हसीना के फरार करीबी हनीफ को मौत की सजा

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नव ठाकुरीया
गुवाहाटी (असम): करीब 17 करोड़ की आबादी वाला दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश अक्सर राजनीतिक उथल-पुथल और हिंसक घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में रहता है। भारत और म्यांमार की सीमाओं से लगे इस मुस्लिम बहुल देश की राजधानी ढाका में आए दिन विरोध-प्रदर्शन होते रहते हैं। इसी बीच, 29 अक्टूबर 2026 को बांग्लादेश में मानवता के खिलाफ अपराधों के एक और मामले में कड़ा फैसला सुनाया गया। देशव्यापी जन-आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के मामले में बांग्लादेश अवामी लीग के चार नेताओं को दोषी ठहराया गया। इनमें एक नेता को मौत की सजा और तीन अन्य को आजीवन कारावास का दंड दिया गया।
यह मामला जुलाई-अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ हुए व्यापक जन-आंदोलन से जुड़ा है। इसी आंदोलन के परिणामस्वरूप हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। वह फिलहाल भारत में रह रही हैं और नवंबर 2025 में उन्हें भी मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी।
बांग्लादेश के ढाका स्थित इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने उस समय अवामी लीग प्रमुख शेख हसीना और तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के लिए दोषी ठहराया था। हालांकि, न्यायाधिकरण के नाम में ‘इंटरनेशनल’ शब्द होने के बावजूद इसकी न्यायिक व्यवस्था और अधिकार क्षेत्र बांग्लादेश तक सीमित हैं। इसके सभी न्यायाधीश बांग्लादेशी नागरिक हैं।
संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक पैनल के अनुसार, 2024 के जन-आंदोलन के दौरान 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि लगभग 25,000 लोग घायल हुए थे। घायलों में बड़ी संख्या युवाओं की भी थी। इन घटनाओं ने बांग्लादेश की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया और हसीना सरकार के पतन का रास्ता तैयार किया।
ताजा फैसले में ICT ने अवामी लीग के संयुक्त महासचिव महबूबुल आलम हनीफ को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई है। उनके खिलाफ आरोपों में 2024 के जन-आंदोलन के दौरान कुश्तिया क्षेत्र में छह लोगों की हत्या से जुड़ी घटनाएं भी शामिल हैं।
न्यायाधिकरण ने अवामी लीग के पूर्व जिला अध्यक्ष सदर उद्दीन खान, जिला महासचिव अजगर अली और जिला स्तर के नेता अताउर रहमान अता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। उल्लेखनीय है कि इन चारों नेताओं के खिलाफ उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया और फैसला सुनाया गया, क्योंकि वे फिलहाल फरार हैं।
हनीफ पर आरोप है कि उन्होंने जन-आंदोलन को कुचलने के लिए तत्कालीन सरकार द्वारा लिए गए घातक फैसलों को लागू कराने में समन्वय की भूमिका निभाई थी। उन पर यह आरोप भी लगाया गया कि उन्होंने फोन पर बातचीत के जरिए जिला पुलिस प्रमुख और पार्टी कार्यकर्ताओं को हत्याएं करने के निर्देश दिए थे।
इससे पहले भी अवामी लीग के कई वरिष्ठ नेताओं को इसी तरह के मामलों में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। इनमें पार्टी के महासचिव ओबैदुल कादेर, बहाउद्दीन नसीम, मोहम्मद अली अराफात, शेख फजले शम्स पराश और मैनुअल हुसैन खान निखिल शामिल हैं।
अवामी लीग से संबद्ध छात्र संगठन छात्र लीग के दो नेताओं, सद्दाम हुसैन और शेख वली आसिफ एनन को भी 15 सितंबर के आदेश में दोषी ठहराया गया था। उन पर युवाओं के नेतृत्व वाले विद्रोह के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याएं करवाने का आरोप था।
न्यायाधिकरण के आदेश में कादेर, नसीम, अराफात, पराश और निखिल की निजी संपत्ति का 50 प्रतिशत जब्त करने का निर्देश भी दिया गया था। जब्त की जाने वाली संपत्ति का कुल मूल्य 50 करोड़ टका बताया गया है। इसका इस्तेमाल उन परिवारों को मुआवजा देने के लिए किए जाने की उम्मीद है, जिन्होंने प्रदर्शनों के दौरान अपने परिजनों या संपत्ति को खोया था।
मौत की सजा पाने वाले नेताओं के फरार होने के कारण बांग्लादेश में इस फैसले को लेकर राजनीतिक और कानूनी चर्चा तेज है। देश के कई लोगों का मानना है कि इनमें से कुछ दोषी भारत में छिपकर रह रहे हैं। हालांकि, उनके वर्तमान ठिकानों के संबंध में स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
पीड़ित परिवारों ने न्यायाधिकरण के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने ढाका में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सरकार से मांग की है कि दोषियों को वापस लाकर न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा दिलाई जाए। इनमें मौत की सजा पाए नेताओं को फांसी दिए जाने की मांग भी शामिल है।
पीड़ित परिवारों के लिए जुलाई-अगस्त 2024 की घटनाएं अब भी गहरे जख्म की तरह हैं। छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे देशव्यापी विद्रोह में बदल गया था। सरकार की ओर से हिंसक दमन के बावजूद आंदोलन थमा नहीं और अंततः करीब 15 वर्षों से सत्ता में रही शेख हसीना सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी।
5 अगस्त 2024 को हसीना बांग्लादेश छोड़कर भारत पहुंचीं। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली में अस्थायी रूप से शरण ली। उनके सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक व्यवस्था, न्यायिक कार्रवाई और पूर्ववर्ती सरकार के नेताओं की जवाबदेही को लेकर लगातार बहस जारी है।
78 वर्षीय शेख हसीना ने इस वर्ष दिसंबर तक बांग्लादेश लौटने की इच्छा जताई है। बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हसीना ने 5 अगस्त को नई दिल्ली से एक ऑडियो-लाइव प्रेस ब्रीफिंग के दौरान स्वदेश लौटने का अपना संकल्प दोहराया था।
इसके बाद उन्होंने कई मीडिया संस्थानों को लिखित साक्षात्कार दिए। इनमें उन्होंने बार-बार कहा कि वह अपनी इच्छा से बांग्लादेश लौटना चाहती हैं। उनके इन बयानों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता मिली। इसके विपरीत, बांग्लादेशी मीडिया पर इन घटनाओं को कवर करने या सामने लाने को लेकर प्रतिबंध लगाए जाने की बात कही गई है।
हसीना की मीडिया से बातचीत और उनके संभावित स्वदेश लौटने के बयानों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ढाका की मौजूदा सरकार ने भारतीय अधिकारियों के सामने इस बात पर असहमति जताई है कि हसीना को भारत में रहते हुए लगातार मीडिया से बातचीत करने की अनुमति क्यों दी जा रही है।
बांग्लादेशी प्रशासन के अधिकारियों का तर्क है कि हसीना अपनी मर्जी से वापस नहीं लौट सकतीं, बल्कि उन्हें बांग्लादेश लाया जाना चाहिए। उनके बयानों से यह भी संकेत मिलता है कि स्वदेश लौटने पर उन्हें मौत की सजा का सामना करना पड़ सकता है। ICT के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने के लिए निर्धारित 30 दिन की समय-सीमा समाप्त होने की बात भी कही गई है।
ढाका की सरकार चाहती है कि हसीना को वापस लाकर कानूनी कार्यवाही का सामना कराया जाए। इस मुद्दे का असर बांग्लादेश की विदेश नीति पर भी दिखाई देता है। ऐसा माना जा रहा है कि हसीना से जुड़ा विवाद उन कारणों में शामिल है, जिनकी वजह से तारिक रहमान ने अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए भारत के बजाय मलेशिया और चीन को चुना। भारत यात्रा के लिए वह अभी उपयुक्त समय का इंतजार कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि 5 अगस्त को आयोजित हसीना की प्रेस ब्रीफिंग एक स्वतंत्र प्रेस क्लब द्वारा आयोजित की गई थी और उसमें स्थानीय भारतीय अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं थी।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रीफिंग में व्यक्त विचारों को भारत सरकार के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। प्रवक्ता ने दोहराया कि हसीना और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भारत में ऐसी राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं है, जिनका निशाना कोई संप्रभु राष्ट्र हो।
भारत संयुक्त राष्ट्र के 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन और 1967 के प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। ये अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं शरणार्थियों के संरक्षण और उनके कुछ बुनियादी अधिकारों से संबंधित हैं। इसके बावजूद, शरण लेने वाले विदेशी राजनीतिक नेताओं के मामलों में भारत को कूटनीतिक, कानूनी और मानवीय पहलुओं के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
हसीना के मामले में भी नई दिल्ली के सामने यही चुनौती है। एक ओर बांग्लादेश की सरकार उन्हें वापस लाने और न्यायिक प्रक्रिया का सामना कराने की मांग कर रही है, वहीं दूसरी ओर भारत को अपने द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय छवि से जुड़े पहलुओं पर विचार करना है। ऐसे में हसीना को लेकर भारत का रुख केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री के भविष्य तक सीमित नहीं है। इसका असर दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों, आपसी विश्वास और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार और लेखक)

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