यहां अच्छी ज़िंदगी अभी भी आम आदमी की पहुंच में है

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देहरादून : सुबह दूध वाला घंटी बजाता है।
अख़बार दरवाज़े पर पहुंच जाता है।
मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सब्ज़ी, दवा, किराना या भोजन घर आ जाता है। डॉक्टर का अपॉइंटमेंट उसी दिन मिल सकता है। घर की सफाई और छोटी-मोटी मरम्मत के लिए भी सेवाएं ऐप पर उपलब्ध हैं।
भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है।
सेवा क्षेत्र के विस्फोटक विस्तार ने जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। शायद यही कारण है कि आज भारत दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक बनकर उभर रहा है।
दशकों तक भारतीयों की निगाहें पश्चिम की ओर लगी रहीं। अमेरिका अवसरों की धरती माना गया। यूरोप समृद्धि का प्रतीक था। विदेशी नौकरी और पासपोर्ट सफलता के पर्याय बन गए।
यह सपना आज भी जीवित है। लेकिन विदेशों में बसे अनेक भारतीय अब एक नई सच्चाई को पहचान रहे हैं। अच्छी ज़िंदगी केवल ऊंची तनख्वाह से नहीं बनती। उसकी असली पहचान रोज़मर्रा की सहज सुविधाओं में छिपी होती है।
मोबाइल इंटरनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने डिजिटल क्रांति को आम आदमी तक पहुंचा दिया है। दुनिया के सबसे सस्ते डेटा प्लान यहीं उपलब्ध हैं। कुछ सौ रुपये में महीने भर वीडियो कॉल, मनोरंजन, ऑनलाइन शिक्षा और कारोबार चल सकता है।
फिर आती है यूपीआई की कहानी।
चाय वाला हो या सब्ज़ी विक्रेता, रिक्शा चालक हो या बड़ा शोरूम, हर कोई एक ही डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ा है। न छुट्टे पैसे का झंझट, न बैंक की कतारें। मोबाइल स्कैन कीजिए और भुगतान पूरा।
सड़क किनारे नारियल बेचने वाले से लेकर बड़े मॉल तक, डिजिटल भुगतान की यह सहजता विदेशी पर्यटकों को भी चकित कर देती है।
स्वास्थ्य सेवाओं का क्षेत्र भी कम रोचक नहीं है।
दुनिया के कई देशों में डॉक्टर के पास जाना जेब पर भारी पड़ सकता है। भारत में चुनौतियों के बावजूद चिकित्सा सेवाएं अब भी अपेक्षाकृत सुलभ और किफायती हैं। आधुनिक अस्पतालों में दुनिया भर से मरीज इलाज कराने आते हैं, जबकि मोहल्लों के क्लीनिक आज भी लाखों लोगों की पहली जरूरत बने हुए हैं।
लेकिन शायद भारत की सबसे बड़ी सुविधा समय है।
यहां मध्यम वर्ग का परिवार भी घरेलू सहायक, रसोइया या देखभाल करने वाले कर्मचारियों की मदद ले सकता है। इससे लोगों के पास परिवार, बच्चों और अपने शौकों के लिए अधिक समय बचता है।
पश्चिमी देशों में ऐसी सेवाएं अक्सर केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रहती हैं।
परिवहन व्यवस्था भी तेजी से बदल रही है। मेट्रो नेटवर्क फैल रहे हैं। नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। आधुनिक हवाई अड्डे और बेहतर रेल सेवाएं देश को पहले से कहीं अधिक मजबूती से जोड़ रही हैं।
यह वही भारत है जिसे कभी लालफीताशाही और धीमी व्यवस्था का पर्याय माना जाता था।
लेकिन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि न इंटरनेट है, न यूपीआई और न ही एक्सप्रेसवे।
उसकी सबसे बड़ी ताकत है उसकी जीवंत जीवनशैली।
कहां मिलेगा ऐसा देश जहां दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व और होली एक ही कैलेंडर में पूरे उत्साह से मनाए जाते हों? कहां मिलेगा ऐसा भूभाग जहां हिमालय की बर्फ, राजस्थान का रेगिस्तान, गोवा के समुद्र तट, उत्तर-पूर्व के वर्षावन और मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर एक ही राष्ट्र की पहचान हों?
भारत केवल एक देश नहीं है।
यह अनेक संसारों का संगम है।
यहां त्योहार सड़कों पर उतर आते हैं। शादियां पूरे मोहल्ले का उत्सव बन जाती हैं। पड़ोसी परिवार जैसे लगते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी अब भी बच्चों की दुनिया का अहम हिस्सा हैं। दोस्तियां दशकों तक निभाई जाती हैं।
दुनिया के कई विकसित देशों में यही सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है।
बेशक भारत के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। यातायात की अव्यवस्था है। प्रदूषण चिंता का विषय है। सार्वजनिक सुविधाओं में असमानता है। कई शहरों को अभी लंबा सफर तय करना है।
लेकिन इन सबके बावजूद भारत एक अनमोल चीज़ देता है: कम लागत में अपेक्षाकृत बेहतर जीवन।
यही वजह है कि अनेक प्रवासी भारतीय लौट रहे हैं। विदेशी पेशेवर भारत को अवसर और सुविधा के नए केंद्र के रूप में देख रहे हैं। उद्यमी, डिजिटल नोमैड, सेवानिवृत्त लोग और युवा परिवार भारत को नए नजरिए से परखने लगे हैं।
आधुनिक भारत की कहानी केवल आर्थिक विकास की कहानी नहीं है।
यह उस देश की कहानी है जहां जीवन अब भी रिश्तों से चलता है। जहां छोटी-छोटी खुशियां बड़ी दौलत मानी जाती हैं। जहां परिवार, समुदाय और अपनापन आज भी सबसे बड़ी पूंजी हैं।
अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा अमीर होना जरूरी नहीं होता।
और शायद यही भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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