आग से खेल रही कर्नाटक सरकार! नौकरी स्थानीय को, तो बाकी भारतीय क्या पराये हैं?

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बेंगलुरु : बेंगलुरु आज आईटी क्षेत्र में प्रगति के शिखर पर है। इसमें पूरे भारत से आए प्रतिभाशाली युवाओं का बड़ा योगदान है, सिर्फ स्थानीय लोगों का नहीं।
जरा कल्पना कीजिए। बिहार का एक होनहार इंजीनियर बेंगलुरु की आईटी कंपनी में नौकरी मांगने पहुंचता है। उसके पास डिग्री, हुनर और काम करने का जज्बा है। लेकिन इंटरव्यू में अचानक सवाल उठता है, “आप कर्नाटक से हैं?”
बस, यहीं काबिलियत की परीक्षा खत्म और जन्मस्थान की जांच शुरू! डिग्री पीछे छूट जाती है, पहचान आगे निकल आती है। नौकरी की मंडी में अब हुनर से ज्यादा जन्मभूमि का भाव पूछा जा रहा है।
कर्नाटक में निजी कंपनियों, खासकर आईटी क्षेत्र में, स्थानीय युवाओं को तरजीह देने की मांग ने पुरानी बहस फिर सुलगा दी है। स्थानीय बेरोजगारों की चिंता जायज है। लेकिन क्या दूसरे राज्यों के नागरिक पराये हैं? क्या भारत एक देश सिर्फ तब तक है, जब तक कोई नौकरी मांगने नहीं निकलता?
‘भूमिपुत्र’ सिद्धांत का तर्क सीधा है। नौकरियों पर पहला हक स्थानीय लोगों का हो। दूसरे राज्यों से आए लोग कितने भी योग्य हों, उन्हें पीछे खड़ा रहना चाहिए।
चुनावी मौसम में यह नारा खूब बिकता है। नेताओं को तालियां मिलती हैं, भाषणों में जोश आता है और बेरोजगारी का सुविधाजनक दुश्मन भी मिल जाता है।
लेकिन ठहरिए! यह सामाजिक न्याय नहीं, कल्याण के मुखौटे में छिपा क्षेत्रवाद है।
बिहार का गरीब नौजवान भी उतना ही भारतीय है, जितना कर्नाटक का युवक। उत्तर प्रदेश के इंजीनियर के अधिकार बेंगलुरु में पैदा हुए इंजीनियर से कम नहीं हैं। संविधान हर नागरिक को देश में घूमने और बसने की आजादी देता है, हालांकि कुछ कानूनी सीमाएं भी हैं।
राज्य सरकारें शिक्षा सुधार सकती हैं, प्रशिक्षण दे सकती हैं और पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ा सकती हैं। कंपनियों में भेदभाव की शिकायतों की जांच भी होनी चाहिए। लेकिन जन्मस्थान को नौकरी की अनिवार्य शर्त बनाना गंभीर संवैधानिक और आर्थिक सवाल खड़े करता है।
भारत पहले भी इस रास्ते पर चल चुका है। नतीजे बहुत सुखद नहीं रहे।
1960 के दशक में मुंबई में शिवसेना ने मराठी लोगों की नौकरियां छिनने के डर को राजनीतिक मुद्दा बनाया। दक्षिण भारत से आए कामगार निशाने पर आए। स्थानीय रोजगार की मांग धीरे-धीरे बाहरी लोगों के खिलाफ मुहिम में बदलने लगी।
2008 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासियों को निशाना बनाया। रेलवे भर्ती, रोजगार और भाषा को लेकर तनाव बढ़ा। क्षेत्रीय अस्मिता का शोर राजनीति में गूंजने लगा।
लेकिन सवाल वही है। क्या इन अभियानों से नौकरियों की बरसात हुई? क्या महाराष्ट्र के बेरोजगार युवाओं की समस्याएं खत्म हो गईं? नहीं! डर बढ़ा, कामगार बंटे और मुंबई की बहुरंगी पहचान को चोट पहुंची।
1969 के तेलंगाना मुल्की आंदोलन में स्थानीय नौकरियों की सुरक्षा की मांग उठी। 1979 से 1985 तक असम आंदोलन में भी प्रवासन, नागरिकता और जनसंख्या में बदलाव को लेकर असंतोष उभरा। परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन इन घटनाओं ने दिखाया कि पहचान की चिंता कैसे बहिष्कार की राजनीति बन सकती है।
सबक साफ है। जब नेता नागरिकों को स्थानीय और बाहरी खांचों में बांटते हैं, तो दीवार सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं रहती।
बेंगलुरु भारत का आईटी केंद्र इसलिए नहीं बना कि हर इंजीनियर से पहले क्षेत्रीय पहचान पत्र मांगा गया। उसकी ताकत देशभर से प्रतिभाओं को आकर्षित करने में रही है।
इंजीनियर, वैज्ञानिक, उद्यमी और कुशल कर्मचारी यहां आए। अवसर मिले, मेहनत हुई और सबने मिलकर आर्थिक कामयाबी की बड़ी कहानी लिखी।
अब सोचिए, यदि योग्य उम्मीदवारों पर क्षेत्रीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़े, तो क्या होगा? कंपनियों को काबिल लोग चाहिए, ऐसे उम्मीदवार नहीं जिनका जन्मस्थान राजनीतिक कसौटी पर खरा उतरता हो।
भर्ती में योग्यता के बजाय क्षेत्रीय पहचान को तरजीह देने का दबाव बढ़ा, तो निवेशक दूसरे राज्यों का रुख कर सकते हैं। कंपनियां विस्तार कहीं और कर सकती हैं। स्थानीय युवा बेरोजगार रह सकते हैं और नौकरियां भी हाथ से निकल सकती हैं।
यह तो वही बात हुई कि रोजगार बचाने निकले थे और रोजगार देने वाली कंपनियों को ही विदा कर दिया!
कर्नाटक सरकार ने 2024 में निजी कंपनियों में स्थानीय उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा था। उद्योग जगत के विरोध के बाद इसे रोक दिया गया। दूसरे राज्यों में भी ऐसे प्रस्ताव सामने आए हैं।
एक राज्य में उठी चिंगारी दूसरे राज्यों में आग लगा सकती है।
स्थानीय युवाओं की बेरोजगारी वास्तविक समस्या है। बहुतों को आधुनिक उद्योगों के अनुरूप प्रशिक्षण नहीं मिलता। कमजोर शिक्षा व्यवस्था और कॉलेजों तथा कंपनियों के बीच तालमेल की कमी भी बड़ी बाधाएं हैं।
समाधान बाहरी लोगों के लिए दरवाजे बंद करना नहीं है। स्थानीय युवाओं को इतना सक्षम बनाइए कि वे मुकाबले में आगे निकलें। बेहतर हुनर दीजिए, नौकरियों पर एकाधिकार नहीं!
राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ झंडा लहराना और बड़े-बड़े नारे लगाना नहीं है। इसका असली मतलब हर भारतीय के सम्मान, अधिकार और आजादी की रक्षा करना है।
मुंबई में काम करने वाली मलयाली नर्स, बेंगलुरु का बिहारी इंजीनियर और दिल्ली का तमिल कामगार कोई बाहरी नहीं है। ये सभी भारत के नागरिक हैं और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं।
भारत की ताकत उसकी विविधता और एकता में है। रोजगार की लड़ाई को क्षेत्रीय नफरत में बदलना देश के भविष्य से खिलवाड़ है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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