उसे आजादी नही मिली निर्णय करने के लिए

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आदरणीय मेघना पंत जी एवं लक्ष्मी प्रसाद पंत जी

विषय : 10 जुलाई 2026 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित “अरेंज मैरिज की व्यवस्था को एक अपग्रेड की जरूरत है” लेख के संदर्भ में।

नमस्कार।

आज दैनिक भास्कर में प्रकाशित मेघना पंत जी का लेख पढ़ा। विगत कुछ समय से उनके लेखों में एक समान वैचारिक प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है—भारतीय परिवार, विवाह संस्था, पारिवारिक संबंधों और भारतीय जीवन-दर्शन को तथाकथित आधुनिकता के नाम पर कटघरे में खड़ा करना तथा पश्चिमी समाज में उत्पन्न सामाजिक प्रयोगों को भारतीय समाज के लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना।
यह केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं रह जाता, बल्कि धीरे-धीरे भारतीय समाज की मूल अवधारणाओं के विरुद्ध एक वैचारिक नैरेटिव निर्मित करता है। इसलिए इसका उत्तर आवश्यक है।

लेख का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि भारतीय समाज में स्त्री को जीवनसाथी चुनने का अधिकार कभी था ही नहीं। यह निष्कर्ष न तो इतिहाससम्मत है, न धर्मसम्मत और न ही भारतीय परंपरा के अनुरूप।

भारत विश्व की वह प्राचीन सभ्यता है जहाँ स्वयंवर की परंपरा थी। सीता, द्रौपदी, दमयंती, सावित्री और अनेक उदाहरण हमारे इतिहास और साहित्य में उपलब्ध हैं, जहाँ कन्या की इच्छा और स्वीकृति का स्पष्ट स्थान था। विवाह को केवल परिवारों का समझौता नहीं माना गया, बल्कि वर और वधू दोनों की सहमति को महत्व दिया गया।
ऋग्वेद और अथर्ववेद के वैवाहिक मंत्र स्पष्ट रूप से पति-पत्नी को समान सहभागी मानते हैं। विवाह के समय कहा जाता है—
“सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव।”
अर्थात् वधू परिवार में सम्मान और अधिकार के साथ प्रवेश करे।

ऐसी सभ्यता पर यह आरोप कि उसने स्त्री को कभी निर्णय का अधिकार ही नहीं दिया, इतिहास के साथ न्याय नहीं करता।
हाँ, यह सत्य है कि मध्यकालीन विदेशी आक्रमणों—विशेषकर इस्लामी आक्रमणों—के समय सामाजिक परिस्थितियाँ अत्यंत असुरक्षित हो गईं। स्त्रियों की रक्षा के लिए पर्दा, बाल-विवाह जैसी अनेक सामाजिक प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। वे भारत की सनातन संस्कृति की मूल देन नहीं थीं, बल्कि असुरक्षा की परिस्थितियों में उत्पन्न सामाजिक प्रतिक्रियाएँ थीं।

यदि आज उन ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज को ही भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप बताकर प्रस्तुत किया जाएगा, तो यह अधूरा इतिहास होगा।

लेख में सिया अग्रवाल की घटना का उल्लेख किया गया है। किंतु यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि सिया अग्रवाल के पास कौन-सी स्वतंत्रता नहीं थी? वह आधुनिक शिक्षा प्राप्त युवती थीं, अपने निर्णय स्वयं ले रही थीं और अपने जीवन के विकल्प स्वयं चुन रही थीं।

यदि तथाकथित आधुनिकता, पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक बंधनों से मुक्त जीवन के बावजूद ऐसी दुखद घटनाएँ घट रही हैं, तो क्या समस्या का कारण भारतीय विवाह व्यवस्था है? या फिर आधुनिकता की उस अवधारणा में कहीं गंभीर दोष है, जो स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर ही समाप्त कर देती है?
दुर्भाग्य यह है कि आज एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाया जा रहा है कि हर बंधन दमन है, हर परंपरा पिछड़ी है और हर व्यक्तिगत इच्छा ही अंतिम सत्य है।

यही विचार आगे चलकर संबंधों को क्षणिक बना देता है।
भारतीय दर्शन कभी स्वतंत्रता का विरोध नहीं करता, बल्कि वह स्वतंत्रता को संयम से जोड़ता है। पश्चिम का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता को अधिकार के रूप में देखता है, जबकि भारत उसे कर्तव्य के साथ संतुलित करता है।
स्वतंत्रता यदि उत्तरदायित्व से अलग हो जाए तो वही स्वच्छंदता बन जाती है, और स्वच्छंदता अंततः व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों को अस्थिर करती है।

विडंबना यह है कि जिन देशों को आधुनिकता का आदर्श बताकर भारतीय समाज के सामने प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ महिलाओं को समान राजनीतिक अधिकार भी भारत से बहुत बाद में मिले।

स्विट्ज़रलैंड, जिसे आज अत्यंत आधुनिक और विकसित लोकतंत्र माना जाता है, वहाँ राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को मताधिकार 1971 में मिला। यूरोप के अनेक देशों में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी तक महिलाएँ मतदान, संपत्ति और सार्वजनिक जीवन के अधिकारों के लिए संघर्ष करती रहीं।
दूसरी ओर भारत में संविधान लागू होते ही बिना किसी आंदोलन के महिलाओं को पुरुषों के समान सार्वभौमिक मताधिकार प्राप्त हुआ।
यदि तुलना करनी ही है तो पूरी ईमानदारी से की जानी चाहिए।

आज भी विश्व के अनेक समाजों में हलाला, जबरन विवाह, बहुविवाह, महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध, स्त्री की गवाही का आधा मूल्य जैसी कुरीतियाँ मौजूद हैं।
आश्चर्य है कि ऐसे विषय तथाकथित प्रगतिशील विमर्श का केंद्र नहीं बनते; लेकिन भारतीय विवाह संस्था को बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है।
यह चयनात्मक दृष्टि निष्पक्ष नहीं कही जा सकती।

लेख में कहा गया है कि “अरेंज मैरिज को अपग्रेड करने की आवश्यकता है।” प्रश्न यह है कि अपग्रेड किस आधार पर?
यदि अपग्रेड का अर्थ यह है कि वर-वधू की सहमति हो, संवाद हो, शिक्षा हो, समानता हो और दोनों का निर्णय सम्मानित हो—तो भारतीय समाज भी उसका स्वागत करता है।
किन्तु यदि अपग्रेड का अर्थ पश्चिमी व्यक्तिवाद, अस्थायी संबंध, विवाह संस्था का अवमूल्यन और परिवार को अप्रासंगिक बनाना है, तो भारत को ऐसा अपग्रेड स्वीकार नहीं हो सकता।

भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी अनुबंध नहीं है।
यह दो परिवारों का मिलन है।
यह दो वंशों का दायित्व है।
यह अग्नि के समक्ष लिया गया आजीवन व्रत है।
यह सात जन्मों की प्रतीकात्मक प्रतिज्ञा है।
यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की संयुक्त यात्रा है।
इसीलिए भारतीय समाज हजारों वर्षों से परिवार को सभ्यता की मूल इकाई मानता आया है।

आदरणीय पंत जी,

दैनिक भास्कर जैसा प्रतिष्ठित समाचार पत्र यदि लगातार ऐसे लेख प्रकाशित करेगा, जिनमें भारतीय सामाजिक संस्थाओं का एकपक्षीय मूल्यांकन हो और पश्चिमी सामाजिक प्रयोगों का आकर्षक प्रस्तुतीकरण हो, तो यह स्वस्थ विमर्श नहीं, बल्कि वैचारिक असंतुलन उत्पन्न करेगा।

पत्रकारिता का दायित्व समाज को उसकी जड़ों से काटना नहीं, बल्कि तथ्यों, इतिहास और संतुलित दृष्टिकोण के साथ विचार-विमर्श प्रस्तुत करना है।
भारत को आधुनिक अवश्य बनाइए, पर उसकी आत्मा को नष्ट करके नहीं।
भारत को अपनी सभ्यता के साथ आधुनिक होना है, पश्चिम की विफलताओं की नकल करके नहीं।

यही भारत की शक्ति है, यही उसकी पहचान है और यही वह “कुछ बात” है जिसने इस राष्ट्र को सहस्राब्दियों तक जीवित रखा है।

— सादर

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