दिल्ली । के बाद भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया, जिसने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता के शिखर पर पहुँचा दिया और उसका अभूतपूर्व कायाकल्प किया। लेकिन इस राजनीतिक सफलता के समानांतर, वैचारिक और संगठनात्मक धरातल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मूल स्वरूप और उसकी छवि को लेकर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
आरएसएस को पारंपरिक रूप से ‘चरित्र निर्माण की पाठशाला’ माना जाता रहा है, जहाँ राष्ट्रवाद, सादगी और नि:स्वार्थ सेवा सर्वोपरि थी। स्वयंसेवकों की पहचान नैतिक बल और कड़े अनुशासन से होती थी। लेकिन हाल के वर्षों में, संघ के भीतर से या उससे जुड़े लोगों से भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के किस्से सामने आना बेहद चिंताजनक है। जब किसी ऐसी संस्था से भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं जिसका आधार ही नैतिक शुद्धता हो, तो आम जनता और समर्थकों के बीच गहरा वैचारिक संकट पैदा होता है।
निजी एनजीओ (NGO) का उदय और वैचारिक भटकाव
संघ का पारंपरिक दृष्टिकोण हमेशा से आत्मनिर्भरता और सीधे जन-संपर्क के ज़रिए सामाजिक कार्य करने का रहा है। वह विदेशी या कड़े कॉर्पोरेट फंड्स से चलने वाले एनजीओ (गैर-सरकारी संगठनों) मॉडल का खुलकर समर्थन नहीं करता था। लेकिन समकालीन परिदृश्य में यह देखा जा रहा है कि संघ के कई बड़े और प्रभावशाली पदाधिकारियों या उनके करीबियों ने अपने निजी एनजीओ बना लिए हैं। इन संगठनों के पास बड़े पैमाने पर सरकारी और कॉर्पोरेट (CSR) फंड आ रहे हैं।
यह बदलाव दो मुख्य चिंताओं को जन्म देता है:
हितों का टकराव (Conflict of Interest): सत्ता के करीब होने के कारण इन एनजीओ को मिलने वाला फंड पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
मिशन से भटकाव: जब सेवा का माध्यम ‘समर्पण’ के बजाय ‘संस्थागत फंडिंग’ बन जाता है, तो संगठन का मूल चरित्र बदलने लगता है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भाजपा के सत्ता में आने से संघ की वैचारिक नीतियों को देश में बड़ी स्वीकार्यता मिली है, लेकिन इस ‘पावर गेम’ में संघ ने अपनी वह साख दांव पर लगा दी है जो उसने सौ सालों की तपस्या से कमाई थी। सत्ता की नजदीकी अक्सर संगठनों में भौतिकवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। यदि आरएसएस ने इस आंतरिक क्षरण और पदाधिकारियों के ‘निजी हितों’ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया, तो वह केवल एक राजनीतिक दबाव समूह बनकर रह जाएगा और नैतिक मार्गदर्शन की अपनी अनूठी पहचान खो देगा।



