11वें मनु के कन्धे पर बन्दूक रखकर हिन्दू धर्म पर हमला करने वाले

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रंगनाथ

दिल्ली। मनुस्मृति आम्बेडकरवादियों द्वारा पढ़ा जाने वाला एक प्रमुख ग्रन्थ है। मनु कम्युनिस्ट दलों द्वारा नारों में याद किए जाने वाले इतिहास पुरुष हैं। मनुस्मृति हिन्दुओं का धार्मिक आधार ग्रन्थ नहीं है। वेद-उपनिषद-पुराण-महाभारत-रामायण में इस स्मृति का जिक्र नहीं मिलता है। न ही वैष्णव-शैव-शाक्त परंपरा के आधार ग्रन्थों में इसका जिक्र मिलता है। आदि शंकराचार्य ने भी इस पर कोई टीका नहीं लिखी है। इसकी पहली टीका 10वीं सदी के आसपास की मानी जाती है यानी वेदों की रचना के करीब तीन हजार साल बाद।

इस ग्रन्थ को जब हिन्दुओं पर ऊपर से थोपा जाता है तो कुछ भावुक या नादान हिन्दू इसकी रक्षा में कूद भी पड़ते हैं। इसकी एक ही वजह है कि पिछले दो सौ सालों में पहले ब्रिटिश मिशनरियों ने और फिर उनके द्वारा प्रमोटेड एंटी-हिन्दू विचारधाराओं ने मनुस्मृति का झूठ इतनी बार बोला कि हिन्दू समाज का एक वर्ग उसे बिना सोचे समझे सच के रूप में स्वीकार कर चुका है।

इस देश में केवल दो राजनीतिक धाराएँ हैं जो आज मनुस्मृति को याद करती हैं। एक मार्क्सवादी और दूसरे आम्बेडकरवादी। मनुस्मृति देश के किसी कोने में हिन्दुओं का सेंट्रल टेक्स्ट नहीं रहा है। स्मृति वाले मनु के पैदा होने से हजारों साल पहले पैदा हुआ आदि मनु को हिन्दू पहला मानव मानते हैं। उन मनु को भारतीय धर्मग्रन्थों में कई बार आदर्श के तौर पर याद किया गया है। एंटी-हिन्दू पॉलेमिक करने वाले जानबूझकर दोनों मनु को मिला देते हैं। हिन्दू धर्मशास्त्रों में एक दर्जन से ज्यादा मनु का उल्लेख मिलता है। हर मनु को स्मृति वाला मनु बताना मूलतः दूध में जहर मिलाकर पिलाने वाली चालबाजी है।

गुलाम बनने से पहले तक भारत ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान का देश रहा है। वैदिक काल, उपनिषद काल, इतिहास काल, पुराण काल, धर्मशास्त्र काल, स्मृति काल इत्यादि काल रहे हैं न कि एक दिन या साल। हिन्दू सभ्यता हजारों साल पुरानी है और उसमें सौ-सौ, दो-दो सौ साल तक खास तरह के ग्रन्थ लेखन का चलन चलता रहता है। जिस दौर में स्मृतियाँ लिखने का चलन शुरू हुआ उस दौर के कई विद्वानों ने स्मृतियाँ लिखीं। ये स्मृतियाँ वैसी ही थीं जैसी आज के प्रोफेसरों की किताबें। किसी प्रोफेसर ने किसी विषय पर अपनी राय लिख दी है इसका यह मतलब नहीं है कि उस प्रोफेसर के धर्म के लोगों ने उसे अपना सेंट्रल टेक्सट बना लिया है। यही कारण है कि आज भी 130 से ज्यादा स्मृतियों का जिक्र मिलता है जिनमें मनु-11, याज्ञवल्क्य, पराशर, नारद इत्यादि की स्मृति पर बाद में भी चर्चा होती रही।
मनु-11 इसलिए लिखा है ताकि लोगों को याद रहे कि स्मृति वाले मनु से पहले कम से कम 10 मनु हो चुके थे। मनु-11 को लेकर भी विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि उनकी जो स्मृति मिलती है उसमें काफी हिस्सा प्रक्षिप्त है। लोकप्रिय ग्रन्थों का प्रक्षिप्त तैयार कर देना तब भी चलता था। उसी तरह जैसे आज वास्तविक घटनाओं पर बनी फिल्मों में पात्रों के जाति और धर्म बदल दिए जाते हैं। कई काल्पनिक दृश्य डाल दिए जाते हैं। इतना ही नहीं किताबों पर बनी फिल्मों में भी मनमाने जोड़घटाव कर दिए जाते हैं।

आप ध्यान दें तो देख सकते हैं कि भारतीय ग्रन्थों में जिस हिस्सों पर ज्यादा विवाद है, उन्हें कई विदेशी विद्वानों ने भी बाद में जोड़ा गया माना है। जैसे कि मूल रामायण भगवान राम के अयोध्या वापसी पर समाप्त हो जाती है। फिर उसमें उत्तर-काण्ड (Post Chapter) काफी समय बाद जोड़ा गया और भगवान राम से जुड़े ज्यादातर प्रमादों का आधार वही उत्तर-काण्ड है। इस विवादित अध्याय को जोड़ने वाले इतनी सत्यवादिता दिखायी कि चैप्टर का नाम पोस्ट चैप्टर रखा ताकि लोगों को पता चले कि यह बाद में जोड़ा गया है। मगर आज के विद्वान इतनी भी ईमानदारी नहीं दिखाते। उसी तरह मनु-11 के स्मृति को लेकर भी विद्वानों के बीच मतभेद है कि इसके विवादित अंशो की विचारात्मक-भावनात्मक-भाषाई संगति अन्य प्रशंसित अंशों से नहीं मिलती है।

अब यह लगभग निर्विवाद तथ्य है कि मनुस्मृति को भारत में स्थापित करने का काम कोलकाता हाईकोर्ट से शुरू हुआ जिसकी जड़ में ईसाई माइंडसेट है। ईसाई जजों को हिन्दुओं की बाइबिल चाहिए थी। उन्होंने सबसे विद्वान जानकर कुछ पण्डितों से सम्पर्क किया। उन पण्डितों ने वह किताब पकड़ा दी जिसमें पण्डितों को सर्वोच्च बताया गया था। ईसाई शाशकों ने मनु-11 की किताब को हिन्दू-लॉ कहना शुरू कर दिया जबकि हाल-फिलहाल तक हिन्दू समाजों में ऐसे फैसले पंचायत या खाप करती रही है न कि कोई किताब। ऐसा भी नहीं है कि एक जाति की पंचायत दूसरी जाति के फैसले करती रही है। जाति के मामले जाति की पंचायतें तय करती रही हैं और परस्पर सम्बन्ध रखने वाले मामले सामुदायिक पंचायतों में तय होते थे।

ईसाइयों शासकों के लिए यह समझना मुश्किल था कि वेद-उपनिषद-इतिहास(रामायण-महाभारत) इत्यादि पीनल कोड और सिविल कोड नहीं हैं। सही  मायनों में ये सारे धर्म हिन्दुओं के धर्म के भी आधार नहीं हैं क्योंकि हिन्दू धर्म अनुपालन (प्रैक्टिस) से आगे बढ़ता है, उपदेश से नहीं। ये सारे ग्रन्थ हिन्दू धर्म के सबसे शिक्षित वर्ग की देन हैं मगर आम हिन्दू जीवन में एक बार भी वेद-उपनिषद-रामायण-महाभारत के दर्शन किए बिना हिन्दू बना रहता है। इन ग्रन्थों की एक भी लाइन जाने बिना भी वह दैनिक जीवन में धार्मिक हिन्दू बना रह सकता है। आप कह सकते हैं कि हिन्दू धर्म वैयक्तिकता का चरम है।

उत्तर भारत में सबसे प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ रामचरितमानस है जो 15वीं सदी का है। आगे जाकर हो सकता है कि कोई अन्य ग्रन्थ हिन्दुओं के बीच लोकप्रिय हो जाए।  बाइबिल ईसाई रिलीजन का सेंट्रल टेक्स्ट है। बाइबिल के गलत साबित होते ही रिलीजन का आधार खिसक जाता है। यही कारण है कि यूरोपीय प्रबोधन काल में बाइबिल की जमकर आलोचना हुई। कुछ ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए ईसाई जजों को मनुस्मृति पकड़ायी और उसके बाद इस टेक्स्ट को अकादमिक जगत हिन्दू-लॉ के रूप में स्थापित करने के बाद इसे इस तरह प्रस्तुत किया जाने लगा जैसे यह हिन्दुओं का बाइबिल हो! फिर इसका खण्डन-मण्डन शुरू हुआ।

आधुनिक समय में मनु-11 की स्मृति को जिन्दा रखने का काम डॉ. आम्बेडकर ने किया। डॉ. आम्बेडकर इंग्लिश मीडियम में पढ़े लिखे थे और उनका हिन्दू धर्म का ज्यादातर ज्ञान इंग्लिश अनुवादों पर आधारित था। डॉ. आम्बेडकर ने मनुस्मृति को ब्राह्मण-वर्चस्व के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया और उसके बाद से मनु-11 की स्मृति मूलतः आम्बेडकरवादियों द्वारा याद किया जाने वाला ग्रन्थ बनकर रह गयी। आम हिन्दू का इस ग्रन्थ से कोई लेना-देना नहीं है। वह न इसे पढ़ता है और न ही इसे घर में रखता है और न पूजता है। इसके कुछ सकारात्मक श्लोक विमर्श या डिबेट प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल होते हैं। उसी तरह जैसे कई यूरोपीय लेखकों के कोटेशन इस्तेमाल होते हैं।

हिन्दू “मनु-11-वादी” होते हैं यह लांछन है जो हिन्दुओं पर थोपा जाता है। राहुल गांधी ने जिस तरह मनु-11-स्मृति का प्रयोग किया उससे केवल इतना पता चलता है कि उनके सलाहकारों में इस समय आम्बेडकरवादी और मार्क्सवादी हावी हैं। राहुल गांधी के समर्थक बुद्धिजीवी कहेंगे कि राहुल जी ने हिन्दुओं को नहीं बल्कि हिन्दुत्ववादियों को मनु-11-वादी कहा है! मगर यही बुद्धिजीवी यह नहीं बताएँगे कि महज हिन्दू होने के कारण गांधी-नेहरू-इंदिरा को मनु-11-वादी कहा जा चुका है और उन्हीं आम्बेडकरवादियों और मार्क्सवादियों ने कहा है जो आज राहुल जी के सलाहकार बने हुए हैं।

राहुल जी के सलाहकार यह भी भूल गये कि जिन कोटेशन को उन्होंने स्क्रीन पर दिखाया उनके जैसे कोटेशन दूसरे रिलीजने के सेंट्रल टेक्स्ट में पाए जाते हैं जिनकी आलोचना के बाद उन रिलीजन की जड़ उखड़ जाएगी। चूँकि मेरे फेसबुक में राहुल जी के प्रशंसक काफी संख्या में हैं, इसलिए ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा। उनकी अपनी राजनीति है, वह जैसे चाहे करें। मेरा ध्येय मनु-11 के बारे में कुछ तथ्य रखने थे क्योंकि कई महान संपादक भी आदि मनु और 11वें मनु के बीच फर्क किए बिना भी मिलियन व्यूज ला रहे हैं।

— सोशल मीडिया से साभार

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