विदेशी शासकों की अपनी-अपनी दृष्टि

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सुषमा जुगरान ध्यानी

दिल्ली । हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी यहां हैं भाई-भाई’ का सैद्धांतिक उद्घोष हमारे यहां सुनने और बोलने में जितना कर्णप्रिय लगता है, व्यावहारिक स्तर पर इसमें संतुलन बनाये रखने की चुनौती उतनी ही दुष्कर है। आज देश का सबसे बड़ा सामाजिक विमर्श अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के मुद्दे पर आकर टिक जाता है, सारा राजनीतिक परिदृश्य इसके इर्द-गिर्द उलझता दिखाई देता है। हालांकि अल्पसंख्यकों में गिने जाने वाले सिख, जैन और बौद्ध धर्मावलंबी सनातन धर्म की निर्गुण या ज्ञानाश्रयी शाखा के ही अंग हैं जो साकार ब्रह्म की अवधारणा के तहत मूर्ति पूजा और कर्मकांड का विरोध करते हुए निराकार ब्रह्म के रूप में एक परम सत्ता को इस चराचर जगत का पालनहार मानते हैं। इस लिहाज से देखें तो अपने देश में मुख्यतः हिन्दू, मुसलमान और ईसाई ही भिन्न-भिन्न धर्मावलंबी हुए। इनमें बहुसंख्यक हैं सनातनधर्मी हिन्दू जो भारत भूमि को अपनी माता मानते हैं, अपना मूल देश मानते हैं जबकि अल्पसंख्यक माने जाने वाले मुसलमान और ईसाई दुनिया के दूसरे हिस्सों से यहां आकर अपने धर्म के विस्तार के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहे।

भारतवर्ष के हजारों साल पुराने सनातन धर्म को इस्लाम और क्रिश्चियनिटी से बचाये रखने की चुनौती अब से करीब हजार ग्यारह सौ साल पहले मिलनी शुरू हो गई थी जब चंगेज खां, तैमूर लंग, अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद गोरी और मोहम्मद गजनवी जैसे आक्रांताओं द्वारा पहले यहां लूटपाट और मार-काट की जाती रही और अंततः मुगल बादशाहों के रूप में इस्लाम धर्मावलंबियों का साम्राज्य ही स्थापित हो गया। उसके बाद 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड की ‘ईस्ट इंडिया नाम कंपनी’ व्यापार के उद्देश्य से भारत आयी तो उसके पीछे-पीछे अंग्रेजी हुकूमत भी यहां पैर पसारने लगी। मिशनरी कहलाने वाले अंग्रजों ने यहां मुगलों के अत्याचारी शासन के साथ-साथ राजे रजवाड़ों की आपसी कलह और अस्थिरता का फायदा उठा धीरे-धीरे मुगलों को परास्त कर कभी फूट डालो और राज करो तो कहीं हड़प नीति जैसे षड्यंत्र कर कलकत्ता से शुरू होकर दिल्ली तक अपना यूनियन जैक लहरा दिया। कालांतर में अंग्रजों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को परास्त कर रंगून जेल में कैद कर मुगल साम्राज्य का खात्मा कर दिया और यहां की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संस्कृति को अपने मन मुताबिक ढालने का यत्न करने लगे पर अंततः उन्हें भी देश छोड़कर जाना पड़ा। हां, इन कई सौ सालों में इस्लाम और क्रिश्चियनिटी ने भी यहां अपनी अनिवार्य उपस्थिति दर्ज कर ली और अंग्रेजी हुकूमत से आजादी के बाद देश में संविधान सम्मत धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सभी धर्म और जातियों के अधिकार और कर्त्तव्य तय हो गये।
देश के दो मुख्य अल्पसंख्यक समुदायों मुसलमान और ईसाई धर्मावलंबियों की तुलना करें तो दोनों की प्रचार शैली और आचार व्यवहार में काफी फर्क दिखता है जिसके कारण दोनों के प्रति बहुसंख्यक हिन्दू धर्मावलंबियों की राय कई मायनों में अलग अलग भी हो जाती है।

अंग्रेजों ने भी भारत पर करीब दो-ढाई सौ साल एकछत्र शासन किया। बतौर मिशनरी उन्होंने अपने ईसाई धर्म का खूब प्रचार प्रसार किया, लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया और बड़ी संख्या में लोगों का धर्मांतरण भी करवाया। जाहिर है, इसके लिए उनके द्वारा चर्च या गिरजाघरों का भी बड़ी संख्या में निर्माण हुआ। ईसाई बहुल गोवा जैसे शहरों में तो ऐतिहासिक चर्चों के अलावा गली-गली छोटे-छोटे चर्च- जिन्हें चैपल कहा जाता है ऐसे ही स्थापित मिलेंगे जैसे गांव कस्बों में हिंदू देवी-देवताओं के छोटे-बड़े मंदिर। लेकिन मेरी जानकारी में देश में अब तक कहीं भी ऐसा कोई विवाद खड़ा नहीं दिखा कि फलां गिरजाघर की जगह कोई मंदिर था और उसकी दावेदारी के लिए इन दो धार्मिक समुदायों के बीच अदालतों में मामले चल रहे हों। यहां तक कि गिरजाघर और मंदिर कहीं अपवाद स्वरूप ही आसपास होगें। यानी अंग्रजों ने देश के तमाम हिस्सों में चर्च तो खूब बनाये लेकिन मंदिर परिसरों की भूमि से बिल्कुल अलग। एक सच यह भी है कि अंग्रजों ने गरीब, दलित, वंचित और शोषितों को धन का, समानता का और शिक्षा का प्रलोभन देकर खूब धर्म परिवर्तन कराया। जबकि इसके विपरीत माना जाता है कि मध्य काल में मुगल शासकों ने डरा-धमकाकर और जबरिया हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराया। ‘मार बांधकर मुसलमान बनाना’ जैसी कहावत भी शायद इसी आधार पर प्रचलित हुई होगी। सच यह है उपनिवेशवादी अंग्रेज जानते थे कि उन्हें यहां लंबा नहीं रहना है इसलिए उन्होंने यहां की धार्मिक आस्था के साथ कोई खिलवाड़ न करते हुए स्वेच्छा से लोगों को धर्म परिवर्तन का प्रलोभन दिया। इधर हजारों साल पुराना सनातन धर्म अपनी बहुत सी रूढ़िवादी सामाजिक परंपराओं और भेदभावपूर्ण वर्ण व्यवस्था के कारण कई धाराओं में विभक्त हो रहा था और जनमानस के बीच इसे लेकर एक असंतोष और आक्रोश का भाव भी व्याप्त था। ईसाई मिशनरियों ने भारतीय समाज की इसी दुखती नब्ज को टटोलते हुए ऐसे वंचित लोगों को शिक्षा और समानता का अधिकार देने का वादा किया जिसे अनेक लोगों ने सहर्ष स्वीकार किया। इसके उलट मुसलमान पहले आक्रमणकारी और आक्रांता के रूप में और कालांतर में सल्तनत काल से शुरू होकर अंत में मुगल वंश तक कई सौ साल इस देश पर शासन करते हुए इस कदर रच बस गये कि उन्हें इसका अंदाजा ही नहीं रहा कि भविष्य में कोई उनके शासन की भी नींव हिला सकता है। इसीलिए जनता को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करने के साथ ही इस्लाम के विस्तार के लिए उन्होंने अधिकतर मंदिरों के निकट ही मस्जिदें बनानी शुरू कर दीं। कई मामलों में गर्भगृह पर ज्यादा ध्यान न दे मंदिरों को ऊपर-ऊपर ध्वस्त कर मस्जिद बनवा ली। आज की वैज्ञानिक प्रगति की कल्पना भी पांच छह सौ साल पहले भला किसने की होगी कि एंथ्रोपोलॉजी के माध्यम से नृतृत्वशास्त्रियों द्वारा सौ दो सौ क्या, हजारों साल पुराने अवशेष और कालखंड का पता लगाना भी संभव होगा। अन्यथा बाबर द्वारा अयोध्या के राममंदिर या धार की भोजशाला जैसे सनातन धर्म के आस्था केंद्रों को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के बाद ही तो मस्जिदें निर्मित होतीं। ऐसे में आज की न्याय व्यवस्था के आधार पर अदालतों द्वारा साक्ष्य के अभाव में सनानतधर्मियों के मंदिर और शिक्षा केन्द्रों का अस्तित्व भला कैसे लौटाया सकता था!

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