अब बेटी ससुराल नहीं, बेटा ससुराल जाएगा

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मोदी जी बदल दीजिए बेटी विदाई की रस्म।
अब कोई बेटी नहीं मरेगी!
नोएडा । सुनने में असामान्य सा लगने वाला ये वाक्य जल्दी ही सामान्य बन जाएगा, जब हम और आप मिलकर युगों युगों से चली आ रही इस प्रथा को खत्म करेंगे। बेटी का कन्यादान तो जरूर करेंगे पर बेटी विदा होकर वर पक्ष के घर ना जाकर वर के साथ अपने ही माता पिता के घर जाएगी। इस में अचंभित होने जैसा कुछ भी नहीं है।
जितना प्यार बेटों के हिस्से में है उतना ही प्यार बेटीयों के हिस्से में भी होना चाहिए। अब बेटियों के जन्म पर ढेरों ढ़ेर खुशियां मनाई जाएंगी। क्योंकि वो विवाह योग्य होने पर अपने माता पिता के लिए दामाद स्वरूप एक बेटा चुनकर लाएंगी और सब मिलकर साथ एक परिवार की तरह रहेंगे।
इससे भ्रूण हत्या पर भी अंकुश लगेगा। बेटा बेटी का फर्क खत्म हो जाएगा या यूं कहिए कि बेटियों को अब स्पेशल दर्जा मिलेगा।
“अगर एक बदलाव इतना कुछ बदल सकता है, तो बदलाव जरूरी है।”
नोटबंदी, धारा 370, राममंदिर निर्माण, पहाड़ों में रेल, पुल, टावर से लेकर गुफाएं और टनल क्या क्या नहीं बदला है? तो अब ये रस्म भी अवश्य बदलेगी। एक बेटी का बाप अब रोएगा नहीं हंसेगा कि मेरा दामाद घर आयेगा। बेटी विदाई की रस्म पर शहीद होने वाली उन सभी बेटियों के बारे में सोचकर देखिए कि दर्द का दामन कहां तक फैला हुआ हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी को इससे अच्छा समय बदलाव के लिए नहीं मिलेगा, ये ही सही समय है बेटियों के ये बलिदान जाया ना जाने दीजिए। आपके एक निर्णय से भारत का स्वरूप ही बदल जाएगा। आपके इस फैंसले से भारत विश्व में सम्मान पाएगा, सभी याद करेंगे कि था कोई प्रधानमंत्री जिसने डेढ़ सौ करोड़ जनता के बीच से उठी एक महिला की आवाज़ को सुना और दुनिया की बेटियों के प्रति उठे उसके उस दर्द को महसूस किया और उसकी प्रार्थना पर एक बड़ा बदलाब किया।
पार्लियामेंट  के किसी भी सत्र में इसकी चर्चा नहीं होगी और न ही कोई प्रस्ताव पारित होगा, और प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में वोटिंग का तो सवाल ही नहीं पैदा होता! तो बचा क्या? केवल और केवल आपका निर्णय।
सती प्रथा, बाल विवाह, जैसी बहुत सी कुरीतियों को आज 90 प्रतिशत तक कम किया जा चुका है, तो फिर ये क्यूं नहीं ?
नोटबंदी की तरह ये फैंसला सीधे न्यूज चैनलों पर प्रसारित होगा, ये आपका अपना निर्णय होगा बस आवाज़ मेरी है। अब एक प्रधानमंत्री को दुनिया बदलनी है, कानून बदलना है, रीति बदलनी हैं। विदाई की रीति!
भारतवासियों की खुशीयों, उम्मीदों और आशाओं को बिखरने नहीं देना है। ये डेढ़ सौ करोड़ की आवादी आपकी प्रजा है और आप इसके राजा हैं। तो फिर राजा का तो धर्म होना चाहिए कि जो कुरीति दिन प्रतिदिन भयभाह रूप लेती जा रही है उसे राजा जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए।
मैं ने जो भी कमेंट पढ़ें उनको पढ़कर मुझे एक और कमेंट लिखने के बदले ये प्रेरणा मिली कि मैं क्यूं ना ऐसे व्यक्ति को लिखूं या ऐसी जगह लिखूं जहां मेरी बात पर गहराई से विचार करके निर्णय लेने वाला कोई हो, तो वो आप हैं माननीय प्रधानमंत्री जी आप के अलावा कोई इस कुरीति को नहीं बदल पाएगा। एक ही बात को कितने रूपों में दोहराऊं, अर्थ एक ही निकल कर आ रहा है कि अब बस…
अब विदाई नहीं होगी या तो बेटी विवाहोपरांत पति के साथ माता पिता के ही घर में रहेगी या आजीवन विवाह ही नहीं करेगी। बात सुनने में अजीब लग जरूर रही है पर है नहीं।
अरे! दूसरे की चौखट पर जाकर जान देने से अच्छा है अपने माता पिता के घर में रहकर कमाकर खाना।

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संध्या शर्मा मिश्रा

संध्या शर्मा मिश्रा

बरेली निवासी साहित्यकार संध्या शर्मा मिश्रा ने एम.ए. (हिंदी) सहित पॉलीटेक्निक इन सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस एवं एन.टी.टी. की शिक्षा प्राप्त की। इन्होंने श्री राममूर्ति स्मारक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, इनवर्टिस इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज तथा आकाशवाणी बरेली में कार्य किया। विभिन्न साझा संकलनों और समाचारपत्रों में इनकी कविताएँ, कहानियाँ एवं लेख प्रकाशित हैं। भव्या फाउंडेशन, आगमन ग्रुप, सम्पर्क क्रान्ति परिवार आदि द्वारा सम्मानित।कविता, कहानी, लेख, विज्ञापन एवं स्लोगन लेखन उनकी प्रमुख रुचि है

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