स्विट्ज़रलैंड: पहाड़ों पर कुदरत का करिश्मा, मशीनों का जलवा और हम सबको ‘आज खाने में क्या है की चिंता?’

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ज्यूरिख–इंटरलाकेन (स्विट्ज़रलैंड):  क्या हो अगर कुदरत अपनी पूरी दौलत एक ही जगह लुटा दे, पहाड़ों को बर्फ का ताज पहना दे और इंसान उन पहाड़ों पर चढ़ने के लिए ऐसी ट्रेन बना दे, जिसे देखकर गुरुत्वाकर्षण भी शर्म से सिर झुका ले?
स्विट्ज़रलैंड में आपका स्वागत है! यहाँ पहाड़ आसमान से गुफ़्तगू करते हैं, झीलें आईने की तरह चमकती हैं और ट्रेनें ऐसी वक्त की पाबंद हैं कि लगता है, घड़ी भी इनके सामने हाज़िरी लगाती होगी।
इंटरलाकेन की हमारी यात्रा ने कुदरत, इंजीनियरिंग और स्विस अनुशासन का ऐसा नज़ारा पेश किया कि कुछ देर के लिए हमारी बोलती बंद हो गई। मगर भारतीय यात्रियों को चुप रखना आसान नहीं। थोड़ी देर बाद सवाल उठ ही गया: “भाई, लंच में क्या है?”

ज्यूरिख से इंटरलाकेन और फिर पहाड़ों की ओर हमारा सफर शुरू हुआ। ट्रेन जैसे-जैसे ऊपर चढ़ती गई, धरती का रंग बदलता गया। हरी-भरी घाटियाँ पीछे छूटने लगीं। सामने ऊँची चट्टानें, गहरी ढलानें और बर्फ से सजी चोटियाँ दिखाई देने लगीं।

ट्रेन का खड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ना अपने आप में एक तमाशा था। पटरी पहाड़ के सीने पर साँप की तरह बल खाती हुई ऊपर जा रही थी। हमें लगा, ट्रेन पहाड़ से कह रही हो, “भाई साहब, जरा साइड दीजिए। सैलानी ऊपर आ रहे हैं!”
कभी-कभी लगा कि ट्रेन नहीं, हमारी हिम्मत चढ़ाई चढ़ रही है। लेकिन स्विस इंजीनियरिंग ने ऐसा इंतज़ाम किया था कि पहाड़ भी परेशान नहीं हुआ और यात्री भी सुरक्षित आगे बढ़ते रहे।

फिर आई केबल कारों की बारी। ये गाड़ियाँ हवा में झूलती हुई हमें धरती से ऊपर ले जा रही थीं। नीचे घर खिलौनों जैसे दिखाई दे रहे थे, सड़कें पेंसिल से खींची गई लकीरों में बदल गई थीं और हरी घाटियाँ किसी चित्रकार की शानदार कृति जैसी लग रही थीं।

केबल कार में बैठकर नीचे देखिए तो दिल कहता है, “वाह, क्या नज़ारा है!”
और दिमाग धीरे से पूछता है, “अगर केबल ने आज छुट्टी लेने का फैसला कर लिया तो?”
खैर, स्विस व्यवस्था पर भरोसा था। इसलिए डर को जेब में रखा और कैमरे को बाहर निकाल लिया।

फिर वह दृश्य आया, जिसे आँखें शायद कभी भुला नहीं पाएँगी।
बर्फ से ढका पहाड़ किसी बुज़ुर्ग बादशाह की तरह खड़ा था। सिर पर चमकता हुआ बर्फ का ताज, चेहरे पर सदियों की गंभीरता और चारों ओर प्रकृति का दरबार। सूरज की किरणें बर्फ पर पड़तीं तो कभी चाँदी जैसी चमक पैदा होती, कभी हल्का नीला रंग उभर आता।

हवा में ठंडक थी, लेकिन नज़ारों में ऐसी गर्मजोशी कि मन वहीं ठहर जाने को करता था। कैमरे लगातार क्लिक कर रहे थे। हर यात्री चाहता था कि इस जन्नत का थोड़ा-सा हिस्सा अपने मोबाइल में कैद कर ले।
लेकिन प्रकृति को मोबाइल की गैलरी में कैद करना भी अजीब कोशिश है। असली नज़ारा सामने था, और हम सब स्क्रीन पर उसका छोटा-सा संस्करण खोज रहे थे!
हिमनद यानी ग्लेशियर ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया। सफेद बर्फ का यह संसार जितना शानदार था, उतना ही चिंताजनक भी।
पिघलते ग्लेशियरों की खबरें याद आईं। प्रकृति हमें अपनी सुंदरता का तोहफा देती है, लेकिन साथ में चेतावनी भी लिख देती है: “मेरी हिफाज़त करो, वरना यह नज़ारा अगली पीढ़ी को तस्वीरों में ही मिलेगा।”
कुदरत की मेहरबानी का आनंद लेना चाहिए, मगर उसकी हिफाज़त की जिम्मेदारी भी याद रखनी होगी।
स्विट्ज़रलैंड पर लगता है जैसे कुदरत ने कुछ ज़्यादा ही मेहरबानी की हो। पहाड़, झीलें, हरियाली, साफ-सुथरे रास्ते और शानदार बुनियादी ढाँचा—हर तरफ एक नज़्म जैसी लय दिखाई देती है।
लेकिन इस देश की कहानी केवल कुदरती हुस्न की नहीं है। यहाँ व्यवस्था, समय की पाबंदी, सफाई और तकनीकी दक्षता भी खास ध्यान खींचती हैं।
ट्रेनें अपने समय के अनुसार चलती हैं। केबल कारें व्यवस्थित ढंग से काम करती हैं। मशीनें रोजमर्रा के अनेक काम संभालती हैं। पूरा सिस्टम इस तरह चलता दिखाई देता है, जैसे किसी अदृश्य कंडक्टर के हाथ में संचालन की छड़ी हो।
भारत में सफर का अपना अलग मज़ा है। किसी अनजान यात्री से बातचीत शुरू हो जाती है। चाय के साथ राजनीति, क्रिकेट, महँगाई और रिश्तेदारों की चर्चा भी हो सकती है। पाँच मिनट में आदमी अपना जीवन-वृत्तांत सुना देता है और कभी-कभी आपका भी पूछ लेता है!
स्विट्ज़रलैंड में बातचीत अक्सर संक्षिप्त और काम-केंद्रित दिखाई देती है। यहाँ सिस्टम और प्रक्रियाएँ जीवन को व्यवस्थित रखती हैं। भारत में इंसानी रिश्तों, सहज बातचीत और अचानक पैदा होने वाली मदद की अपनी अलग रवायत है।
दोनों अनुभवों में अपनी-अपनी खूबसूरती है। एक तरफ मशीनों की सटीकता, दूसरी तरफ इंसानी जुड़ाव की गर्माहट।
### बर्फ के बीच ‘वंदे मातरम्’ की गूँज
और फिर पहाड़ की चोटी पर एक अनोखा भारतीय पल देखने को मिला।
दो समूहों में शामिल भारतीय और प्रवासी भारतीय पहाड़ी रेलवे स्टेशन पर इकट्ठा हुए। अचानक राष्ट्रीय गान और ‘वंदे मातरम्’ की आवाज़ गूँज उठी। चारों ओर बर्फीली चोटियाँ थीं, ठंडी हवा थी और बीच में भारत की पहचान से जुड़ा एक भावनात्मक क्षण।
दूर देश में रहने वाले भारतीयों के लिए राष्ट्रीय पहचान का यह सार्वजनिक प्रदर्शन ध्यान खींचने वाला था। मातृभूमि से जुड़ाव सीमाओं और दूरियों के बावजूद अपनी जगह बनाए रखता है।
हमारी निगाहें बार-बार ग्लेशियर, झीलों और पहाड़ों की ओर लौट रही थीं। लेकिन उस पल में देश की याद ने भी अपना रंग भर दिया।
### स्विस पहाड़, भारतीय पेट और अचार की बोतल
अब खाने की बात न हो तो यात्रा-वृत्तांत अधूरा ही रहेगा।
आखिर आगरा हो या ज्यूरिख, पहाड़ की चोटी हो या होटल का कमरा, भारतीय यात्री के मन में एक सवाल जरूर उठता है:
“आज खाने में क्या है?”
यूरोप में भारतीय भोजन की उपलब्धता देखकर खुशी हुई। वेजिटेरियन खाना, जैन व्यंजन और दक्षिण भारतीय पकवान आसानी से मिल रहे हैं। हम दो बार दक्षिण भारतीय भोजन का स्वाद ले चुके हैं।
सच कहूँ तो बेकार ही अपने साथ अचार की बोतल लेकर आए थे। यहाँ तो कई भोजन के साथ अचार भी मिल गया! हमारी बोतल ने शायद मन ही मन कहा होगा, “मुझे इतनी दूर लाने की क्या जरूरत थी, मालिक?”
लंच में बड़ा पाव, भाजी पाव और गर्मागर्म मसालेदार चाय मिली। फिर क्या था—ठंडे मौसम में चाय ने आत्मा तक को गर्म कर दिया। मसालेदार स्वाद ने यात्रा की थकान पर मरहम लगा दिया।
स्विट्ज़रलैंड में चॉकलेट हाउस का अनुभव भी शानदार रहा। तरह-तरह की मस्त, रसीली, कुरकुरी चॉकलेटें! कुछ चॉकलेट्स का स्वाद ऐसा कि जीभ ने तुरंत दूसरा राउंड माँग लिया।
और जब झोली भर फ्री चॉकलेट मिल गईं, तो हमारी ऊर्जा का स्तर अचानक पहाड़ की ऊँचाई से भी ऊपर पहुँच गया। यात्रियों के चेहरों पर मुस्कान थी और हाथों में चॉकलेट। स्विस अर्थव्यवस्था का यह मीठा पक्ष हमें खूब भाया!
### ज्यूरिख झील और भारतीय डिनर
दिन भर के सफर के बाद ज्यूरिख झील का नज़ारा मन को सुकून देने वाला था। पानी की शांति, आसपास की व्यवस्था और शाम का वातावरण—सब कुछ दिल को छू गया।
रात का शानदार डिनर एक और भारतीय रेस्टोरेंट में हुआ। भारतीय मसालों और परिचित स्वादों ने विदेश की धरती पर घर जैसा एहसास कराया।
कभी-कभी लगता है कि भारतीय भोजन केवल पेट नहीं भरता, वह यात्रा में भावनाओं का भी इंतज़ाम करता है। एक गरम रोटी, थोड़ा मसालेदार खाना और चाय का प्याला—बस, आदमी फिर दुनिया जीतने निकल पड़ता है!
### भारत की याद? अभी तो चॉकलेट चल रही है!
स्विट्ज़रलैंड ने हमें कुदरत की शायरी, इंजीनियरिंग की महारत और एक अलग सामाजिक व्यवस्था का अनुभव दिया।
हम पहाड़ देखने आए थे। लेकिन साथ में चॉकलेट हाउस, ज्यूरिख झील, भारतीय भोजन और कई मजेदार अनुभव भी मिल गए।
अब तक इस यात्रा में भारत को बहुत मिस करने का मौका नहीं मिला। जहाँ-जहाँ गए, भारतीय भोजन मिला, भारतीय चेहरे मिले और कहीं न कहीं अपने देश की झलक दिखाई दी।
भारत की शान और तिरंगा अपनी जगह बुलंद हैं। और हम भारतीय, दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाएँ, अपने स्वाद, अपनी बातचीत और अपने जज़्बे के साथ पहुँचते हैं।
वापस लौटते समय हमारे साथ थीं बर्फीली चोटियों की यादें, झीलों का सुकून, हरी घाटियों की ताज़गी, समय की पाबंद ट्रेनें और पहाड़ों के बीच गूँजता हुआ अपना देश।
स्विट्ज़रलैंड ने एक बात फिर साबित कर दी—कुदरत जब मुस्कुराती है, तो पहाड़ खिल उठते हैं। और जब भारतीय यात्री मुस्कुराता है, तो अगला सवाल होता है:
“चलो ठीक है, अब बताओ… कल खाने में क्या है?”

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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