अयोध्या । संस्कृतियाँ स्मृतियों से अपना परिष्कार करती हैं। ये स्मृतियाँ अनुभवों के साथ चलती हैं। संकल्प के-सिद्धि के, संघर्ष के-सफलता के अगणित कथानक मनुष्यता के स्मृति-कोष में अनादि काल से संरक्षित हैं। हमारी आस्था इन्हीं स्मृतियों से जीवनी शक्ति प्राप्त करती है। मनुष्यता के विरुद्ध चला आता अमानवीय संघर्ष शताब्दियों से इन स्मृतियों के अमृतत्व को क्षीण करने में यत्नशील रहा है। कद्रू-विनता का द्वन्द्व, देवासुर-संग्राम, श्रीराम का वनवास और कौरवों द्वारा पाण्डवों की वञ्चना जैसे प्रसंग हमारे सांस्कृतिक स्मृति-कोष के ही पाठ हैं। किन्तु यह भारतभूमि आत्मोपासक ऋषियों की है, इसकी तत्त्वज्ञ ऋषि-परम्परा ने भारतीयों को अमृत-पुत्र होने का आत्मविश्वास दिया है। हम पीढ़ियों से ‘अमृतस्य पुत्राः वयम्’ का वेदमन्त्र दुहराते आये हैं। इसलिए जब युवराज बनाने का आमन्त्रण देकर श्रीराम को वनवास दिया गया तो माता कौशल्या ने उनके लिए स्वस्तिवाचन करते हुए कहा कि- ‘ हे पुत्र ! जो मांगल्य अमृत लाने जाते सुपर्ण के लिए विनता ने किया था, वही तुम्हारे लिए भी हो।’ यह हमारी चेतना का वह पक्ष है, जिसने भारत को असंख्य प्रतिकूलताओं में भारत बनाये रखा है।
तथापि, घात-प्रतिघात की ये कथाएँ कहीं समाप्त नहीं होतीं। देवासुर के संघर्ष का कोई युद्ध अन्तिम नहीं होता। युग बदलते हैं, कथाएँ बदलती हैं पर चरित्र नहीं बदलता, असुर सदा रहते हैं, उनका उपद्रव रहता है। ऐसा ही एक अवसर अभी देश के सम्मुख उपस्थित हो गया है। श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर में चढ़ावे की राशि के प्रबन्धन में सामने आये एक अवाञ्छित प्रसंग को आसुरी शक्ति ने व्यवस्था से उठाकर आस्था पर डाल दिया है। श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर में भगवान् श्रीरामलला की प्रतिष्ठा से हतप्रभ होकर मुरझाए खल-दल ने खरगोश की भाँति दौड़ लगाते हुए इस प्रसंग से आसमान गिरने जैसा दृश्य बना दिया है। राजनैतिक खरगोशों की इस पुकार से मीडिया के अन्य जीव-जन्तु भी घोर आर्त्तनाद करते हुए भागने लगे हैं। जिनका शरीर, सामर्थ्य और अनुभव सब खरगोश से कहीं अधिक था वे भी चीखने लगे हैं। एक त्रासदी जैसी उपस्थित कर दी गयी है। देश भर में दुःख, ग्लानि, पछतावा, अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप का क्रम चल पड़ा है। लगता है कि जैसे हम अपना स्वरूप, अपना अमृतत्व ही भूल से गये हैं। अपना स्वरूप का स्मरण ही न रहा हो। जबकि, उचित यह है कि हम किसी डर फैलाते खरगोश के पीछे भागना बन्द करें। जरा ठहरकर सोचें कि क्या सच में आसमान गिर रहा है, और यदि गिर ही रहा हो तो ये खरगोश हमें भगाकर आसमान के नीचे से निकालकर ले कहाँ जायेगा भला। ये एक रूपक है, हम खरगोश नहीं हैं। प्रत्येक भयावने स्वर से भीत होकर भागना हमारा कार्य नहीं होना चाहिए। हममें स्वरों की सच्चाई पहचानने की, अपने डर को समझने की योग्यता होनी चाहिये। यही योग्यता भय का समाधान देती है।
शताब्दियों के संघर्ष का सुफल है कि श्रीरामजन्मभूमि का पुनर्निमाण हुआ। प्रायः सम्पूर्ण देश ने इसका महोत्सव मनाया। परन्तु, कुछ लोग इस उत्सव का आनन्द नहीं ले सके। स्वाभाविक भी था गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा ही है – ‘चोरहिं चाँदिनि राति न भावा’ अर्थात् चोरों को चाँदनी रात अच्छी नहीं लगती। अस्तु, वे व्याकुल हुए लोग संशय के, षडयन्त्र के चमगादड़ उड़ाते रहे। मुहूर्त्त सही नहीं है, वास्तु सही नहीं है, अमुक को क्यों बुलाया, अमुक को क्यों नहीं बुलाया। पूरे देश ने ये तमाशा भी देखा। परन्तु श्रीराम से इस देश का सम्बन्ध सभी भौतिक विचारों की अपेक्षा अधिक प्रगाढ़ है। असंख्य-असंख्य श्रद्धालुजन देश-दुनिया से उमड़ पड़े। श्रीराम मन्दिर ने आस्था के, आह्लाद के और भारत-भाव के नये प्रतिमान गढ़ दिए।
अयोध्या के श्रीराममन्दिर का जो प्रसंग आज हमारे सम्मुख है, आइये उसकी वस्तुस्थिति समझते हैं। श्रीरामजन्मभूमि का निर्माण केवल उत्सव ही नहीं था, यह एक अवस्थापना थी। एक ऐसी अवस्थापना जिसका कोई प्रारूप पहले से हमारे पास नहीं था। संस्थागत रूप से अथवा व्यवस्थागत रूप से श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर जिन दायित्वों का निर्वाह करने जा रहा था, वे अभूतपूर्व थीं। उनका कोई अनुभवपरक उदहारण नहीं था। इतने दर्शनार्थी, इतनी दानराशि, इतना आवागमन और यह सब कुछ मन्दिर-निर्माण के ही मध्य चल रहा था। अभी मन्दिर-निर्माण पूर्ण होकर, व्यवस्था अपने अन्तिम रूप को स्थिर नहीं कर सकी थी तब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना संज्ञान में आ गयी। मन्दिर में दर्शानार्थियों द्वारा दानपेटियों में डाली जाने वाली भेंटराशि का संग्रह-संगणन करने वाले समूह में कुछ कर्मचारियों द्वारा धनराशि की चोरी के संकेत मिले। व्यवस्था ने इसे लक्ष्य किया, प्रशासन का सहयोग लिया गया और लोग पकड़े गये, चोरी की गयी धनराशि भी वापस लौटायी गयी। इस पूरे प्रसंग का प्रचार करने के स्थान पर व्यवस्था ने इसका समाधान करने पर ध्यान एकाग्र किया। तीर्थक्षेत्र के पदाधिकारयों समेत प्रशासन के यथापेक्षित सहयोग से पूरे प्रकरण का निस्तारण होने के पूर्व यह विषय किन्हीं राहु-केतु द्वारा, जो असुर होकर देवताओं की पंक्ति में आ मिले थे, इसका राजनैतिक विस्तार हो गया।
मन्दिर-प्रबन्ध स्वाभाविक रूप से राजनैतिक प्रपञ्चों के प्रति उत्तरदायी नहीं है, इसलिए उसने प्रतिक्रिया नहीं दी। उस शालीनता को भय और आशंका के रूप में परिभाषित किया गया। श्रीराम-मन्दिर प्रतिष्ठा से जिनकी अपनी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गयी थी, वे मैदान में कूद पड़े और चन्दा चोरी, चढ़ावा-चोरी जैसे जुमले मीडिया-ट्रायल में आ गये। यह देखना आश्चर्यजनक ही नहीं अत्यन्त त्रासद भी था कि मुख्य धारा के समाचार संस्थान वर्षों तक श्रीराममन्दिर का माहात्म्य-गान करके अपना बाजार-चमकाने के बाद उसी श्रीराम मन्दिर के विषय में उपजे प्रवाद का यथार्थ जानने का धैर्य नहीं रख सके। अपनी भाषा की मर्यादा तक बचाने का ध्यान उन्हें नहीं रहा। अनुप्रास गढ़ी हुई पंक्तियों वाली पत्रकारिता ने एक विरूपित सच को पूरे आस्थावान् समाज के माथे पर मढ़ दिया। कल्पित मनगढन्त आंकिक विवरण, लाखों-करोड़ों की चोरी, लूट, डकैती, गबन और घोटाले जैसे शब्द बाढ़ के पानी में मल के समान तैरने लगे। देश भर से दान-दाताओं की कतार खड़ी हो गयी, अपनी-अपनी दान की गयी वस्तुओं का विवरण माँगती हुई। यह अत्यन्त लज्जास्पद था। कुछ कर्मचारियों की चोरी, उनका अपराध, उनकी हीनता समझ में आती है। पर श्रीरामलला को लाखों-करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाने वाला समाज जिस आतुरता से आक्षेप के साथ सामने आया उसे देखकर लगा कि नैरेटिव कैसे किसी भी पुण्य को पाप में बदल देता है। यद्यपि सद्भावशील लोग भी थे पर वे या तो मौन रहे या मीडिया उन्हे सामने लाने से बचा। इस प्रकार एक प्रवाद देशभर में चल पड़ा।
राजनैतिक घात-प्रतिघात वाली इस दुनिया में जो चीज मनुष्य को बचाकर रखती है वह है आस्था। जब वह आस्था इतनी दुर्बल हो जाये कि कोई भी आरोप हमें विचलित कर दे, तो हमें स्वयं पर चिन्तन करना चाहिये। अयोध्या के श्रीराममन्दिर में भेंट की धनराशि के चोरी का प्रसंग एक अनूठा प्रसंग है। यह वस्तुमात्र की चोरी नहीं है, यह एक भाव का तिरस्कार है, यह विश्वास-परम्परा का अपमान है। इसके दोषियों को कठोरतम दण्ड दिया जाना उचित है। परन्तु यह चोरी है, मानवीय दुर्बलता और व्यवस्था की त्रुटि का एक उदाहरण है। इसको एक सामुदायिक अपराध के रूप में चिह्नित करना, इससे श्रीराममन्दिर की व्यवस्था और उसके प्रबन्धन से देश के विश्वास को भंग करना, चोरों से भी बढ़कर दुष्कृत्य है। यह अपराध प्रायः मास भर से हो रहा है। देश भर में तथाकथित नेता, पत्रकार और स्वयम्भू प्रवक्ताओं ने इस प्रसंग को अपनी प्रचार सामग्री की भाँति उपयोग किया है, यह लज्जास्पद है। प्रत्येक व्यवसाय का अपना लाभ-लोभ होता है, इसके पश्चात् भी सबकी एक व्यावसायिक-नैतिक प्रतिबद्धता भी होती है। उसका अभाव देखकर खेद होता है। चोरी की इस घटना की विस्तृत जाँच के लिए तीर्थक्षेत्र की माँग पर उत्तर प्रदेश शासन ने एक विशेष जाँच दल गठित कर दिया है। उसकी विस्तृत आख्या आना शेष है। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ने अपनी बैठक करके सभी आवश्यक निर्णय लिये हैं। दाताओं की आशंकाओं का समाधान किया है। तीर्थक्षेत्र के दो सदस्यों के नैतिक आधार पर दिए गये त्यागपत्रों के उपरान्त नये सदस्य भी लिए गये हैं। यह पूरा प्रकरण एक व्यवस्था में हुई त्रुटि का है, जिसमें दोषियों को दण्ड एवं इस अव्यवस्था के कारकों को चिह्नित करने तथा ठीक करने का दायित्व है। परन्तु, इसे राजनैतिक लक्ष्यसिद्धि हेतु जिस दुष्प्रचार में धकेला गया और चरित्रहनन की जो कूटयोजना चलायी गयी वह व्यवस्था के बहाने आस्था को ही दमित करने का कुचक्र है। जो लोग लुटेरे तैमूर और बाबर को नायक मानते आये हैं, वे श्रीराममन्दिर के सेवादारों को चरित्र प्रमाणपत्र देने लग गये हैं। जिनके लिए श्रीराम और उनकी जन्मभूमि का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अस्तित्व ही नहीं था, वे मन्दिर की शुचिता तथा श्रीराम की सेवा की आचार-संहिता पर बात करने लगे हैं। कहना कठिन है कि यह पाखण्ड किस नये आघात की पूर्वयोजना है।
एक आँधी सी चल पड़ी है, धूल ने आकाश ढक लिया है। पर ऐसा सदा नहीं रह सकता। वर्षा होगी, धूल कीचड़ होकर वहीं जा रहेगी, जहाँ से उड़ी थी। आकाश की स्वच्छता को सदा ढककर नहीं रखा जा सकेगा। किन्तु, इस बीच जो आतुरता, जो अविश्वास आस्थावान् समाज में दिखाई पड़ा है वह चिन्ताजनक और लज्जास्पद है। कदाचित् यही बिन्दु है जहाँ से हिन्दू-समाज को अपनी परीक्षा करनी चाहिए। अपने शत्रुबोध को परिभाषित करना चाहिए। अपने प्रति अपनी संशयशीलता के अभिशाप से उबरना चाहिए। जिन्होंने शताब्दियों तक श्रीरामजन्मभूमि से अयोध्या को वञ्चित रखा, उनके राजनैतिक वंशधर, उनके विचारों के पोषक अयोध्या के पथ-प्रदर्शक नहीं हो सकते, यह बोध स्पष्ट होना चाहिए। साधु-सन्त, सद्गृहस्थ और समस्त श्रद्धालु समाज को अयोध्या के गौरव के प्रति अपनी प्रतिज्ञा को पहचानना चाहिए। श्रीराममन्दिर में चोरी की घटना आकाश के गिरने की घटना नहीं है। यह एक निर्मित होती व्यवस्था के नितान्त प्रारम्भिक चरण में सामने आयी त्रुटि मात्र है, जिसे वही सुधार सकते हैं, जिनका पक्ष श्रीरामजन्मभूमि है-अयोध्या है। वास्तव में देवताओं को अमृत पीने से पहले ही राहु को पहचानना होगा। अन्यथा हमारा भूगोल-खगोल कटे हुए मुण्डों वाले अशुभ ग्रहों से भर जायेगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी सहकारिता किसी के कुचक्र से भंग न हो जाय। तीर्थक्षेत्र के लिए भी यह घटना एक पाठ हो सकती है कि जो आपको अयोध्या के भूगोल में मन्दिर बनाने से नहीं रोक सके, वे भाव के भूगोल में इस मन्दिर के ध्वंस का यत्न करते रहेंगे। आपको पत्थर ही नहीं पवित्रता बचाए रखने का भी भार उठाना होगा। अन्ततः, यह एक आसुरी प्रवञ्चना है, जो शुचिता की कुछ कमी से इतनी सांघातिक हो गयी। अब यह न दुहराए ऐसी व्यवस्था से संस्था एवं आस्था दोनों के मान की रक्षा हो सकेगी।
(लेखक पीठाधीश्वर, सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या हैं)



