यमुना किनारे बैठा शहर पानी-पानी होने से पहले प्यासा क्यों हो रहा है?

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कानपुर । अगर कोई कहे कि नदी किनारे बसा शहर प्यासा मर सकता है, तो शायद लोग हंस पड़ें। लेकिन आगरा की कहानी मज़ाक नहीं, एक कड़वी हक़ीक़त है।

जुलाई आ चुकी है। मगर बादल जैसे रास्ता भूल गए हैं। न बिजली की गड़गड़ाहट, न बारिश की फुहार। खेतों में किसान रोज़ आसमान निहारते हैं। घरों में पानी की बाल्टियां गिनी जा रही हैं। ट्यूबवेल पहले से ज़्यादा गहराई तक सांसें खींच रहे हैं। हर दिन बेचैनी बढ़ रही है।

यमुना ताजमहल के कदम चूमती हुई बहती है। लेकिन उसी शहर के लाखों लोग पानी के लिए परेशान हैं। कभी जीवन देने वाली नदी आज सीवर, फैक्ट्रियों के कचरे और सरकारी लापरवाही का बोझ ढो रही है। गर्मियों में उसका हाल किसी थके हुए मुसाफ़िर जैसा हो जाता है।

बारिश ने इस बार साथ नहीं दिया। लेकिन सारा इल्ज़ाम मौसम पर डाल देना भी अपनी ग़लती से आंखें चुराना होगा।

सच यह है कि हमने धरती के नीचे का पानी ऐसे लुटाया, जैसे वह कभी खत्म ही नहीं होगा। जहां नई कॉलोनी बनी, वहां नया बोरवेल खोद दिया गया। होटल बने, लॉन हरे हुए, फव्वारे चले, स्विमिंग पूल भर गए। किसी ने यह नहीं पूछा कि इतना पानी आएगा कहां से।

भूजल किसी खानदानी जायदाद की तरह नहीं होता। वह बैंक खाते की तरह होता है। निकासी करते रहिए, लेकिन जमा मत कीजिए। एक दिन खाता खाली हो ही जाएगा। आगरा आज उसी दिन के दरवाज़े पर खड़ा है।

शहर की आबादी पचास लाख के करीब पहुंच गई है। हर साल लाखों सैलानी भी आते हैं। उद्योग बढ़ रहे हैं। अस्पताल, स्कूल और नई कॉलोनियां फैल रही हैं। पानी की मांग रोज़ बढ़ रही है।
हमारे दादा-दादी मिट्टी के घड़े भरते थे। आज हम ओवरहेड टैंक, वॉशिंग मशीन, कार वॉश, कूलर और स्विमिंग पूल भरते हैं। आराम बढ़ा है। लेकिन पानी की कीमत भी बढ़ गई है।

खेती भी बदल गई है। कम पानी वाली फसलों की जगह ज़्यादा पानी पीने वाली फसलें आ गई हैं। मौसम बेवफ़ा हो रहा है। लागत बढ़ रही है। किसान मजबूरी में और गहरे बोरवेल खोद रहा है। धरती देती जा रही है। इंसान लेता जा रहा है। यह सौदा ज़्यादा दिन नहीं चलेगा।

शहर भी अब बारिश का दुश्मन बन गया है। जहां कभी मिट्टी पानी सोख लेती थी, वहां अब कंक्रीट बिछी है। सड़कें हैं, मॉल हैं, पार्किंग हैं। बारिश होती है तो पानी नालों में भाग जाता है। एक हफ्ते बाढ़ का शोर मचता है। अगले हफ्ते पानी की कमी का रोना शुरू हो जाता है।

सबसे बड़ा नुकसान हमने अपने तालाबों का किया।

कभी आगरा के आसपास लगभग हर गांव का अपना तालाब होता था। वही बारिश का पानी रोकता था। वही कुओं को जिंदा रखता था। वही मवेशियों की प्यास बुझाता था। आज कई तालाब नक्शों से तो नहीं, लेकिन ज़मीन से गायब हो चुके हैं। उन पर इमारतें खड़ी हैं या कूड़े के पहाड़।

हमने सिर्फ़ तालाब नहीं खोए। हमने सूखे से लड़ने की अपनी सदियों पुरानी अक्ल भी दफ़ना दी।

यमुना की सहायक नदियों का हाल भी कम दर्दनाक नहीं है। कहीं उन पर कब्ज़ा है, कहीं वे नाले बन चुकी हैं। नदी अकेले नहीं जीती। उसकी सहायक धाराएं उसकी सांस होती हैं। सांसें बंद हों तो सबसे ताकतवर इंसान भी नहीं बचता। यही हाल नदियों का भी है।

उधर शहर रोज़ लगभग 286 मिलियन लीटर सीवेज पैदा करता है। शोधन संयंत्र बढ़े हैं, लेकिन अभी भी बड़ी मात्रा में गंदा पानी यमुना में गिर रहा है। हम एक तरफ़ नदी से पानी मांगते हैं, दूसरी तरफ़ उसी में ज़हर घोलते हैं। इससे बड़ा विरोधाभास और क्या होगा?

फिर भी तस्वीर पूरी तरह मायूस करने वाली नहीं है।

आगरा ने शोधित जल के दोबारा इस्तेमाल की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। नौ सीवेज शोधन संयंत्र 220 एमएलडी से अधिक क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। तीन और बन रहे हैं। अब शोधित पानी खेतों, रेलवे, मेट्रो स्टेशनों, पार्कों और कीठम झील तक पहुंचाने की योजना आकार ले रही है।

जगनपुर-दयालबाग संयंत्र से किसान सिंचाई कर रहे हैं। पीलाखार का पानी वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजना में इस्तेमाल हो रहा है। धांधूपुरा, जगनपुर और बिचपुरी संयंत्रों से शोधित जल रेलवे, मेट्रो और कीठम झील तक पहुंचेगा। लगभग 93 करोड़ रुपये की इन परियोजनाओं से रोज़ 42 एमएलडी पानी दोबारा काम आएगा।

गंगा जल परियोजना ने भी कुछ राहत दी है। लेकिन सच यही है कि कोई भी पाइपलाइन इंसानी लापरवाही की भरपाई नहीं कर सकती।

सरकार अपनी जगह है। योजनाएं अपनी जगह हैं। लेकिन पानी बचाने का असली आंदोलन घर से शुरू होगा।

हर छत पर वर्षा जल संचयन होना चाहिए। हर तालाब को दोबारा ज़िंदा करना होगा। भूजल की अंधाधुंध निकासी रोकनी होगी। खेतों में कम पानी वाली खेती को बढ़ावा देना होगा। रिसती पाइपलाइनें ठीक करनी होंगी। यमुना के बाढ़ क्षेत्र और आर्द्रभूमियों को बचाना होगा।

इतिहास ने आगरा को ताजमहल दिया। यमुना ने उसे जीवन दिया। सवाल यह है कि क्या हम इस विरासत को बचा पाएंगे?

कमज़ोर मानसून असली मुसीबत नहीं है। वह तो सिर्फ़ ख़तरे की घंटी है। मुसीबत तब होगी, जब घंटी बजती रहे और हम यह सोचकर बैठे रहें कि अगला बादल आएगा और सारी परेशानियां अपने साथ बहा ले जाएगा।

बादल शायद फिर लौट आएं। लेकिन अगर पानी बचाने की अक्ल नहीं लौटी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेंगी।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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