यह पुस्तक मूल रूप से मलयालम में लिखी गई थी और केरल में बेस्टसेलर रही। हिंदी अनुवाद के बाद अब अंग्रेजी संस्करण राष्ट्रीय स्तर पर पाठकों तक इसकी पहुंच बढ़ाएगा। पुस्तक का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत से जुड़े कई मिथकों को दूर करना, उसकी उत्पत्ति, स्वतंत्रता संग्राम में स्थान, जनभावनाओं तथा निरंतर प्रासंगिकता को समझाना है। प्रकाशन के लिए इंडस स्क्रॉल्स प्रेस के प्रकाशक जी. श्रीधथन को विशेष आभार व्यक्त किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केरल एवं बिहार के पूर्व राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने पुस्तक का विमोचन किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह विशिष्ट अतिथि थे, जबकि प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। इस अवसर पर वंदे मातरम् की ऐतिहासिक यात्रा, उसके सांस्कृतिक महत्व, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका तथा उससे जुड़े विभिन्न विमर्शों पर गहन चर्चा हुई।

डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने अपने संबोधन में पुस्तक को वंदे मातरम् की सच्ची कहानी बताते हुए उसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने रंगा हरि जी के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए उन्हें एक विद्वान, कुशल लेखक और प्रतिबद्ध देशभक्त के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि यह कृति राष्ट्रीय गीत की उत्पत्ति, स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका तथा उससे जुड़ी भावनाओं और विवादों को स्पष्ट करती है। जे. नंदकुमार ने वंदे मातरम् को मात्र गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और भारतीय चेतना का शक्तिशाली स्वर बताते हुए कांग्रेस शासनकाल में इसके साथ हुए “सौतेले व्यवहार” पर भी प्रकाश डाला। प्रो. योगेश सिंह ने गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विस्तृत सिनाप्सिस पर विस्तार से चर्चा की।
यह पुस्तक मूल रूप से मलयालम में लिखी गई थी और केरल में बेस्टसेलर रही। हिंदी अनुवाद के बाद अब अंग्रेजी संस्करण राष्ट्रीय स्तर पर पाठकों तक इसकी पहुंच बढ़ाएगा। पुस्तक का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत से जुड़े कई मिथकों को दूर करना, उसकी उत्पत्ति, स्वतंत्रता संग्राम में स्थान, जनभावनाओं तथा निरंतर प्रासंगिकता को समझाना है। प्रकाशन के लिए मंच से इंडस स्क्रॉल्स प्रेस के प्रकाशक जी. श्रीदत्तनजी को विशेष आभार व्यक्त किया गया।
रंगा हरि: एक बौद्धिक योद्धा और साहित्यकार
श्री रंगा हरि (लोकप्रिय नाम हरि ‘एट्टन’ या हरिजी) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रमुख विचारक, लेखक और वरिष्ठ नेता थे। उनका जन्म दिसंबर 1930 (अधिकांश स्रोतों के अनुसार 5 दिसंबर) में केरल के त्रिपुनिथुरा/एर्नाकुलम क्षेत्र में रंगा शेणॉय और पद्मावती के घर हुआ। तेरह वर्ष की आयु में वे संघ के स्वयंसेवक बने और 1951 में पूर्णकालिक प्रचारक बने। केरल से राष्ट्रीय नेतृत्व की उच्चतम भूमिका तक पहुँचने वाले वे पहले प्रचारक थे।
1948 में गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगने पर उन्होंने प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर सत्याग्रह में भाग लिया और कई महीने जेल में रहे। 1975 के आपातकाल में जब संघ पुनः प्रतिबंधित हुआ, तो वे केरल में भूमिगत प्रतिरोध नेटवर्क के प्रमुख संगठकों में से एक थे। 1983 से 1994 तक वे केरल के प्रांत प्रचारक रहे और राजनीतिक चुनौतियों के बीच संगठनात्मक विस्तार को दिशा दी। 1991 से 2005 तक पंद्रह वर्षों तक वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख (Akhil Bharatiya Bauddhik Pramukh) के रूप में संघ के वैचारिक प्रशिक्षण की जिम्मेदारी संभाली।
वे असाधारण बहुभाषाविद् थे। उन्होंने मलयालम में लगभग 43, हिंदी में 11 और अंग्रेजी में 2 पुस्तकें लिखीं, जो हिंदू चिंतन, राष्ट्रवाद और इतिहास पर केंद्रित थीं। उनके सबसे उल्लेखनीय कार्यों में से एक द्वितीय सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) के लेखों और भाषणों का बारह खंडों वाला संग्रह श्री गुरुजी समग्र का संपादन-संकलन है। उन्होंने महाभारत के विभिन्न पात्रों पर भी गहन विश्लेषणात्मक कृतियाँ लिखीं। 29 अक्टूबर 2023 को 93 वर्ष की आयु में कोच्चि में उनका निधन हुआ। उनके जीवन का अंतिम चरण भी लेखन और अध्ययन में ही बीता।
The Story of Vande Mataram का अंग्रेजी लोकार्पण रंगा हरि जी की बौद्धिक विरासत को और व्यापक बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम है। यह कृति न केवल वंदे मातरम् की ऐतिहासिक यात्रा को सामने लाती है, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना को भी पुनर्जीवित करती है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को शक्ति दी। ऐसे आयोजन भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान पर गंभीर संवाद को प्रोत्साहित करते हैं।



