दिल्ली। 27 फरवरी 2020 को जब दिल्ली दंगों की आग भड़क रही थी, तब राजदीप सरदेसाई ने इंडिया टुडे पर एक ‘ब्रेकिंग’ प्रसारित की। ताहिर हुसैन, जिसके घर की छत से पेट्रोल बमों की बौछार हो रही थी, ने दावा किया- “मैं घर में नहीं था, भीड़ घर में घुसने की कोशिश कर रही थी, पुलिस ने बचाया!” और राजदीप जी ने इसे ‘इंटरव्यू’ का नाम देकर हवा दी। वीडियो दिखाया, भावुक स्वर में पूछा, जैसे कोई निर्दोष शिकार पुलिस की क्रूरता का शिकार हो रहा हो।
अरे वाह! क्या पत्रकारिता है! एक ऐसे शख्स को, जिसकी छत से हिंसा हो रही थी, विक्टिम कार्ड थमा दिया। बाद में पता चला कि ताहिर हुसैन आप काउंसलर था, जिन पर आगजनी, हत्या और दंगे भड़काने के आरोप लगे। जुलाई 2026 में दिल्ली कोर्ट ने उन्हें आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में दोषी ठहराया- रीओटिंग, प्रमोटिंग एनिमिटी, मर्डर। घर की छत से पत्थर और बम फेंके गए, भीड़ को उकसाया गया, फिर भी राजदीप जी की नजर में ताहिर ‘पीड़ित’ थे।
ताहिर के घर के आस पास के लोगों से बातचीत का अवसर मिला था। वहां लोग पुरी कहानी सुना रहे थे लेकिन कैमरे पर बातचीत से डर जाते थे। यहीं रहना है। घर, दुकान, परिवार सब यहीं हैं, जान का खतरा हो सकता है, कुछ बोला तो। इतना खौफ था ताहिर का अपने आस पास के लोगों पर। राजदीप जैसे लोग जिन्होंने बड़े बड़े नेताओं के आगे पीछे करके अपनी पत्रकारिता चमकाई और उनकी बीवी ने तो अपनी चाटुकारिता का ईनाम भी तृणमूल से हासिल कर लिया। जब इन जैसे गिरे हुए पत्रकार किसी को गोदी मीडिया कहते हैं तो लगता है कि ये दोनों अपने मुंह पर ही आसमान की तरफ देखकर थूक रहे हैं।
यह वही राजदीप सरदेसाई हैं, जिन्हें ‘पत्रकार’ कहने से पहले ‘सर्देसाई पुत्र’ और ‘इंग्लिश स्पीकिंग एंकर’ जोड़ना पड़ता है। पिता का नाम, अच्छी अंग्रेजी और चैनल की आईडी- बस, यही क्वालिफिकेशन। असली जमीन पर उतरकर रिपोर्टिंग? नहीं, सिर्फ बड़े-बड़े लीडरों के सामने ‘सर’ बोलकर इंटरव्यू लेना और टीआरपी के लिए नाटक। किसान आंदोलन में देश-विरोधी ताकतों को ‘आंदोलनकारी’ बताना, सीएए-एनआरसी पर सांप्रदायिक एंगल थोपना, और दिल्ली दंगों में पुलिस-बीजेपी को दोषी ठहराने का पुराना खेल।
ताहिर हुसैन जैसे आरोपी को स्क्रीन पर लाकर ‘मॉब अटैक’ का ड्रामा रचना क्या है? सिस्टम को बदनाम करने की साजिश। जबकि तथ्य चीख-चीखकर कह रहे थे- ताहिर का घर दंगे का ‘कमांड सेंटर’ था। गवाहों ने कहा, भीड़ को उकसाया गया, हिंदू टारगेट किए गए। लेकिन राजदीप जी की ‘न्यूट्रल’ पत्रकारिता में ये सब ‘एकतरफा’ था। पुलिस पर सवाल, भीड़ पर संदेह, आरोपी पर सहानुभूति।
यह बेशर्मी नहीं तो क्या है? जब देश में दंगे हो रहे थे, तब कुछ ‘सेकुलर’ एंकरों ने ताहिर को ‘पीड़ित’ बनाकर नैरेटिव सेट करने की कोशिश की। आज जब कोर्ट ने सजा सुनाई है, तब इनके मुंह पर ताला क्यों? क्योंकि सच्चाई उनके ‘लिबरल’ एजेंडे के खिलाफ है। राजदीप सरदेसाई जैसे लोग पत्रकारिता को धंधा बना चुके हैं- जहां तथ्य नहीं, ‘नैरेटिव’ बिकता है। पिता का नाम, अच्छी अंग्रेजी और चैनल का माइक- यही उनका असली ‘क्रेडेंशियल’ है।
देश देख रहा है। ऐसे ‘पत्रकार’ जब ताहिर हुसैन जैसे दोषियों को बचाने की कोशिश करते हैं, तो असली पीड़ित- दिल्ली के दंगे में मारे गए निर्दोष- न्याय की आस में तरसते रहते हैं। राजदीप जी, शर्म करो। या फिर शर्म भी बिक चुकी है बाजार में?



