दिल्ली। एक जमाने में पत्रकारिता खबर, संपादकीय और जिम्मेदारी का पेशा थी। आज वही पेशा कई बार सोशल मीडिया पर दिन-रात लिखने का नया रोजगार बन गया है। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव इसी बदलाव के उदाहरण हैं। सवाल यह नहीं कि सोशल मीडिया मंच है या नहीं। सवाल यह है कि मंच पर शिक्षक बनकर बैठना और पूरे समाज को मंदबुद्धि कक्षा मान लेना पत्रकारिता है या नैरेटिव-निर्माण।
राहुल देव सोशल मीडिया पर स्कूल के उस मास्टर की तरह लिखते हैं, जिसे लगता है कि कक्षा के सारे बच्चे मंदबुद्धि हैं और वह जैसा झूठ-सच पढ़ा देगा, सब ‘यस सर’ कर देंगे। सोशल मीडिया पर यह चाल अच्छे-अच्छों की नहीं चली। अखिलेश चौधरी की शालीन, पर नुकीली टिप्पणी उसी चाल की सीमा दिखाती है।
कक्षा का मास्टर और एकतरफा नैरेटिव
राहुल देव लिखते हैं, “दरअसल आप जैसे हिंदूवादियों को समस्या अपने भीतर की कमजोरियों से है ही नहीं। उनका सामना करने की हिम्मत और बुद्धि भी नहीं है। सारा ध्यान दूसरे पर है।” आगे वे कहते हैं कि संविधान निर्माताओं ने अल्पसंख्यकों के लिए अलग प्रावधान किए, क्योंकि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की स्थितियाँ अलग होती हैं। फिर आरोप यह है कि हिंदू अपनी संस्कृति की वैश्विकता और सहिष्णुता के गीत “रट्टू तोते की तरह” गाते हैं, विश्वगुरु बनने की “मूर्खतापूर्ण” बातें करते हैं, और अल्पसंख्यकों के साथ “अक्षम्य असहिष्णु, हिंसक, अपमानजनक” व्यवहार करते हैं।
सबसे भारी वाक्य यह है: “99% संघी या संघ-प्रभावित हिंदू अपने प्रमुखतम ग्रंथ भी नहीं पढ़ते इसलिए केवल मुस्लिम-घृणा को पोसते-बढ़ाते रहते हैं।” और चेतावनी-“वे भारत को दूसरे विभाजन और गृहयुद्ध की ओर धकेल रहे हैं।”
यह लेखन पत्रकारिता कम, नैतिक डांट ज्यादा है। “99 प्रतिशत”, “रट्टू तोते”, “मूर्खतापूर्ण”, “जगहँसाई”, “हिंदूवादी”, “संघी”—ये शब्द संवाद नहीं, पूरे समुदाय को एक लाठी से हाँकने का औजार हैं। जो व्यक्ति सम्यक् और सहिष्णु दृष्टि की बात करे, वह पहले अपनी भाषा में सम्यकता दिखाए। दूसरों के दोष देखने, उन्हें कोसने और आहत करने को राहुल देव सम्यक् दृष्टि नहीं मानते; लेकिन स्वयं वही करते हैं।

आंतरिक कमजोरियों से मुँह मोड़ना गलत हो सकता है। लेकिन सांस्कृतिक चिंता, इतिहास की स्मृति और समान कानून की माँग को सिर्फ “पड़ोसी के झगड़े सुलझाने” कह देना भी अधूरी बात है। स्वामी विवेकानंद से आधुनिक सुधारकों तक आंतरिक सुधार और सांस्कृतिक जागरूकता साथ- साथ चलते रहे। दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बताना राहुल देव का निजी निष्कर्ष है, इतिहास का अंतिम सत्य नहीं।
अखिलेश के सवाल और असली सम्यक् दृष्टि
पेशे से शिक्षक सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश चौधरी “आदरणीय राहुल देव जी, सप्रेम प्रणाम” से शुरू करते हैं। सम्मान बनाए रखकर वे वही प्रश्न पूछते हैं जो एकतरफा लेखन छिपा देता है।
पहला-क्या स्वस्थ विमर्श में पूरे समाज या संगठन को “99 प्रतिशत”, “रट्टू तोते” और “मूर्खतापूर्ण” कहना तर्कसंगत है? दूसरा-क्या हिंदू समाज की ऐतिहासिक चिंताओं पर चर्चा केवल दूसरों के दोष देखना है? तीसरा-संविधान ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी, यह मान्य है; पर जब बहुसंख्यक समाज समान शासन और तुष्टिकरण-मुक्त पंथनिरपेक्षता माँगता है, तो उसे असहिष्णु और हिंसक करार देना कितना उचित है?
चौथा प्रश्न सबसे व्यावहारिक है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को सीधे “गृहयुद्ध” और “दूसरे विभाजन” की ओर धकेलने की आशंका समाधान है, या डर और अलगाव बढ़ाती है? पाँचवाँ-यदि सम्यक् दृष्टि बंधुता और सह-अस्तित्व है, तो क्या यह दायित्व सभी समुदायों पर समान नहीं होना चाहिए?
अंत में भाषा का प्रश्न आता है। “हिंदू” मूल संज्ञा है। उसके पीछे “वादी” लगाकर उसे संकीर्ण राजनीतिक ‘इज्म’ बना देना भाषाई न्याय नहीं, लांछन का औजार है। हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवादी को एक धरातल पर रखकर खारिज करना संवाद नहीं, वर्गीकरण है। ‘संघी’, ‘हिंदूवादी’, ‘रट्टू तोते’ जैसे संकीर्ण लेबल विमर्श खोलते नहीं, वैचारिक खाई और गहरा करते हैं।
यहीं राहुल देव की शिकायत उल्टी पड़ती है। वे कहते हैं कि घृणा भारत को विभाजन की ओर धकेल रही है। अखिलेश पूछते हैं-क्या स्वयं का सामान्यीकरण, अपमान और गृहयुद्ध का डर उसी दिशा में ईंधन नहीं डालता?
पत्रकारिता का पुराना फॉर्मूला था-एक नैरेटिव बदलो, पुष्पम-पत्रम मिल जाए। अब पाठक ‘यस सर’ नहीं कहता। वह पूछता है। अखिलेश चौधरी का लेखन इसी पूछने की संस्कृति है-विनम्र, सटीक और दोनों ओर दायित्व माँगने वाला। राहुल देव का लेखन उपदेश की पुरानी आदत है, जिसमें कक्षा का मास्टर अपनी बात को अंतिम सत्य मान बैठता है।
सम्यक् दृष्टि का अर्थ एक पक्ष को कोसना और दूसरे को संरक्षित घोषित करना नहीं। उसका अर्थ यह है कि भाषा गरिमा रखे, सामान्यीकरण से बचे, आंतरिक सुधार और सजगता को विरोधी न बताए, और बंधुता का पाठ सभी समुदायों को एक जैसा पढ़ाए। इस कसौटी पर अखिलेश के प्रश्न राहुल देव के निबंध से अधिक पत्रकारीय और अधिक लोकतांत्रिक हैं।



