अनीता
दिल्ली : भारतीय लोकतंत्र की सबसे पवित्र संस्था संसद तक हजारों प्रदर्शनकारियों का पहुंच जाना मात्र एक घटना नहीं, बल्कि गहरी चिंता का विषय है। जब NEET पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर छात्र, अभिभावक और युवा सड़कों पर उतर आए, तो उनकी आवाज़ संसद की सीढ़ियों तक गूंज गई। सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद की नाक तक कैसे पहुंच गए? क्या यह सुरक्षा एजेंसियों की चूक थी या सरकार का जानबूझकर अपनाया गया ढुलमुल रवैया?
सरकार और खुफिया एजेंसियों के पास अगर पहले से कोई इनपुट नहीं था, तो यह और भी गंभीर है। एक ऐसा मुद्दा जो देश के हर बच्चे और माता-पिता से जुड़ा है, उसकी गंभीरता को समझने में कहीं कोई कमी तो नहीं रही? लाखों युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने के सपने देखते हैं। उनके माता-पिता घर-खेत बेचकर, कर्ज लेकर उन्हें पढ़ाते हैं। ऐसे में पेपर लीक न केवल उनकी मेहनत पर पानी फेरता है, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा भी तोड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे पर जितना कम राजनीतिक खेल खेला जाए, उतना बेहतर होता।
दुर्भाग्य से मीडिया कवरेज और घटनाक्रम यह इशारा कर रहे हैं कि इस बार कोई मीडिया मैनेजमेंट नहीं किया गया। ठीक वैसे ही जैसे राम मंदिर चंदा संग्रह में कोई गड़बड़ी सामने आई तो उस पर भी चुप्पी साध ली गई। समाधान की बजाय मुद्दा लटकता रहा और अब “कॉकरोच की दुकान” फिर सज रही है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और गृह मंत्री अमित शाह की साढ़े चार घंटे लंबी बैठक में पीयूष गोयल और किरन रिजिजू भी शामिल हुए, लेकिन न तो कोई ठोस निष्कर्ष आया और न ही आने वाले दिनों की रणनीति स्पष्ट हुई। ऑफ द रिकॉर्ड जो चर्चाएं चल रही हैं, वे निपेन्द्र मिश्रा वाले एपिसोड की याद दिलाती हैं। कौन किसके साथ खड़ा है, यह राजनीतिक गणित अलग है, लेकिन जनता का मुद्दा अलग है।
NEET पेपर लीक अब केवल एक परीक्षा का सवाल नहीं रहा। यह लाखों परिवारों की आशाओं और भविष्य का सवाल है। प्रदर्शनकारियों को संसद तक पहुंचने देने को अगर “प्रेशर पॉलिटिक्स” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पुलिस की लाइन हाज़िर व्यवस्था को सजा की जगह “सेफ मोड” माना जाता है। इंस्पेक्टर, दरोगा या सिपाही कुछ महीने आराम से निकाल लेते हैं और फिर बेहतर पोस्टिंग पा लेते हैं। इस बार भी यही रणनीति अपनाई गई तो मामला शांत हो सकता था। रिसफ़्लिंग के बहाने लाइन हाज़िर करा दिया जाता, संगठन और कैबिनेट दोनों के दरवाजे खुले रहते।
समय आ गया है कि सरकार इस मुद्दे को केवल नियंत्रण की नजर से न देखे। संवेदना, पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई जरूरी है। अगर संसद की सुरक्षा और प्रतिष्ठा तक चुनौती पहुंच रही है, तो इसका मतलब है कि जड़ में कुछ गड़बड़ है। राजनीतिक लाभ की बजाय छात्रों के भविष्य को प्राथमिकता दी जाए। अन्यथा यह आग सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी जला देगी।



