मराठी में लिखे पत्र का हिंदी अनुवाद 

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आदरणीय मोहनजी,
सादर नमस्कार!
मनःपूर्वक धन्यवाद !!
२० तारीख से मैं कई लोगों को पत्र लिख रहा हूँ। यह आखिरी पत्र मैं आपको लिख रहा हूँ।
मोहनजी मुझे याद है, हमारी पहली मुलाकात कन्याकुमारी में हुई थी। उस समय आपकी संघ की बैठक थी और आप ‘अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख’ थे। तमिलनाडु प्रांत की वह बैठक ‘विवेकानंदपुरम’ में आयोजित की गई थी। उसी दौरान विवेकानंद केंद्र के ‘जीवनव्रती शिक्षार्थी’ के रूप में मेरा प्रशिक्षण भी चल रहा था। संजोग से, आप भोजन के लिए विवेकानंद केंद्र के भोजन कक्ष में आए थे। हम जब आपको खाना परोस रहे थे, तब आप जिस आत्मीयता से हमसे बात कर रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था मानो “हमारा ही कोई अत्यंत करीबी रिश्तेदार प्यार से मन की बातें कर रहा हो।” उसके बाद लगभग दो घंटे तक आपने हमसे गपशप की। राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े संगठन का पदाधिकारी होने के बावजूद, आपने हमारे सभी सवालों के जवाब दिए। उस समय हम बमुश्किल २३-२४ साल के युवा थे। लेकिन, आपने जिस तरह से हमसे संवाद साधा, उससे मुझे पहली बार यह अहसास हुआ कि आपके मन में युवाओं के प्रति अगाध स्नेह और आत्मीयता है।
मोहनजी, मैंने आपसे पहला सवाल पूछा था कि, “जो धार्मिक परिवर्तन (Religious Conversion) हो रहा है और युवाओं में जो वैचारिक परिवर्तन आ रहे हैं—यानी हिंदू धर्म से ईसाई या मुस्लिम धर्म में होने वाला मतांतरण हो, या JNU जैसे विश्वविद्यालयों में लगातार चलने वाली ‘सत्ताविरोधी’ (Anti-establishment) विचारधारा हो—इन सब का मूल कारण क्या है?”
उस पर हमारा मार्गदर्शन करते हुए आप बोले थे कि, “धर्मांतरण करने वाली मिशनरी संस्थाएं या JNU के प्रोफेसर बहुत शक्तिशाली हैं इसलिए ऐसा हो रहा है, यह बात नहीं है; बल्कि हम ही उन लोगों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं। हम JNU के छात्रों तक पहुँचने में कम पड़ रहे हैं।”
आपने मुझे गुजरात की एक बुजुर्ग दादी का उदाहरण दिया था। उन दादी का धर्मांतरण हो चुका था। संगठन का एक हिंदू कार्यकर्ता उनसे मिलने गया। उसने तीन-चार दिनों तक सिर्फ उन दादी के खाने-पीने और सेहत का हालचाल लिया। पांचवें दिन वही दादी (जो ईसाई बन चुकी थीं) सीधे गांव के गणेश मंदिर में आती दिखाई दीं। हमारे कार्यकर्ता ने अचरज से पूछा, “दादी, आप यहाँ कैसे?” इस पर दादी ने जवाब दिया, “मेरे अपने लोग मुझ तक नहीं पहुँच रहे थे, इसलिए मुझे दूसरों की मदद लेनी पड़ी। अब जब मेरे अपने लोग मेरे साथ हैं, तो मैं अपने विचारों के साथ ही रहूँगी।”
उसी दौर में महाराष्ट्र में शिवसेना का बहुत प्रभाव था और मैं खुद एक शिवसैनिक था। मैंने आपसे दूसरा सवाल पूछा, “मोहनजी, RSS शिवसेना की तरह आक्रामक हिंदुत्व को क्यों नहीं अपनाता?” उस पर आपने जवाब दिया था, “संघ का हिंदुत्व आक्रामक नहीं, बल्कि ‘सर्वसमावेशी’ है।”
उस समय मुझे उस वाक्य का पूरा अर्थ समझ नहीं आया था। लेकिन बाद में, श्री गुरुजी द्वारा अपने जीवन के अंतिम दिनों में दिए गए भाषणों को जब मैंने सुना, तब मुझे ‘सर्वसमावेशी हिंदुत्व’ का असली अर्थ समझ आया। गुरुजी ने उस भाषण में कहा था—
श्री गुरुजी कहते हैं……
“इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न करने के लिए कोई एक विशिष्ट श्रेष्ठ सिद्धांत, कोई एक भव्य लक्ष्य आवश्यक है। अधिक प्रकार की आवश्यकता को सोच-समझकर हम सब एक स्नेह-संबद्ध जीवन को संपूर्ण समाज के संवर्धन के लिए अपनी-अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार लगा दें। इस प्रकार का समाज में सामंजस्य उत्पन्न करना यह वह भाव भिनी-अवस्था है, जो हमारे समाज की संगठितता के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यही संगठित जीवन का आह्वान है।”
आपका दिया हुआ यह मंत्र और श्री गुरुजी के वे विचार हृदय में संजोकर हम ‘पूर्वांचल’ (पूर्वोत्तर भारत) में काम के लिए गए। वहाँ हमारे सामने बड़ी चुनौतियाँ थीं। ‘भारत मुर्दाबाद’ के नारे लगाए जाते थे, हमें ‘नेपक’ (गैर-स्थानीय/बाहरी) या ‘विदेशी’ कहकर चिढ़ाया जाता था। १५ अगस्त या २६ जनवरी को ध्वजारोहण के समय, वहाँ के युवा कुत्तों और सुअरों की पूंछ में पटाखे बांधकर मैदान में छोड़ देते थे। शिलांग की मिशनरी संस्थाओं के कॉलेजों में पढ़े युवा ही वहाँ के छात्र संगठनों का नेतृत्व करते थे।
महाराष्ट्र के ही ‘प्रेम गायकवाड़’ नाम का एक कार्यकर्ता धर्मांतरित होकर उधर ‘फादर’ बनकर आया था। वह बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का काम कर रहा था। ‘Nagaland for Christ’, ‘Mizoram for Christ’, और ‘Greater Nagalim’ जैसे राष्ट्रविरोधी नारे शुरू हो गए थे। NSCN (National Socialist Council of Nagaland) के उग्रवादियों ने कई बार हमारी गाड़ियाँ रोककर उन्हें छीन लिया था। लेकिन, हमें एक ही सीख दी गई थी—”यह हमारे अपने ही लोग हैं, इन्हें प्यार से जीतना है।” इसलिए मैं प्रेम गायकवाड़ से बार-बार मिलता रहा, भले ही वह मुझे कई बार गालियाँ देता था।
मोहनजी, आपकी दी हुई इस विचारधारा के कारण मुझे एक बेहद गंभीर परिस्थिति का सामना करना पड़ा। अरुणाचल प्रदेश के विवेकानंद केंद्र विद्यालय में एक छात्र की गलत दवाई मिलने के कारण दुर्भाग्य से मृत्यु हो गई। अरुणाचल में ‘बच्चे के बदले बच्चा’ (जान के बदले जान) का नियम माना जाता था। “हमारा बच्चा चला गया, तो हम आपके प्राचार्य के बच्चे को मारेंगे!” ऐसी धमकी देते हुए लोग चढ़ आए। सब डर के मारे सन्न रह गए थे। अरुणाचली भाइयों के हाथों में ‘दाव’ (कोयते/हंसिया) थे। उग्र भीड़ स्कूल पर हमला करने ही वाली थी, यह तय था।
स्थानीय कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि डर के मारे हमारे संगठन का कोई भी कार्यकर्ता उनके सामने जाने को तैयार नहीं है। मैंने खुद वहाँ जाने का फैसला किया। साथियों ने मुझे खतरे से आगाह करते हुए रोकने की कोशिश की। लेकिन, “हमें अपने लोगों तक पहुँचना ही चाहिए”, आपका यह मंत्र मेरे मन में बसा था। जान का जोखिम उठाकर मैं वहाँ गया। भीड़ बेहद गुस्से में मुझे देख रही थी। मैं शांति से मृत बच्चे के शव के पास जाकर बैठ गया। आधा घंटा मैं बिना कुछ बोले वहाँ बैठा रहा; लोग मुझे गालियाँ दे रहे थे।
बाद में कुछ लोगों ने मुझे बाहर बुलाया। वहाँ एक पढ़ा-लिखा लेकिन दुखी इंसान भड़ककर मेरी तरफ झपटा और गालियाँ देते हुए बोला—”तुम लोग हिंदू, हम लोगों को हिंदू बनाने के लिए आये हो! हमारा बच्चा हिंदू बनने के लिए तैयार नहीं था, इस वास्ते तुम लोगों ने मार डाला!”
दरअसल वह आदमी ईसाई मिशनरी का ‘पास्टर’ था और उसी ने लोगों को भड़काया था। कुछ दिनों पहले ही हमने ‘अपर सुबनसिरी’ जिले में एक बड़ा मुफ्त नेत्र चिकित्सा शिविर (Eye Camp) लगाया था, जिसे स्थानीय लोगों का बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला था; उसी का गुस्सा उस पास्टर के मन में था।
उस पास्टर ने मुझसे कहा कि, “तू हिंदू है, तू हमें कन्वर्ट कर रहा है।” मैंने उनसे कहा कि, “भारत में रहने वाला हर इंसान हिंदू है। इस भूमि की संस्कृति को सहेजने वाला इंसान हिंदू है। इस भूमि के इतिहास को अपना मानने वाला इंसान हिंदू है। यहाँ के देवी-देवता, यहाँ के महान व्यक्तित्व… यहाँ की परंपराओं को अपना मानने वाला इंसान हिंदू है।”
मैंने उनसे कहा कि, “आप सूर्य-चंद्रमा की पूजा करते हैं। आप हिंदू कैसे नहीं हैं? हमारी परंपरा ही सूर्य-चंद्रमा की पूजा करना है। यह भूमि शंकर की है,” मैंने कहा, “अरुणाचल। हमें आपको हिंदू बनाने की क्या जरूरत है? आप तो पहले से ही (ऑलरेडी) हिंदू हैं।”
वह पास्टर चिढ़ गया और बोला, “तू हिंदू है… हम हिंदू हैं ना, तो हम गाय का मांस खाते हैं, तू गाय का मांस खाता है क्या फिर?”
मैंने कहा, “गाय का मांस खाने में क्या परेशानी है? हाँ, मेरे क्षेत्र में गाय का मांस खाने… न खाने का नियम है। हमारे यहाँ तो मांस ही नहीं खाने का नियम है, हमारे वारकरी संप्रदाय में। तो वहाँ गाय के मांस का सवाल ही कहाँ आता है? हम तो साधारण अंडा भी नहीं खाते।”
“हम गाय मांस खाते हैं, तुम बोलता है ना हम हिंदू हैं, हम गाय मांस खाते हैं, तुम खायेगा क्या?”
मैं बोला, “हमारे इसमें नियम है, लेकिन आप अगर बोलते हैं कि गाय मांस खाने से… हिंदू… मेरे गाय मांस खाने से आप यह स्वीकारेंगे कि आप भी हिंदू हैं, तो मैं खाने के लिए तैयार हूँ.”
“चलो,” “गाय मांस लाओ सर के लिए,” ऐसा कहकर उसने आसपास के बच्चों से कहा।
सच कहूँ तो मैं अंदर से पूरी तरह हिल गया था। मेरे मन में गाय का मांस खाने की हिम्मत नहीं थी। मैं अब भी पापभीरू (पाप से डरने वाला) हूँ। गाय मेरे लिए आज भी पवित्र है। मंदिर में माथा टेकने जाने का मन करता है मेरा।
मेरे साथी कह रहे थे, “प्रसादजी, आप चलो, निकलो।” मैंने कहा, “रुको, हमारे… हमारे ही लोग हैं ये।”
गाय का मांस लाया गया। वह गाय का मांस मेरे हाथ में रखा गया। मैंने आखिरी बार ईश्वर का स्मरण करके कहा, “मैं अब गाय का मांस खा रहा हूँ, यह मेरा आपद्धर्म है।”
मुझे उसी वक्त सूझा, मैंने उस पास्टर से कहा कि, “लेकिन मेरे वारकरी संप्रदाय में यह नियम है कि गाय मांस नहीं खाना चाहिए या मांस ही नहीं खाना चाहिए. लेकिन आप बोल रहे हैं ना आप मेरे भाई नहीं हैं ऐसा बोल रहे हैं, मैं आपका भाई नहीं हूँ ऐसा बोल रहे हैं, मैं सिर्फ आपके लिए गाय मांस खा रहा हूँ, मेरा नियम तोड़के.”
और जैसे ही मैंने हाथ गाय के मांस की तरफ बढ़ाया, उस आदमी ने झपटकर मुझे रोक लिया—”मत खाओ सर, मत खाओ!” ऐसा कहते हुए वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने मुझे गले लगा लिया—”सर, मैं गलत था।”
पूरा माहौल ही बदल गया मोहनजी!
“बच्चे के बदले बच्चा, खून के बदले खून, और तुमको भून देंगे!”
अरे, हम कितने लोग थे वहाँ? सिर्फ १०-१२! अपर सुबनसिरी जिले के बाहर के हम सब लोग थे। १०० के करीब लोग दाव और बंदूकें लेकर आए होते और हमें खत्म कर दिया होता तो कहीं भी हम… जंगल में हमें दफना दिया होता तो किसी को पता भी नहीं चलता।
मोहनजी, आपने जो बताया है, गुरुजी ने जो बताया है, विवेकानंद जी ने जो सिखाया है, उन विचारों पर विश्वास रखकर हम जिए और हमें सफलता मिली।
‘Love is life, hatred is death’ (प्रेम ही जीवन है, द्वेष ही मृत्यु)—स्वामी जी की सिखाई यह बात हमें आज भी समझ आती है। ‘ऐसी भावविभोर अवस्था निर्माण करना कि संपूर्ण समाज मेरा समाज है’—श्री गुरुजी की कही यह बात हमारे मन में पक्की बैठी हुई थी।
मोहनजी, आज भी, मुस्लिम हों, ईसाई हों, सभी समाजों के बीच मेरे दोस्त हैं और मैं उनसे दोस्ती रखता हूँ। मैं उनसे मतांतरण करने को नहीं कहता। हिंदू धर्म के भीतर भी अलग-अलग विचारों के लोगों से मेरी दोस्ती है। आर्थिक, सामाजिक, जातिगत सीमाओं से परे… राजनीति में भी दोस्त हैं, सामान्य दोस्त भी हैं। मैं उनके विचारों का सम्मान करता हूँ, मैं अपने विचारों का सम्मान करता हूँ। ‘यतो मत ततो पथ’ (जितने मत, उतने पथ) को मैं स्वीकार करता हूँ, जो रामकृष्ण परमहंस जी ने हमें सिखाया।
मोहनजी, अभिजीत तो मेरे दोस्त का बेटा है। हाँ, सब कहते हैं कि वह भटक गया है। लेकिन उसे सुधारने वाला, उसके साथ रहने वाला कौन है? हम ही रहेंगे ना? हाँ, मैंने उसकी पीठ थपथपाई, उसे ‘शाबाश’ कहा। अरे, कोई… कोई अगर कुछ सीखने की कोशिश कर रहा है, तो शाबाशी देनी ही पड़ेगी ना! जहाँ वह गलती कर रहा है, वहाँ गलतियाँ दिखानी ही पड़ेंगी ना! और साथ ही उसके मामले में अगर हमारे लोग कुछ गलती कर रहे हैं, तो वे गलतियाँ भी दिखानी ही पड़ेंगी ना!
मोहनजी, लेकिन एक मजे की बात है। संघ का स्वयंसेवक कभी भी ‘मोदी भक्त’ नहीं होता। जो हिंदुत्व को जीता है ना, वह कभी मोदी भक्त नहीं होता। वह संघ भक्त भी नहीं होता। वह केवल और केवल राष्ट्रभक्त – देशभक्त होता है। लेकिन मोहनजी, एक ऐसा बड़ा वर्ग है, जिसने संघ को कभी स्पर्श तक नहीं किया, लेकिन वह मोदी का भक्त है। मेरा ऐसा ही एक दोस्त है, जिसे संघ का रत्ती भर भी अनुभव या स्पर्श नहीं है, लेकिन वह मोदी भक्त है। मैंने अभिजीत का समर्थन किया, इसलिए उसने मुझे अपनी फ्रेंड लिस्ट से हटा दिया। उसी का भाई, जो मेरा दोस्त है, अन्ना के आंदोलन के समय उसने मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। लेकिन मैंने उसे अपनी फ्रेंड लिस्ट से नहीं निकाला। आज भी वह मेरा पक्का दोस्त है।
ऐसी एक बड़ी जमात है जो मोदी भक्त है, जिन्हें संघ परंपरा और हिंदुत्व के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है।
दूसरी बात यह कि वे स्वयंसेवक जो सच में आचार, विचार और कर्म को भूल चुके हैं, ऐसे भी कुछ स्वयंसेवक हैं; जो इन सब बातों को समझते ही नहीं हैं।
मोहनजी, आज सुबह आपका वाक्य सुना, युवाओं के प्रति आपके जो विचार सुने तो मैं तुरंत १९९४-९५ के दिनों में लौट गया। जिस तरह आप १९९४-९५ में हमसे बात करते थे, हमें समझते थे, उसी तरह अब भी आप बदली हुई युवा पीढ़ी को समझ रहे हैं, यह बात मेरे ध्यान में आई।
मोहनजी, जब आप अंबाजोगाई आए थे, उस कार्यक्रम के आयोजन का मैं प्रमुख था। उस कार्यक्रम में आपने ‘निःश्रेयस’ और ‘अभ्युदय’ की इन दो अवधारणाओं को बहुत सुंदरता से समझाया था। सामूहिक अभ्युदय और सामूहिक निःश्रेयस की संकल्पना भी आपने बताई थी।
मोहनजी, इन पाँच दिनों में, नहीं… हर बार कोई काम करते समय यह विचार हमेशा दिमाग में रहता है। पिछले पाँच दिनों में आपकी याद ज्यादा आई। कन्याकुमारी के उस पल की याद सबसे ज्यादा आई। उस गोमांस खाने वाले वाकये की याद आई और हेबालकर सर के सहस्रचंद्रदर्शन के समय आपके द्वारा बताई गई सामूहिक निःश्रेयस और सामूहिक अभ्युदय की संकल्पना याद आई।
बदलती दुनिया और बदलते समाज के साथ तालमेल बिठाते-बिठाते, कालानुरूप अपने भीतर जो निरंतर… बदलाव करने होते हैं, वे बदलाव करते समय कुछ शाश्वत मूल्यों को मन में रखकर और वर्तमान के प्रति सजग रहते हुए भूतकाल की ओर देखना होता है, अंबाजोगाई के भाषण में दिया गया आपका यह संदेश हमारे लिए बेहद अनमोल साबित हुआ।
मोहनजी, वह भावविभोर अवस्था मैं अपने भीतर निर्मित कर रहा हूँ, प्रयास कर रहा हूँ। हमारे स्वयंसेवक मुझे ‘साने गुरुजी’ कह रहे हैं, कुछ दोस्त मुझे ‘भाऊ तोरसेकर’ के पास जाने को कह रहे हैं, कुछ लोग मुझे ‘अनालाइज़र’ के भाषण सुनने की सलाह दे रहे हैं, कुछ लोग दूर-दूर से… मुझ पर कमेंट कर रहे हैं, कुछ लोग कह रहे हैं कि तेरे बर्ताव पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं… मुझे हँसी आती है मोहनजी!! कितने आभासी (Virtual) जगत में जी रहे हैं ये लोग!!
धन्यवाद,
आपका,
प्रसाद चिक्षे

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