इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत नीट से निकला गुस्सा

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दिल्ली । नई दिल्ली का जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।
लेकिन इस हंसी-मज़ाक और शोर-शराबे के पीछे एक साफ़ और मज़बूत पैगाम था: जवाबदेही चाहिए। हिंसा भी इस आंदोलन का जोश कम नहीं कर सकी। युवाओं के नए जत्थे लगातार पहुंचते रहे। बेखौफ, पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते यह धरना लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में बदल गया।
यह युवा आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अहम पड़ाव बन गया। शुरुआत परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह एक बड़े संदेश में बदल गई; देश के युवाओं की आवाज़ को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
जिस जन दबाव के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, प्रधानमंत्री से इंस्टाग्राम पर सीधे युवाओं से संवाद की मांग उठी और नंदन नीलेकणी समेत विशेषज्ञों की टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ, उसने एक बात साबित कर दी। शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।
इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की असली ताकत भी दिखा दी। जो काम कभी बड़े मीडिया संस्थान तय करते थे, वह इस बार इंटरनेट ने किया। कहानी वहीं बनी, वहीं फैली और वहीं से पूरे देश तक पहुंची। पारंपरिक मीडिया को युवाओं के पीछे-पीछे चलना पड़ा।
जेन ज़ी की अपनी अलग भाषा थी; बेबाक, सहज, प्रतीकों और व्यंग्य से भरी। उसने राजनीतिक आंदोलनों के पुराने तौर-तरीकों को तोड़ दिया। यह आंदोलन किसी पार्टी का नहीं, बल्कि भरोसा खो चुके छात्रों और युवाओं का आंदोलन बन गया। पहली बार बड़ी संख्या में डिजिटल पीढ़ी ने लोकतंत्र को सड़क और स्क्रीन : दोनों पर एक साथ जिया।
सरकार ने समय रहते कुछ कदम उठाए, जिससे तनाव और नहीं बढ़ा। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई फिर याद दिला दी; शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
नीट विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं था। यह भरोसे का संकट बन गया। करोड़ों परिवार शिक्षा को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की सीढ़ी मानते हैं। जब उसी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो केवल परीक्षा नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।
कई वर्षों तक नरेंद्र मोदी ने एक आत्मविश्वासी और सक्षम भारत की छवि गढ़ी। लेकिन नीट विवाद ने उस तस्वीर में दरार डाल दी। पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों ने राष्ट्रीय परीक्षा की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
संकट आना किसी भी सरकार के लिए असामान्य नहीं होता। असली परीक्षा संकट के समय नेतृत्व की होती है। जनता गलती से कम, उसे छिपाने या टालने से ज़्यादा नाराज़ होती है। ऐसे समय में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और तेज़ कार्रवाई ही भरोसा लौटाती है। लेकिन इस मामले में सरकारी प्रतिक्रिया अक्सर बचाव वाली ज़्यादा और समाधान वाली कम दिखाई दी। इससे लोगों का संदेह और गहरा हुआ।
संसदीय लोकतंत्र में मंत्री कई बार अपने विभाग की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए पद छोड़ देते हैं, चाहे व्यक्तिगत गलती सिद्ध न हुई हो। ऐसे फैसले लोकतंत्र को कमज़ोर नहीं, बल्कि मज़बूत करते हैं क्योंकि वे जनता को यह भरोसा देते हैं कि सत्ता जवाबदेह है।
इस विवाद ने एक और खतरे की ओर संकेत किया। लगातार चुनावी सफलताएं कई बार सरकारों को यह भरोसा दिला देती हैं कि जनता हमेशा उनके साथ रहेगी। यहीं से आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को विरोधी नहीं, चेतावनी देने वाला समझना चाहिए।
भारतीय परंपरा भी यही संदेश देती है। सत्ता के मद में चूर इंद्र को अंततः बालक कृष्ण के सामने झुकना पड़ा। नारद मुनि का अहंकार भी टूटा। रामायण का धोबी याद दिलाता है कि शासक सबसे साधारण नागरिक की आवाज़ भी अनसुनी नहीं कर सकता। इतिहास और पुराण दोनों कहते हैं, अहंकार निर्णय क्षमता को धुंधला कर देता है, जबकि विनम्रता रास्ता दिखाती है।
आज किसी भी सरकार की आंखें और कान केवल उसके अधिकारी नहीं होते। स्वतंत्र संस्थाएं, मीडिया, विशेषज्ञ और नागरिक समाज भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। जब ये आवाज़ें अनसुनी होने लगती हैं, तब सरकारें अपने ही बनाए घेरे में कैद हो जाती हैं। फिर केवल वही सुनाई देता है, जो अच्छा लगता है। असुविधाजनक सच बहुत देर से सामने आता है।
1975 का आपातकाल भी सत्ता और जनता के बीच बढ़ती दूरी की चेतावनी था। परिस्थितियां आज अलग हैं, लेकिन लोकतंत्र का सबक वही है; सत्ता का केंद्रीकरण, आलोचना की उपेक्षा और अति-आत्मविश्वास अंततः किसी भी सरकार को भारी पड़ सकते हैं।
नीट विवाद केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि किसी भी संस्था की साख पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है। राजनीतिक ताकत की असली नींव अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है।
नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी अवसर है। मजबूत नेतृत्व का अर्थ यह नहीं कि उससे कभी गलती न हो। मजबूत नेता वह होता है, जो गलती स्वीकार करे, दोषियों को सज़ा दे, संस्थाओं में सुधार लाए और जनता की आवाज़ सुने।
जंतर-मंतर का यह आंदोलन शायद आने वाले वर्षों में केवल नीट विवाद के लिए याद न रखा जाए। संभव है, इतिहास इसे उस पल के रूप में याद करे, जब भारत की डिजिटल पीढ़ी ने पहली बार लोकतंत्र को नई भाषा, नई ऊर्जा और नई शैली दी। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन जनता की आवाज़ अंततः सबसे ऊंची होती है। तालियां कुछ समय तक अहंकार का साथ दे सकती हैं, पर भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही से ही जीता जाता है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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