आंख खोलने वाली है हरेंद्र जी की ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ पुस्तक

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प्रभात मिश्रा

पटना। हरेंद्रजी प्रताप  से रिश्ते कितने पुराने हैं, उन्हें वर्षों में नहीं बल्कि घनिष्ठता से माध्यम से समझा जा सकता है। घोषित रूप से पहली बार 1985 में दिल्ली में आयोजित विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में मिला था। तब वह एबीवीपी के राष्ट्रीय मंत्री थे और मैं इंटर का छात्र। इस सम्मेलन में मैं पलामू जिला के नियंत्रक के रूप में भाग ले रहा था। इसकी वजह से कई मौकों पर उनसे मिलने का अवसर मिला। यहीं से निकटता बढ़ी। उनके बोलने का अंदाज, किसी भी विषय पर तर्क के साथ रखने की उनकी शक्ति ने मुझ जैसे किशोर को काफी प्रभावित किया। संभव है उन्हें भी मेरे अंदर कुछ खास दिखा होगा तभी तो उन्होंने मुझे छोटे भाई के रूप में स्वीकार किया और बड़े भाई की तरह स्नेह दिया।

अभी हाल में हरेंद्र जी की पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ प्रकाशित हुई है। बिहार, झारखंड, असम और बंगाल में जिस तरह से जनसंख्या के आंकड़ों में बदलाव आया है, उन परिस्थितियों पर यह पुस्तक आंख खोलने वाली है। किस तरह से हिंदुओं की संख्या कम हो रही है और मुस्लिमों व ईसाइयों की संख्या बढ़ रही है वह चौंकाने वाली तो हैं ही चिंताजनक भी हैं। हरेंद्र जी ने जिस तरह शोध और तर्क के साथ अपनी बातें व आंकड़े पेश किए हैं, उन पर सरकारी स्तर पर कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। लेखक का रिश्ता जिस विचारधारा से है, आज वह बहुत ही शक्तिशाली है। जिस राजनीतिक दल से कभी उनका जुड़ाव रहा है आज उसकी सरकार केंद्र में ही नहीं उन सभी राज्यों में है, जिनके चिंताजनक स्थिति की चर्चा इस पुस्तक में है। ऐसे में उम्मीद है कि सरकार इन आंकड़ों का इस्तेमाल कर ठोस कदम उठाएगी।

‘अटल जी और बांग्लादेशी घुसपैठ’ वाले हिस्से में लिखा गया है- 13 फरवरी 1964-राष्ट्रपति जी की अस्वस्थता के चलते, उपराष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के विरोध में बोलते हुए श्री अटल जी का भाषण-“भारत में जो पाकिस्तानी रहते है जिनकी संख्या का हमे पता है, हम क्यों नहीं उनसे भारत छोड़कर जाने के लिए कहते है। असम में पाकिस्तानी अवैध रूप से घुस रहे हैं और घुस आए हैं उनको निकालने में हमने कमी कर दी है, क्योंकि इससे पूर्वी पाकिस्तान में दंगे हो जायेंगे। दंगे तो पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे हैं। फिर भी हम असम से पाकिस्तानियों को निकालने में ढिलाई कर रहे है। 8 से 10 लाख तक पाकिस्तानी असम में बसे हुए हैं। पश्चिमी बंगाल में उनकी संख्या 4 लाख है। सारे देश में सन् 1961 की जनगणना के अनुसार 50 लाख पाकिस्तानी रह रहे है।” आज भी कमोबेश यही स्थिति है और वर्तमान सरकार के रहते यह चिंताजनक है।

पिछली बार जब हरेंद्र जी से दिसंबर 2023 में विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में ही मिला था। मिलते ही उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी किताब कहां मिलेगी?’ मैंने कहा कि अधिवेशन स्थल पर ही प्रभात प्रकाशन का स्टॉल लगा है। इस पर उन्होंने मेरे साथ ही जाकर किताब खरीदी। करीब 10-15 मिनट तक किताब देखने के बाद कहा, ‘तुमने काफी मेहनत और शोध किया है।’ आपके लिए मैं यह तो नहीं कह सकता पर इतना जरूर कहूंगा कि आपकी पुस्तक शोधकर्ताओं और एक्शन लेने वालों के लिए पाथेय का काम कर सकती है। पुस्तक का प्रकाशन ‘सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली’ ने किया है।

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