दिल्ली। RSS और BJP के भीतर पिछले बारह वर्षों में कांग्रेसी, वामपंथी तथा मुस्लिम इको-सिस्टम के प्रति बढ़ते स्नेह ने 2014 से पहले के प्रतिबद्ध समर्थकों में गहरी चिंता पैदा कर दी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ करोड़ों भारतीयों का विश्वास इसलिए जुड़ा क्योंकि वे राष्ट्रीय विचारधारा के ऐसे चेहरे बने जिन्होंने कभी असमंजस की भाषा नहीं अपनाई। वे किसी के सामने झुके नहीं, स्पष्ट जवाब दिया, कड़ी निंदा की बजाय हिसाब किया। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते दंगों पर नियंत्रण और प्रधानमंत्री बनने के बाद आतंकवाद तथा नक्सलवाद जैसी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में उल्लेखनीय कमी—ये उपलब्धियां उनकी दृढ़ छवि का आधार बनीं। यह छवि ही BJP को 2014, 2019 में सत्ता तक ले गई।
परंतु आज कई पुराने समर्थकों को लगता है कि यह दृढ़ता 2024 से कमजोर पड़ रही है। पूरे देश में यह धारणा सफलतापूर्वक बनाई जा रही है कि प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों ही कुछ कमजोर दिख रहे हैं। उनकी पहचान और शक्ति का मानो हरण हो रहा है।
इसका एक प्रमुख कारण विपक्षी खेमे से ‘सर्टिफिकेट’ इकट्ठा करने की प्रवृत्ति है। BJP को ‘सेकुलर’ साबित करने के लिए वामपंथियों और मुस्लिम बुद्धिजीवियों से प्रमाण पत्र की तलाश की जा रही है। पार्टी अपने मूल कार्यकर्ताओं पर पूरा विश्वास नहीं जता रही। अब ऐसे कार्यकर्ताओं की समस्या यह है कि वे कांग्रेस और वामपंथियों के लिए अछूत है और अपने लोगों के लिए ‘अपरिपक्व’। परिणामस्वरूप यह समुदाय केवल भाषण सुनने और जयकारा लगाने तक सीमित रह गया है। वह जाए तो जाए कहां!
तथ्य यह है कि 2014 में लगभग 47 प्रतिशत हिंदू मतदाता BJP के साथ थे। नए वर्गों को जोड़ने के अभियान में मूल हिंदू वोटर्स पर मेहनत न करने का परिणाम उलटा निकला। मत प्रतिशत में अपेक्षित वृद्धि के बजाय गिरावट के संकेत मिल रहे हैं, भले ही कांग्रेसी, मुस्लिम और वामपंथी तत्वों को जोड़ने का प्रयास जारी रहता लेकिन अपनों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी। यदि विरोधियों को लुभाने की बजाय अपने समर्थकों का आधार मजबूत किया जाता, तो 400 पार सीटें 2024 में हासिल करना असंभव नहीं था।
आज पार्टी अक्सर अपने साथ खड़े लोगों पर ध्यान देने की बजाय गाली देने वालों और आलोचकों को समझाने-बुझाने में अधिक समय व्यतीत करती दिखती है। वैचारिक दरवाजे विशेष रूप से परिक्रमा करने वालों और वामपंथी झुकाव वाले लोगों के लिए खोले गए हैं। चाटुकारों के लिए स्पेस तैयार हो रहा है, जबकि पुराने प्रतिबद्ध कार्यकर्ता किनारे होते जा रहे हैं। यह स्थिति 2014 से पहले वाले समर्थकों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
यह प्रेम और समावेश का दावा जितना आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। संगठन की जड़ें राष्ट्रीय विचारधारा में हैं। यदि वे जड़ें कमजोर पड़ेंगी तो समर्थन का आधार भी छीज जाएगा। समर्थक या तो अधिक मुखर होंगे या विचार से विमुख। दोनों ही स्थितियां पार्टी के लिए नुकसानदेह हैं।
सावधानी की सलाह स्पष्ट है। वैचारिक स्पष्टता बनाए रखें। अपने मूल समर्थकों को प्राथमिकता दें। विरोधियों से सर्टिफिकेट की बजाय अपने काम और परिणामों से वैधता हासिल करें। चाटुकारिता को स्थान देने की बजाय प्रतिबद्धता को सम्मान दें। यदि समय रहते ये स्थितियां नहीं संभाली गईं, तो जो विश्वास 2014 में बनाया गया था, वह धीरे-धीरे बिखर सकता है।
राष्ट्रीय विचारधारा की ताकत उसकी स्पष्टता और दृढ़ता में है। उसे बनाए रखना सभी संबंधित लोगों की जिम्मेदारी है।



