ट्रम्प के चक्कर में पूरी दुनिया में हड़कंप

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लखनऊ : डॉनल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल ने विश्व राजनीति को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ हर दिन नई आशंका, नया तनाव और नई अनिश्चितता जन्म ले रही है। कभी व्यापार युद्ध, कभी आयात शुल्क, कभी चीन को चेतावनी, कभी यूरोप पर दबाव और अब ईरान युद्ध तथा होरमुज़ जलडमरूमध्य का संकट—इन सबने मिलकर पूरी दुनिया को बेचैन कर दिया है। वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का बड़ा हिस्सा ट्रम्प की नीतियों और निर्णयों के इर्द-गिर्द घूमने लगा है।

सबसे बड़ा संकट इस समय पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान संघर्ष और होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर उत्पन्न हुआ है। दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से का तेल और गैस इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। लेकिन ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को लगभग युद्धक्षेत्र में बदल दिया है। Iran ने होरमुज़ जलडमरूमध्य पर अपने प्रभाव को बढ़ाते हुए जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है, जबकि अमेरिका ने इसके जवाब में नौसैनिक दबाव और नाकेबंदी की नीति अपनाई है। परिणाम यह हुआ कि विश्व ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा संकट मंडराने लगा।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय जहाज सप्ताहों से खाड़ी क्षेत्र में फँसे हुए हैं। समाचार एजेंसियों के अनुसार युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिदिन एक सौ पच्चीस से एक सौ चालीस जहाज इस मार्ग से गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग दस के आसपास पहुँच गई है। हजारों नाविक समुद्र में फँसे हुए हैं और तेल आपूर्ति बाधित होने के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने लगा है।

ट्रम्प ने इस संकट को केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं रहने दिया, बल्कि इसे अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन का विषय बना दिया। उन्होंने बार-बार कहा कि अमेरिका होरमुज़ जलडमरूमध्य पर “पूर्ण नियंत्रण” स्थापित कर सकता है। हाल ही में ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिकी नौसैनिक शक्ति इस समुद्री मार्ग को किसी भी कीमत पर खुलवाएगी और यदि आवश्यकता पड़ी तो ईरान पर फिर हमला भी किया जा सकता है।

ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिखाई दे रहा। ईरानी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि अमेरिका और उसके सहयोगी दबाव बढ़ाते हैं, तो होरमुज़ जलडमरूमध्य पर और कठोर नियंत्रण लगाया जा सकता है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में उछाल आ गया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबा चला, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फँस सकती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख ने तो यहाँ तक कहा कि विश्व तेल बाजार “लाल क्षेत्र” में प्रवेश करने की स्थिति में पहुँच चुका है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ट्रम्प की राजनीति में स्थिरता और पूर्वानुमान का अभाव दिखाई देता है। एक दिन वे युद्ध की धमकी देते हैं, अगले दिन शांति वार्ता की बात करने लगते हैं। कभी वे ईरान पर बड़े हमले की चेतावनी देते हैं, तो कभी कहते हैं कि समझौते की संभावना बनी हुई है। हाल ही में ट्रम्प ने स्वीकार किया कि वे ईरान पर एक बड़े हमले से केवल एक घंटे पहले पीछे हटे थे क्योंकि उन्हें नई शांति पहल का संकेत मिला था।

इस अनिश्चितता ने पूरी दुनिया के बाजारों को अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। परिवहन लागत बढ़ रही है। खाद्य पदार्थों और उर्वरकों के दाम प्रभावित हो रहे हैं। यूरोप में महँगाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। एशियाई देशों को ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर नए विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं। कई देश अब डॉलर आधारित तेल व्यापार से हटकर वैकल्पिक मुद्रा व्यवस्थाओं की ओर बढ़ रहे हैं। भारत, चीन, पाकिस्तान और अन्य एशियाई देशों ने खाड़ी क्षेत्र के साथ वैकल्पिक व्यापारिक समझौतों पर चर्चा तेज कर दी है।

चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा ने भी इस संकट को और जटिल बना दिया है। ट्रम्प ने दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति ने भी ईरान से होरमुज़ जलडमरूमध्य खोलने की आवश्यकता पर सहमति जताई है। लेकिन चीन खुलकर अमेरिकी रणनीति के साथ खड़ा दिखाई नहीं दे रहा। चीन स्वयं ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है और वह इस संकट को अपने आर्थिक हितों के अनुसार देख रहा है।

यूरोप की स्थिति भी असहज है। एक ओर वह अमेरिका का सहयोगी है, दूसरी ओर वह युद्ध और ऊर्जा संकट से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यूरोपीय देशों को भय है कि यदि होरमुज़ संकट और बढ़ा, तो उनकी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। इसी कारण यूरोप अब अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता की नीति पर पुनर्विचार करने लगा है।

भारत के लिए यह संकट अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। यदि होरमुज़ जलडमरूमध्य में संकट लंबा चलता है, तो भारत में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और परिवहन लागत पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। महँगाई बढ़ सकती है और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव भारत के लिए कुछ नए रणनीतिक अवसर भी पैदा कर सकते हैं।

वास्तव में, आज की दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ किसी एक नेता की राजनीतिक शैली पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। ट्रम्प की राजनीति केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति नहीं रह गई है; वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों, युद्ध और शांति—सब पर असर डाल रही है। यही कारण है कि “ट्रम्प के चक्कर में पूरी दुनिया में हड़कंप” केवल एक आकर्षक शीर्षक नहीं, बल्कि आज की वास्तविकता बन चुका है।
इतिहास गवाह है कि जब विश्व राजनीति संवाद और सहयोग से हटकर शक्ति प्रदर्शन, धमकी और आर्थिक युद्धों की ओर बढ़ती है, तब वैश्विक अस्थिरता गहराती जाती है। आज पूरी दुनिया इसी अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। होरमुज़ का संकट, ईरान युद्ध, बढ़ती महँगाई, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा यह संकेत दे रही है कि यदि समय रहते संतुलित और शांतिपूर्ण समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले वर्षों में दुनिया और बड़े संकटों का सामना कर सकती है।

(डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

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डॉ. शैलेश शुक्ला

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डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

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