ट्रक से ट्रेन तक, थाने से दफ्तर तक: वसूली का सिस्टम

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दिल्ली। यह तो पूरे 140 करोड़ देशवासियों को मालूम है कि बिना आग के धूंआ नहीं निकलता। चाहे ट्रैफिक पुलिस वाला हो, जो सिग्नल पर बड़े चालान का डर दिखाकर, छोटी रकम ले लेता है। या ट्रेन का टीटी, जो ‘सीट खाली नहीं है’ बोलकर पॉकेट में हजार रुपये ठूंस लेता है। रात के अंधेरे में हाईवे पर ट्रक रोककर पुलिस वालों की वसूली तो देखी होगी आपने भी, या जिलाधिकारी कार्यालय का क्लर्क, जो फाइल पर लक्ष्मी के वजन के बिना हिलता तक नहीं।

मजेदार बात यह है कि जो आज मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या विधायक बनकर कुर्सी पर विराजमान हैं, उन्हें इस ‘परंपरा’ की भनक तक नहीं है। अरे वाह! भनक होती तो लगाम लगाने का प्रयास विधानसभा या लोकसभा के माध्मय से करते। वहां इन मुद्दों की गूंज सुनाई देती।

कितनी मासूमियत! दिन भर ‘जनसेवा’ के भाषण देते हैं, रात को नींद आती होगी। यह सोचकर कि ‘सब कुछ ठीक है’। ट्रक ड्राइवर रात में ठंडे में खड़ा होकर घूस देता है, यात्री टीटी को नोट थमाता है, आम आदमी थाने में ‘केस’ दर्ज कराने के लिए साहब के घर में कूलर लगवाने से लेकर उनके बच्चे के एडमिशन का खर्चा तक उठाता है।

लेकिन सड़कों पर प्रदर्शन? वो तो सिर्फ महंगाई, आरक्षण या राजनीतिक मुद्दों पर ही होते हैं। भ्रष्टाचार की इस लूट पर कोई ‘आंदोलन’ नहीं। क्योंकि आंदोलन का एजेन्डा नेता और उनकी पार्टी तय करती है। जनता नहीं।

इस लापरवाही की वजह से यह ‘व्यवस्था’ इतनी गहरी जड़ पकड़ चुकी है कि इसे ‘भ्रष्टाचार’ कहना भी अब अपराध लगता है।

थाने तो ऐसे हैं जहाँ ‘प्रोटेक्शन’ का मतलब ही ‘प्रोटेक्शन मनी’ हो गया है। पुलिस भर्ती सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि ‘कमाई’ के लिए होती है। वहाँ बैठे सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक का चेहरा देखकर लगता है – ‘बोले तो, कितना देना है?’ यह ‘सेवा भाव’ पूरे देश में फैला हुआ है। केंद्र हो या प्रदेश, हर सरकार इसे ‘छोटा मुद्दा’ समझकर नजरअंदाज करती है। क्योंकि अगर इस पर लगाम लगाई तो ‘सिस्टम’ का इंजन ही बंद हो जाएगा ना!

हुजूर, केन्द्र और प्रदेश की सरकारों से विनम्र अपील है – थोड़ा इस ‘सार्वजनिक भ्रष्टाचार’ पर भी ध्यान दीजिए। कैमरे लगाइए, सख्त निगरानी रखिए, शिकायत के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाइए और सबसे जरूरी – अपने मंत्रियों-विधायकों को समझाइए कि ‘जनता सब जानती है’।

व्यंग्य मत समझिए, यह तंज है। अगर आप सच में ‘अमृत काल’ लाना चाहते हैं तो इन छोटी-छोटी लूटों को रोकिए, वरना 140 करोड़ लोग यह सब चुपचाप सहने को मजबूर रहेंगे। सब मिलकर ऐसे मुद्दे पर आवाज उठाएंगे लगता नहीं। जबकि यहां जिस तरह के भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया है, उससे भारतीय समाज इतना यूज टू हो चुका है कि अब उसे भ्रष्टाचार की श्रेणी में गिनना भी बंद कर चुका है।

थोड़ा तो इस ‘अनदेखी महामारी’ पर लगाम लगाने की जरूरत है, हुजूर।

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