
तथ्य साफ हैं। 2024-25 में ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के विवादित एपिसोड के बाद मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र साइबर सेल सक्रिय हुई। दिव्यांगों पर असंवेदनशील टिप्पणियों और अश्लील अंदाज को लेकर कई एफआईआर दर्ज हुईं। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में मामलों को रद्द किया, लेकिन तब तक नैरेटिव तय हो चुका था—यह ‘ह्यूमर’ नहीं, मर्यादा का उल्लंघन है। भाजपा समर्थक मंचों पर रैना और रणवीर इलाहाबादिया को निशाना बनाया गया। ‘लौंडे’ जैसे शब्द उसी बहस का हिस्सा बने। कार्यकर्ताओं ने रात-दिन पोस्ट किए कि ऐसी भाषा युवाओं को बिगाड़ रही है।
अब वही चेहरा सरकारी अभियान का हिस्सा है। 26 अगस्त 2026 को मुंबई के सह्याद्री गेस्ट हाउस में ‘डिजिटल अरेस्ट’ शॉर्ट फिल्म और ‘1930 महाराष्ट्र साइबर एंथम’ का लोकार्पण हुआ। फडणवीस ने कलाकारों को धन्यवाद दिया कि वे साइबर ठगी के खिलाफ जागरूकता फैला रहे हैं। रैना उनमें शामिल थे। मंच पर उन्होंने खुद मजाक उड़ाया—“महाराष्ट्र साइबर सेल से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। 1930 वाकई बढ़िया नंबर है, मैंने सेव कर रखा है क्योंकि अक्सर वहीं से कॉल आते हैं। पहली बार साइबर सेल वाले घर से उठाकर सम्मानित करने आए।” हंसी गूंजी, कैमरे चमके।
कार्यकर्ता की पीड़ा यहीं से शुरू होती है। जो भाई महीनों से ‘अभिव्यक्ति की सीमा’ पर पोस्ट कर रहे थे, उन्हें अब समझ नहीं आ रहा कि वैधता किसे मिली। कल तक जो भाषा अश्लील थी, आज वही भाषा सरकारी मंच पर ‘ह्यूमर’ बन गई। फडणवीस स्वयं पहले कह चुके हैं कि स्टैंड-अप कॉमेडी मर्यादा के न्यूनतम मापदंडों के साथ होनी चाहिए। कुणाल कामरा के मामले में ‘लो-लेवल कॉमेडी’ कहकर माफी मांगी गई थी। अब वही सरकार उसी धारा के कॉमेडियन को अपना चेहरा बना रही है।
भाजपा आईटी सेल वालों के लिए अब कुणाल कामरा या रणवीर इलाहाबादिया पर कुछ कहना खतरे से खाली नहीं। क्या पता कल वे भी किसी सरकारी अभियान में शामिल कर लिए जाएं। जंतर-मंतर की जेन-जी भाषा पर अब कैसे आपत्ति जताई जाए, जब समय जैसे ‘गालीबाज’ को अपने मंच पर बुलाकर सम्मानित किया जा रहा है? कार्यकर्ता सोच रहे होंगे—हम नैरेटिव की लड़ाई लड़ रहे थे, ऊपर से फैसला आ गया कि वही नैरेटिव सरकारी मुहर लगाकर चल सकता है।
यह दोहरापन महाराष्ट्र सरकार की शैली बनता जा रहा है। सिद्धांत तब तक सिद्धांत रहते हैं, जब तक फोटो-सेशन की जरूरत न पड़े। साइबर ठगी रोकना जरूरी है, जागरूकता अभियान भी सही है। लेकिन जिस व्यक्ति को कल तक संस्कृति का दुश्मन बताया गया, उसे आज उसी संस्कृति की रक्षा करने वाली सरकार का ब्रांड एंबेसडर बनाना विरोधाभास है। कार्यकर्ता पूछ रहे हैं-आखिर लड़ाई किससे थी? भाषा से, अंदाज से, या सिर्फ उस व्यक्ति से जो उस समय सत्ता के अनुकूल नहीं था?
‘जो अपना है वो दो कौड़ी का है’-यह हीनभावना भाजपा को बार-बार घेरती है। अपने कार्यकर्ताओं द्वारा खड़े किए गए नैरेटिव को सत्ता में आकर खुद ध्वस्त कर देना, फिर उनसे उम्मीद करना कि वे चुपचाप नए नैरेटिव को स्वीकार कर लें। समय रैना अब अश्लील नहीं रहे, क्योंकि सरकार ने उन्हें अश्लील न मानने का फैसला कर लिया। कार्यकर्ता अभी भी उसी कुर्सी पर बैठे हैं। बस कुर्सी अब थोड़ी और अकेली पड़ गई है।



