यह कोई अचानक का आवेश नहीं था। योजनाबद्ध तरीके से कैमरे के लिए ‘अग्रेशन’ तैयार किया गया। जैसे ही कोऑर्डिनेटर का इशारा होता, छोटे-छोटे ग्रुप उठ खड़े होते, नारे लगाते, क्लोज-अप में आक्रामक बयान देते और फिर बैठ जाते। सुरक्षाकर्मी मौजूद थे, लेकिन किसी को रोका नहीं गया। सिर्फ विजिलेंस और ऑब्जर्वेशन। इस पूरे दृश्य का मकसद सड़क पर भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर ‘तिरंगा, गुस्सा, दमन’ का नैरेटिव बनाना था। जब आप फोन पर रील्स देखेंगे, तो भीड़, जुनून और अन्याय दिखेगा। जमीन पर न भीड़ थी, न आस-पास के लोगों का मौन समर्थन, न ही किसी बड़े राजनीतिक दल के स्टूडेंट विंग का वास्तविक जुड़ाव।
कनॉट प्लेस का सच: भीड़ नहीं, कैमरे की भीड़
कनॉट प्लेस में ‘लहरा दो तिरंगा’ यात्रा की कवरेज करने वाली एक प्रत्यक्षदर्शी ने दिन भर जो देखा, वह इस नाटक का पूरा खाका खोल देता है। शाम पांच बजे तक कोई भीड़-आंदोलन नहीं था। मेट्रो खुली थी, रास्ते खुले थे, फिर भी जनसमर्थन नहीं दिखा। पांच बजे के बाद 30-40 के ग्रुप्स आए-लेफ्ट क्रांतिकारी युवा संगठनों से जुड़े। उनके साथ पूरी वीडियोग्राफी टीम थी, जो अलग-अलग एंगल से क्लोज फ्रेम्स शूट कर रही थी। कैमरा चालू रहता, कोऑर्डिनेटर क्यू देता, लोग जोश में नारे लगाते और तिरंगा लहराते (या लाल झंडा)। फिर अगले एंगल के लिए आगे बढ़ जाते। हर संगठन अपनी टीम लेकर आया था। कमी यूट्यूबर्स और इन्फ्लुएंसर्स पूरी कर रहे थे।

क्लोज-अप में कम भीड़ भी ज्यादा लगती है। एक आक्रामक साउंड-बाइट रील्स में ज्यादा असर डालती है। कभी-कभी सुरक्षाकर्मियों को उकसाने की कोशिश होती-लोकतंत्र और तिरंगे का हवाला देकर। कैमरा हमेशा ऑन रहता। जब ये रील्स वायरल होतीं, तो दर्शक को लगता है कि पूरा शहर सड़कों पर है। वास्तविकता यह थी कि न कोई बड़ा जन-जुड़ाव था, न आस-पास के आम लोगों का सपोर्ट, न ही कोई स्वाभाविक आक्रोश। यह फ्लैश मॉब जैसा फ्लैश प्रोटेस्ट था, जिसे सोशल मीडिया के लिए प्लान और एक्सीक्यूट किया गया। पत्रकार और रीलबाज के बीच की लकीर मिट गई है। प्रोटेस्टर ही यूट्यूबर और पत्रकार बन गए हैं। दूसरों को काम न करने दो, उनका वीडियो बनाओ-और वो भी प्लानिंग करके। एक पत्रकार को काम करने से तीन बार रोका गया। सवाल यह है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं?
कांग्रेस का पैड प्रोपेगेंडा नेटवर्क और IFF की भूमिका
इस नाटक के पीछे सिर्फ कुछ युवा संगठन नहीं हैं। हालिया एक्सपोज में दावा किया गया है कि कांग्रेस के पास करीब 5000 पेड कंटेंट क्रिएटर्स हैं, जिनका काम फेक प्रोपेगेंडा फैलाना है। इसमें कुछ चैनलों के पूर्व संपादक भी हैं। कंटेंट क्रिएटर बनकर यू ट्यूब और पार्टी दोनों से नोट छाप रहे हैं।
जब सरकार फेक न्यूज के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) के अपार गुप्ता की भूमिका सामने आती है। दावा है कि वे कांग्रेस की मदद कर रहे हैं। IFF दावा करता है कि वह न्यूट्रल है, लेकिन कोऑर्डिनेशन का पैटर्न कुछ और ही कहता है। फेक न्यूज फैलाने वाले क्रिएटर्स की जांच किए बिना, सिर्फ ‘सेंसरशिप’ और ‘आंदोलन’ का नैरेटिव खड़ा करना-यह तटस्थता नहीं, राजनीतिक संरेखण है।
यह कोई नया पैटर्न नहीं है। पहले भी कांग्रेस पर इन्फ्लुएंसर्स को पैसे देकर घटनाओं को बदनाम करने या भीड़ जुटाने के आरोप लगे हैं। कुछ मामलों में क्रिएटर्स ने खुद दावे किए, फिर वीडियो डिलीट कर दिए। कांग्रेस ने इनकार किया। लेकिन जब तिरंगा यात्रा जैसी घटना में छोटे ग्रुप्स, प्रोफेशनल कैमरे, क्लोज-अप शूटिंग और वायरल रील्स एक साथ दिखते हैं, तो सवाल उठता है कि ये ‘आंदोलन’ कितना स्वतःस्फूर्त हैं और कितना नेटवर्क-ड्रिवन।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है। लेकिन जब विरोध का मकसद तिरंगे की आड़ में लाल झंडा लहराकर रील्स बनाना हो, जब जमीन पर भीड़ न हो और कैमरे पर भीड़ हो, जब पेड नेटवर्क और तथाकथित न्यूट्रल संस्थाएं एक ही दिशा में काम करें, तब यह आंदोलन नहीं, नाटक है। पोल खुल चुकी है। अब सवाल यह है कि दर्शक इसे कितनी देर तक सच मानते रहेंगे।



