही है। उपनिषदों से लेकर प्राचीन विश्वविद्यालयों तक, भारतीय बौद्धिक परंपरा ने जिज्ञासा को ज्ञान का मूल माना है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उस चिंतनशील विरासत को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़ें। यह संयोजन भारत को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था प्रदान कर सकता है जो न केवल वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी समृद्ध हो।

नीति-निर्माताओं के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। यदि वे शिक्षा को स्मृति-केंद्रित ढाँचे से निकालकर सृजन-केंद्रित ढाँचे में परिवर्तित करने का साहसिक निर्णय लेते हैं, तो इसका प्रभाव केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे अनुसंधान को नई गति मिलेगी, उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा, सामाजिक समस्याओं के समाधान विकसित होंगे और भारत की आर्थिक तथा बौद्धिक शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। विकसित भारत का सपना केवल नई इमारतों, राजमार्गों और डिजिटल प्रणालियों से पूरा नहीं होगा; वह तभी साकार होगा जब हमारे विद्यालय ऐसे युवाओं को तैयार करेंगे जो नई राहें बनाने का साहस रखते हों, जो चुनौतियों को अवसर में बदल सकें और जो ज्ञान को केवल ग्रहण ही नहीं, बल्कि उसका सृजन भी कर सकें। इसलिए आज की सबसे बड़ी शैक्षिक आवश्यकता यही है कि भारत अपने बच्चों को उत्तर याद करने के बजाय प्रश्न पूछना, समस्याओं से भागने के बजाय उनका समाधान खोजना और परंपरागत सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय नए क्षितिजों का निर्माण करना सिखाए। यही शिक्षा भारत को आने वाले दशकों में ज्ञान, नवाचार और मानवीय प्रगति का अग्रदूत बना सकती है।

Share this post

डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top