आगरा में 61.88 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य, पर्यावरणविदों ने मांगा स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट

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आगरा । बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती है। पौधों से भरे ट्रक निकल पड़ते हैं। अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं। नेता पौधे लगाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के नए दावे किए जाते हैं।

लेकिन कुछ महीने बाद वही धरती फिर सूनी दिखाई देती है। धूप पहले से ज्यादा चुभती है। सड़कों पर छांव कम होती जाती है। तब एक सवाल हर बार हवा में तैरता है, अगर हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो हरियाली आखिर गायब कहां हो रही है? क्या पेड़ धरती पर उग रहे हैं या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को महावृक्षारोपण अभियान के तहत 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। लगभग 30 सरकारी विभाग इसमें भाग लेंगे। उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां स्थापित करने की घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार का दावा है कि इस अभियान से नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेगा।

आगरा भी इस मुहिम का बड़ा हिस्सा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सभी विभागों को इसे जन आंदोलन बनाने के निर्देश दिए हैं। 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले में वृक्षारोपण होगा। स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और कॉलोनियों में “एक स्कूल-एक गांव” थीम पर पौधे लगाए जाएंगे। स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, महिला समूह और हजारों विद्यार्थी भी इसमें शामिल होंगे।

इस वर्ष आगरा को 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग 19.68 लाख और अन्य विभाग 42.20 लाख पौधे लगाएंगे। इससे पहले 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर भी लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे लगाए गए। वन विभाग का दावा है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं।

यहीं से सवाल शुरू होता है।

अगर इतने पौधे सचमुच जीवित हैं, तो आगरा पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखता? शहर का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है? सड़कों के किनारे छायादार पेड़ क्यों कम होते जा रहे हैं? हर मानसून के बाद नया अभियान शुरू करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ जमीन पर कम और सरकारी कागजों में ज्यादा दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि वृक्षारोपण की सफलता पौधे लगाने से नहीं, बल्कि तीन-चार साल बाद उनके जीवित रहने से मापी जानी चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व यमुना किनारे हुई घटना आज भी लोगों को याद है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने नदी की तलहटी में लगभग 12 हजार पौधे लगवाए थे। अगस्त में यमुना का जलस्तर बढ़ा और सभी पौधे बह गए। करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ दिनों में पानी में समा गई। इस मामले की जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन की पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें बचाना मुश्किल। तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, सुरक्षा, खाद और निगरानी के बिना अधिकांश पौधे शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाते हैं। पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल अक्सर भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि ताज ट्रेपेजियम जोन में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घटती गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, रिंग रोड, फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि ताजमहल की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक हरित पट्टी कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही ताजमहल और पर्यावरण की रक्षा के लिए किया गया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड में प्रदूषण रोकने, उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बनी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी हरित क्षेत्र बढ़ाने की सिफारिश की थी। उस समय उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की चादर ओढ़ेगा।

लेकिन तीन दशक बाद तस्वीर निराशाजनक है। टीटीजेड में वन और हरित आवरण घटकर लगभग छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2019 के बीच वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। कई तालाब और जलाशय सूख गए या प्रदूषण की चपेट में आ गए।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पेड़ लगाने के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर फटकार भी लगाई थी। दूसरी ओर अवैध पेड़ कटाई लगातार जारी रही। कई मामलों में अदालतों ने प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं ने हरियाली को लगातार निगल लिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी टीटीजेड में पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नोटिस जारी किया। हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म धूल कणों का स्तर बढ़ता गया। कई पर्यावरण विशेषज्ञ अब टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वृंदावन के पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज में बारह बड़े वन हुआ करते थे। आज उनकी पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और स्थानों के नाम तक सीमित रह गई है। जंगलों की जगह अब सीमेंट और कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है।

पर्यावरण प्रेमी एक और अहम सवाल उठाते हैं। जब हर साल एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, हवाई अड्डे, टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ जमीन घेर रही हैं, तब हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली जमीन आखिर आती कहां से है?

एक और मुश्किल बंदरों की है। शहर और गांवों में लगाए गए हजारों पौधे बंदर उखाड़ देते हैं। कई जगह पशु भी पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली, नियमित सिंचाई और निगरानी के बिना उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं होती।

ब्रज मंडल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पौधे लगाने की संख्या गिनना काफी नहीं है। हर पौधे को जियो-टैग किया जाए, उसकी तीन साल तक निगरानी हो और जीवित पौधों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए। तभी जनता को असली तस्वीर मालूम होगी।
पेड़ लगाना आसान है। पेड़ बनाना मुश्किल। एक पौधे को विशाल वृक्ष बनने में वर्षों लगते हैं। उसे पानी, सुरक्षा और देखभाल चाहिए। यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा नदारद दिखाई देती है।
इस मानसून भी लाखों पौधे धरती में रोपे जाएंगे। कैमरे फिर चमकेंगे। रिकॉर्ड फिर बनेंगे। भाषण फिर होंगे। लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी।

तब देश फिर वही सवाल पूछेगा; क्या इस बार पौधे सचमुच पेड़ बनेंगे, या हरियाली एक बार फिर सरकारी फाइलों की हरी स्याही तक ही महदूद रह जाएगी?

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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