सन्त समीर
दिल्ली। मुद्दा ठीक है, पर आन्दोलन ग़लत है। मुझे लगता है कि अब तक के सारे आन्दोलनों में सबसे बेईमान आन्दोलन यही था या है। यह उनका आन्दोलन न के बराबर था, जिनके नाम पर किया गया। अतीत के हर आन्दोलन में कोई-न-कोई सुनिश्चित चरित्र आप तलाश सकते हैं, परन्तु इस ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ वाले को आप चरित्र-हीन आन्दोलन कह सकते हैं। कोई अकेला पुलिसवाला दिख जाए तो उसे घेरकर पीटने लगना और शान्त खड़ी पुलिस पर पत्थर चलाना, ताकि वह जवाबी कार्रवाई करे और आन्दोलन के लिए माहौल बनाया जा सके—इसे क्या कहेंगे? मञ्च पर जो चेहरे दिखते रहे, उनमें से कई पुराने परिचित हैं। ये सब अपनी उस तरह की अजीबोग़रीब प्रतिबद्धता पर डटे रहे हैं, जिसे कि मैं महज़ वैचारिक बेईमानी मानता हूँ। इन्हीं जैसों की सङ्गत में रहते हुए आज की तारीख़ में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि विचारधारा की ज़िद बहुत हद तक मानसिक बीमारी का ही एक रूप है।
अन्ना आन्दोलन और इस आन्दोलन के बीच बुनियादी फ़र्क़ यह था कि अन्ना का अपना कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं था, जबकि इस आन्दोलन में जितने भी चेहरे मञ्च पर दिखे, उनमें से एक भी ऐसा नहीं था, जिसका कि कोई राजनीतिक स्वार्थ न रहा हो।
वैसे कुछ लोगों को उम्मीद थी कि मैं भी वहाँ पहुँचूँगा। सोनम वाङ्चुग कुछ समझदारी से आए होते तो हमारे जैसे लोग हौसला बढ़ाने पहुँच ही सकते थे, लेकिन पहले दिन ही ध्यान दिया तो जन्तर-मन्तर तक जाने की ज़हमत उठाना बेमतलब लगा। अलबत्ता, कुछ किन्तु-परन्तु के बावजूद केन-बेतवा के मसले पर कल तक चले आदिवासियों के ‘चिता आन्दोलन’ का मैं समर्थन करता हूँ।
कॉक्रोच जनता पार्टी जैसी गतिविधियों का उभरना स्वाभाविक है, क्योंकि जब सत्ता की संवेदना सही तरीक़े से सही जगह तक नहीं पहुँचेगी तो आज नहीं तो कल, ग़ुस्सा किसी भी रूप में फूटेगा। आक्रोशित भावनाओं की लगाम ग़लत लोगों के हाथों में पहुँचेगी तो कुछ अराजकताएँ भी दिखेंगी ही। इन्हीं अराजकताओं के कारण सत्ता को भी दमन का मौक़ा मिलता है और वह भूल जाती है कि समस्या सचमुच कुछ है। वैसे एक सच यह भी है कि पेपर लीक के मामले में जितनी तेज़ी से इस सरकार ने कार्रवाई की थी, उतनी तेज़ी से पहले की किसी सरकार ने कभी नहीं की थी।
जो भी हो, अद्भुत है कि मुद्दा कुछ है, पर मञ्च से चिन्ता यह जताई जा रही है कि मोदी को कैसे हटाया जाए। गान्धी का नाम लेकर अनशन चल रहा है, लेकिन वक्ता एक भी ऐसा नहीं दिखा, जिसके मुँह से नफ़रत के इतर बोल निकले हों। गान्धी आत्मशुद्धि के लिए, लोगों की चेतना जगाने के लिए अनशन पर बैठते थे और यहाँ महज़ एक मन्त्री को हटाने के लिए अनशन शुरू किया गया। सहज प्रश्न उठता है कि एक नहीं, दो-चार मन्त्री भी हट जाएँ तो क्या व्यवस्था ठीक हो जाएगी? और ग़ज़ब कि आन्दोलन एक मन्त्री हटाने के लिए, पर मञ्च पर कई नारों के बीच एक नारा यह भी कि ‘नाम रहेगा अल्लाह का’।
इस आन्दोलन की बेईमानी यही है कि यह एक मुद्दे के बहाने हिन्दुत्व के पुनर्जागरण को किसी भी तरह से रोकने का आन्दोलन बनता गया।
मुझे ऐसा लगता है कि मज़बूत मुद्दा नहीं मिला तो एक ख़त्म होते मुद्दे को जैसे-तैसे पकड़ा गया और जन्तर-मन्तर पर आकर ख़ुद ही उस मुद्दे को किनारे करके कुछ और एजेण्डा चलाया जाने लगा। युवाओं को जोड़ने के लिए युवाओं वाला मुद्दा तो चाहिए ही था, लेकिन इतने पर भी वे युवा बहुत कम दिख रहे थे, जिनका पेपर लीक से लेना-देना था।
आन्दोलन की सबसे बड़ी त्रासदी यही रही कि पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे प्रश्न धीरे-धीरे पीछे चले गए और मञ्च पर राजनीतिक नारे, नफ़रती भाषण और सत्ता परिवर्तन की आकाङ्क्षा आगे आती चली गई। जब आन्दोलन का चेहरा उसके मुद्दे से बड़ा हो जाए, तब जनता यह पूछने लगती है कि लड़ाई वास्तव में किस बात की है।
किसी भी छात्र आन्दोलन की सबसे बड़ी शक्ति स्वयं छात्र होते हैं। लेकिन जब आन्दोलन की पहचान प्रभावित युवाओं से अधिक उसके नेताओं और राजनीतिक प्रतीकों से बनने लगे, तब उसके उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है।
बहरहाल, आन्दोलन एजेण्डे के लिए हो या किसी और निहित स्वार्थ के लिए, यदि सत्ता उसे अनदेखा करती है, तो यह भी किसी बुरे आन्दोलन से कम बुरा नहीं है। आप स्वयं को यदि जनता के सेवक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और सेवक के बजाय मालिक के तेवर दिखा रहे हैं, तो यह आमजन के साथ एक तरह का छल है। समय निकल जाने के बाद दिखने वाली विनम्रता भी बेमानी ही लगती है।
ऐसा लगता है कि भाजपा के लोगों ने आन्दोलनों से निपटना शायद शुतुरमुर्गों से सीखा है। जैसे ही कोई आन्दोलन शुरू होता है, वैसे ही ये लोग सिर रेत में घुसा लेते हैं। इन्हें लगता है कि एक दिन लोग थक जाएँगे और आन्दोलन अपनी मौत मर जाएगा। अनसुना करने की इस प्रवृत्ति से एक-दो बार इन्हें प्रत्यक्ष फ़ायदा होता दिखा है, तो शायद इसी नाते इस तरीक़े को इन्होंने रामबाण मान लिया है। लेकिन सत्ता मिलती गई, तो यह अंदाज़ा ही नहीं लगा पा रहे हैं कि इसका परोक्ष घाटा कितना बड़ा हुआ है।
याद रखिए, राम की ज़रूरत इस देश को है; हज़ार साल से भयभीत और दबी-सहमी मानसिकता में जी रहे हिन्दू मन को खुलकर व्यक्त होने का वातावरण भी आपने बनाया, इसकी भी ज़रूरत इस देश को थी; परन्तु यदि आपको लगता है कि राम नाम की आड़ हर कहीं काम आ जाएगी तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। अहङ्कार और अकड़ राम-विरोधी तत्त्व हैं। इन्हें आप जैसे-जैसे अपने चरित्र में जगह देंगे, वैसे-वैसे राम आपसे दूर होते चले जाएँगे। सनातन राम क्षणभङ्गुर मन्दिर के क्षणिक विषय नहीं हो सकते हैं, अन्ततः राम काम में बसते हैं। यह भी पहचानिए कि राम सनातन संस्कृति की मूलधारा में हैं, लेकिन रोटी साँस ले रहे हर आदमी की पहली अनिवार्यता है। बेरोज़गारी पर गहन विचार की ज़रूरत है। किसानों के मुद्दों पर चलताऊ समाधान से बात लम्बे समय तक नहीं बनेगी।
भाजपा के लोगों से यही कहूँगा कि कई मुद्दे आपने शानदार ढङ्ग से हल किए हैं, जिनके लिए वर्षों तक याद किए जाएँगे, परन्तु किसानों और नौजवानों के मुद्दों पर आप हमेशा चलताऊ तरीक़े आज़माकर सन्तुष्ट हो लेते हैं। समय के साथ यह आप पर भारी पड़ेगा।
और अन्त में, इतना भर और कहूँगा कि जिन समस्याओं से इधर-उधर करके आप बचना चाहते हैं, वे कठिन क़तई नहीं हैं।



