आम आदमी का बच्चा लाठी खाए: नेताओं के बच्चे मौज उड़ाएं  

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दिल्ली। आजकल भारत में शिक्षा, परीक्षा घोटाले और युवाओं के भविष्य को लेकर जंतर मंतर पर जोरदार आंदोलन चल रहा है। ‘चलो संसद’ जैसे नारे लग रहे हैं, पुलिस की लाठियां पड़ रही हैं और छात्र सड़कों पर हैं। ठीक इसी माहौल में बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अपने बेटों इमाद और विवान के साथ जंतर मंतर पहुंचे। वे खड़े रहे, समर्थन दिखाया, लेकिन अपने बच्चों को आंदोलन का सक्रिय हिस्सा नहीं बनने दिया। यह दृश्य विपक्षी नेताओं की मानसिकता को बेनकाब करता है – वे आम आदमी के बच्चों से संघर्ष की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन अपने खून को जोखिम में नहीं डालते।

आम आदमी पार्टी (AAP) अक्सर दूसरों पर उंगली उठाती है, लेकिन जब मौका आया तो अरविंद केजरीवाल की बेटी हर्षिता या मनीष सिसोदिया के बेटे को इस प्रोटेस्ट में शामिल होते नहीं देखा गया। संजय सिंह की बेटी एशिता भी अब मुंबई में एक्ट्रेस बनने की राह पर है और विदेशी यात्राओं की तस्वीरें शेयर करती है। सवाल उठता है – यदि यह संघर्ष इतना पवित्र और सही है, तो इन नेताओं ने अपने बच्चों को क्यों नहीं झोंका? क्यों आम आदमी का बच्चा लाठी खाएगा, जबकि नेता का बेटा-बेटी सुरक्षित विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहा है?

यह दोहरा मापदंड विपक्ष तक सीमित नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी युवाओं के मुद्दों पर भाषण देते हैं, लेकिन उनके परिवार की अगली पीढ़ी आंदोलनों में सड़क पर उतरती नजर नहीं आती। इसी तरह, कई विपक्षी और सत्ताधारी परिवारों में बच्चों को विदेश भेजने का चलन आम है। जहां आम छात्र NEET, JEE जैसे घोटालों से जूझ रहे हैं, वहां नेता के बच्चे ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड या लंदन जैसे संस्थानों में पढ़ रहे हैं। केजरीवाल सरकार दिल्ली के सरकारी स्कूलों की तारीफ करती है, लेकिन खुद के परिवार की शिक्षा पर चुप्पी साध लेती है। सिसोदिया शिक्षा क्रांति के प्रतीक बने, लेकिन उनके बेटे की पढ़ाई पर भी सवाल उठते हैं।

विपक्षी दलों के और उदाहरण देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कई कांग्रेस और क्षेत्रीय नेताओं के बच्चे विदेशी यूनिवर्सिटी में हैं, जबकि वे भारत में ‘सिस्टम बदलो’ का नारा लगाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ प्रमुख विपक्षी परिवारों में बच्चे अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा भाजपा नेताओं पर आरोप लगाया जाता है – जहां मंत्री ‘स्वदेशी’ और ‘भारतीय शिक्षा’ की बात करते हैं, लेकिन उनके बच्चे विदेश जाते हैं। लेकिन विपक्ष खुद इस जाल में फंसा हुआ है। AAP के कई नेता, जो ‘आम आदमी’ की बात करते हैं, उनके बच्चे अब विदेश में हैं या सुरक्षित करियर बना रहे हैं।

यह hypocrisy क्यों? क्योंकि आंदोलन राजनीतिक लाभ के लिए है, न कि वास्तविक बलिदान के लिए। लाठी चार दिन पहले ‘काक्रोच पार्टी’ बनाने वाले अभिजीत दीपिके या आशुतोष रंका जैसे लोगों पर नहीं पड़ती। वे चाय पर चर्चा में व्यस्त रहते हैं, जबकि पब्लिक का बच्चा पुलिस की गोली-लाठी का शिकार होता है। दूसरी तरफ विजेता दहिया जैसे कार्यकर्ता लापता हो जाते हैं, बड़े नेताओं के बच्चे चुनावी उत्तराधिकारी बनकर तैयार किए जाते हैं।

भारतीय राजनीति में यह पैटर्न पुराना है। नेहरू-गांधी परिवार से लेकर क्षेत्रीय दलों तक, नेता अपने बच्चों को सुरक्षित रखते हैं। AAP ने ‘परिवर्तन’ का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आते ही उनके बच्चे भी उसी रास्ते पर चले गए। यदि संघर्ष सच्चा है, तो नेता पहले अपने बच्चों को आगे करें। उन्हें भी जंतर मंतर पर खड़ा करें, लाठियां खाने दें। या फिर सीधे कह दें कि यह सिर्फ वोट बैंक का खेल है।

आम आदमी थक चुका है इस दोहरेपन से। शिक्षा सुधार की बात हर नेता करता है, लेकिन अपना परिवार विदेश भेज देता है। प्रोटेस्ट में ‘देश बचाओ’ का नारा लगता है, लेकिन अपने बच्चे को जोखिम नहीं। समय आ गया है कि जनता इन नेताओं से जवाब मांगे – यदि रास्ता सही है, तो अपने बच्चों को भी इसमें शामिल करो। नहीं तो यह सिर्फ ‘डंडा पब्लिक खाएगी, नेता वोट और सत्ता बनाएगा’ वाला खेल है।

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