प्रणय विक्रम सिंह
दिल्ली । अक्टूबर 1990। अयोध्या की वह सुबह। सरयू के तट पर उगता सूर्य। रामनाम से गूंजती गलियां। हाथों में भगवा ध्वज। हृदय में टूटे मंदिर की अथाह पीड़ा। और आंखों में रामलला के पुनः विराजने का स्वप्न।
यह पीड़ा उस मंदिर के ध्वंस की थी, जिसकी स्मृति सहस्त्राब्दियों से हिंदू समाज के हृदय में जीवित थी। समय बदला। राजसत्ताएं बदलीं। पीढ़ियां गुजर गईं। किंतु अपने आराध्य को जन्मभूमि पर भव्य मंदिर में विराजमान देखने की अभिलाषा नहीं बदली। पूर्वजों की यही अधूरी अभिलाषा अगली पीढ़ियों का संकल्प बनती रही।
इसी संकल्प को लेकर हजारों रामभक्त उस दिन अयोध्या पहुंचे थे। कोई गांव से आया था, कोई सैकड़ों मील दूर से। किसी ने मां के चरण छूकर विदा ली थी। किसी ने बच्चों से शीघ्र लौटने का वचन दिया था। मन में रामलला के दर्शन की उत्कंठा थी। विश्वास था कि जन्मभूमि पर माथा टेककर अपने घर लौटेंगे।
लेकिन रामनगरी की सड़कों पर उस दिन कुछ और ही दृश्य था।
पुलिस का पहरा था। रास्ते बंद थे। बैरिकेडिंग थी। वातावरण में तनाव था। इसी बीच गोलियां चलीं। भगदड़ मची। लोग घायल हुए। कुछ रामभक्तों ने अपने प्राण गंवा दिए।
तुष्टीकरण के मवाद में डूबती-उतराती मुलायम सिंह की रामद्रोही सरकार ने रामभक्तों पर अंधाधुंध गोलियां चलवाईं। जिन हाथों में भगवा ध्वज था। जिन अधरों पर रामनाम था और जिन आंखों में अपने आराध्य के भव्य मंदिर का स्वप्न था, वे गोलियों का निशाना बने। सत्ता के उस कठोर निर्णय ने कितनी ही माताओं की गोद सूनी कर दी। कितने ही परिवारों से उनके अपने छीन लिए। रामनगरी की सड़कों पर बहा रक्त उस दिन की त्रासदी और सत्ता की जवाबदेही का ऐसा प्रश्न बन गया, जिसका उत्तर इतिहास आज भी मांगता है।
अयोध्या की पीड़ा यहीं समाप्त नहीं हुई। 2 नवंबर को फिर गोलीबारी हुई। कोलकाता के राम और शरद कोठारी बंधु भी मारे गए। एक ही घर के दो पुत्र। दो युवा जीवन। दो अधूरे भविष्य। उस परिवार पर क्या बीती होगी, जिसने अपने दोनों बेटों को खो दिया? उस मां की आंखों में कितनी प्रतीक्षा शेष रह गई होगी? उस पिता ने अपने हृदय का दुःख किससे कहा होगा?
यह केवल कुछ व्यक्तियों की मृत्यु नहीं थी। यह उन परिवारों की ऐसी त्रासदी थी, जिसका दुःख समय के साथ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक के रूप में जब मैं उस कालखंड का स्मरण करता हूं, तो मन उन अनगिनत रामभक्तों के प्रति श्रद्धा से भर उठता है, जिन्होंने श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन को अपने जीवन का संकल्प बनाया था।
उनके लिए राममंदिर केवल पत्थरों से निर्मित एक भवन नहीं था। वह अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों, पूर्वजों की आस्था और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक था। इसी भावना ने संतों को साधना से जनजागरण तक पहुंचाया। इसी ने स्वयंसेवकों को गांव गांव जाने की प्रेरणा दी। इसी ने असंख्य परिवारों को लंबे संघर्ष से जोड़े रखा।
किसी ने अपना समय दिया। किसी ने श्रम। किसी ने सुख सुविधाएं त्यागीं। और कुछ ऐसे भी थे, जो रामलला के मंदिर का स्वप्न हृदय में लेकर गए, लेकिन अपने घर वापस नहीं लौट सके।
उनकी प्रतीक्षा फिर भी व्यर्थ नहीं गई।
वर्षों का संघर्ष आगे बढ़ा। न्यायालय में लंबी सुनवाई हुई। 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय आया। श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
फिर आया 22 जनवरी 2024 का वह पावन दिन।
अयोध्या में शंखनाद हुआ। वेदमंत्र गूंजे। रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए। करोड़ों श्रद्धालुओं की आंखें भर आईं। जिन पीढ़ियों ने मंदिर का स्वप्न देखा था, उनकी प्रतीक्षा मानो उस एक क्षण में साकार हो उठी।
लेकिन उस उल्लास में एक मौन पीड़ा भी थी।
काश, वे रामभक्त भी उस दिन उपस्थित होते। काश, कोठारी बंधु भी अपने आराध्य के दर्शन कर पाते। काश, जिन माताओं ने अपने पुत्र खोए, वे आज उनके साथ रामलला के सम्मुख खड़ी होतीं।
यही इतिहास की सबसे गहरी वेदना है। कुछ लोग जिस स्वप्न के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं, उसे साकार होते देखने के लिए जीवित नहीं रह पाते।
आज अयोध्या में श्रीरामलला के भव्य मंदिर का शिखर आकाश को स्पर्श करता दिखाई देता है। सरयू के तट पर दीप जगमगाते हैं। रामनाम की ध्वनि वातावरण को भक्तिमय बनाती है। किंतु इस दिव्य आभा के पीछे संघर्ष की वे स्मृतियां भी हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
एक स्वयंसेवक के लिए यह स्मृति केवल अतीत की पीड़ा नहीं, उन रामभक्तों के प्रति कृतज्ञता का भाव भी है, जिन्होंने अपनी आंखों में मंदिर का स्वप्न संजोया, किंतु उसे साकार होते नहीं देख सके।
इस दीपावली जब आप अपने घर के आंगन में दीप जलाएं, तो एक दीप उन रामभक्तों की स्मृति में भी अवश्य जलाएं। उन बेटों के लिए, जो अपनी माताओं के पास लौटकर नहीं आए। उन भाइयों के लिए, जिनकी राह देखते हुए बहनों की आंखें पथरा गईं। उन बलिदानियों के लिए, जिन्होंने रामलला के भव्य मंदिर का स्वप्न अपनी आंखों में संजोए अंतिम सांस ली।
उस दीप की लौ में केवल प्रकाश नहीं होगा। सदियों के संघर्ष की स्मृति होगी। बलिदानियों के प्रति हमारी कृतज्ञता होगी। और यह संकल्प भी कि उनकी आस्था, उनका त्याग और उनका समर्पण कभी विस्मृत नहीं होगा।
क्योंकि रामलला के मंदिर में आज जो दीप जगमगा रहे हैं, उनकी आभा में उन रामभक्तों की स्मृतियां भी समाई हैं, जो इस दीपावली हमारे बीच नहीं हैं।
उन सभी दिवंगत रामभक्तों को कोटिशः नमन।



