वह रायपुर ही अच्छा था…

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मनोज शुक्ला

रायपुर। जब शहर छोटा था, मगर दिल बहुत बड़ा था ,रायपुर से मुझे सिर्फ प्यार नहीं है, रायपुर से मुझे एक गहरा अपनापन है—बेइंतिहा अपनापन।क्योंकि रायपुर मेरे लिए सिर्फ एक शहर नहीं है। मेरा जन्म यहीं हुआ, यहीं पढ़ा-लिखा, स्कूल से कॉलेज तक की पढ़ाई यहीं हुई, छात्र राजनीति के रास्ते यहीं से निकला और दल की राजनीति में भी मेरी यात्रा इसी मिट्टी से शुरू हुई। मेरे जीवन की स्मृतियों का बड़ा हिस्सा रायपुर की गलियों, चौक-चौराहों, तालाबों, खेतों , मैदानों, स्कूलों, टॉकीजों, बाजारों और उन लोगों से बना है, जो अब शायद इस शहर के नक्शे पर भी दिखाई नहीं देते।
इसलिए जब मैं आज का रायपुर देखता हूं तो गर्व भी होता है और मन कहीं भीतर से उदास भी हो जाता है।रायपुर ने बहुत विकास किया है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या रायपुर का विकास उतना हुआ, जितना होना चाहिए था? क्या विकास की कीमत इतनी बड़ी होनी चाहिए थी कि शहर अपनी हरियाली, अपना पानी, अपनी हवा, अपनी पहचान और अपना सुकून ही खो दे?
रायपुर के नाम पर एक नई राजधानी बनाई गई और धीरे-धीरे ऐसा लगा जैसे मूल रायपुर को ही सौतेला समझ लिया गया। विकास हुआ, लेकिन उसके साथ जो साइड इफेक्ट आए, वे कई बार विकास से कहीं ज्यादा भारी दिखाई दिए। एक ऐसा रायपुर, जिसे हमने अपनी आंखों से देखा है।
आज का युवा शायद कल्पना भी नहीं कर सकता कि कभी टिकरापारा और संजय नगर जाने का नाम सुनकर रिक्शेवाला भी हिचकता था। शहर का कचरा संजय नगर के आसपास फेंका जाता था। बदबू इतनी भयावह होती थी कि वहां खड़ा होना मुश्किल लगता था।
टिकरापारा से थोड़ा आगे खड़े हो जाइए, तो मठपुरैना और भाठागांव दूर-दूर तक दिखाई देते थे। चारों तरफ मैदान,  हरियाली, मैदान और खेत।
उन मैदानों में रायपुर नलघर की लंबी-लंबी पाइपें हुआ करती थीं। हम बच्चे उनके भीतर दौड़ते हुए एक छोर से दूसरे छोर तक निकल जाते थे। रिंग रोड के आगे तो जैसे शहर खत्म हो जाता था। घर नहीं, दुकानें नहीं, कॉलोनियां नहीं—बस खदानें थीं। उस जगह को लोग गड़गड़ा कहते थे। दर्जनों गिट्टी क्रशर चलते थे और चारों तरफ लगातार गड़गड़-गड़गड़ की आवाज सुनाई देती थी।
सिद्धार्थ चौक से आगे पचपेड़ी नाका तक आते-आते शहर जैसे फिर खत्म हो जाता था। नगर निगम का नाका था और उसके बाद खाली जमीन। आगे लालपुर गांव। शैलेंद्र नगर तब शुरू भी नहीं हुआ था। खेत थे, मैदान थे, बगीचे थे। उसी रास्ते से राजेंद्र नगर होते हुए अमलीडीह निकल जाते थे।
दूधाधारी मंदिर के आगे तो दूर-दूर तक खेतखार था। कुकरीपारा का कुछ हिस्सा बसा था, बाकी खेत। पटेलिन की बाड़ी।
महाराजबंद तालाब के किनारे खड़े होकर देखिए—दूर-दूर तक खाली मैदान। रिंग रोड पर चलती हुई गाड़ियां भी दूर से साफ दिखाई देती थीं।
और तेलीबांधा से एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी तक? हरियाली ही हरियाली। खेत, खलिहान, पेड़ और खुला आसमान।
आज वहीं चारों तरफ बिल्डिंगें हैं, मॉल हैं, दुकानें हैं और कंक्रीट है।हरियाली गायब है। पेड़ बेतहाशा काटे गए और हम इसे विकास कहते रहे।
पहले बारिश होती थी, अब शहर डूबता है पहले 15-16 दिन तक झड़ी लग जाती थी। खारून नदी का पानी रायपुरा तक में घुस आता था, लेकिन शहर की सड़कों पर पानी जमा नहीं रहता था।
आज जरा सी बारिश होती है और कॉलोनियां, बाजार, गलियां और सड़कें तालाब बन जाती हैं।कहीं जलभराव, कहीं गड्ढे, कहीं जाम।
पहले शहर की सड़के सिंगल और सकरी थी फिर भी ट्रैफिक जाम कोई रोजमर्रा की समस्या नहीं थी। आज शहर के जिस हिस्से में निकल जाइए, गाड़ियों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं।हमने विकास तो किया, लेकिन क्या हमने पानी के बहने का रास्ता बचाया? हमने सड़कें चौड़ी कीं, लेकिन नालियां कितनी चौड़ी कीं?
हमने कॉलोनियां बनाई, लेकिन तालाब, नाले और प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते कितने बचाए?आज यही सवाल आज रायपुर के सामने खड़ा है।
जिस आंगन रात को सोने से  में तारे दिखते थे, वहां अब कंक्रीट दिखता है हम गर्मियों की रात में आंगन में खाट डालकर सोते थे।ऊपर आसमान में चांद और तारे साफ दिखाई देते थे। जुगनू दिखाई देते थे।हवा में मिट्टी की खुशबू थी।आज हवा में धूल और प्रदूषण है।
औद्योगिकीकरण और बेतरतीब शहरीकरण ने हवा का स्वभाव बदल दिया है।
पहले सौ फीट के भीतर पानी मिल जाता था। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुएं थे। पानी मीठा था।आज गर्मियों में जमीन के भीतर पानी लगातार नीचे जा रहा है।
जिस शहर की जमीन कभी पानी देती थी, वही जमीन आज पानी मांग रही है।
क्या इसे ही विकास कहेंगे?
हमारे स्कूलों में शिक्षा बिकती नहीं थी
आज शिक्षा एक बड़ा कारोबार बन गई है।लेकिन हमने वह समय देखा है जब सरकारी स्कूलों का अपना रुतबा था।
हिंदू हाई स्कूल, दानी स्कूल , जे एन पांडे जैसे स्कूलों में प्रवेश के लिए लंबी लाइनें लगती थीं। प्रवेश के लिए सिफारिशें और अप्रोच लगानी पड़ती थी।
राजकुमार कॉलेज, सेंट पॉल, कालीबाड़ी, भारत माता आदर्श स्कूल जैसे संस्थानों की अपनी प्रतिष्ठा थी। जहाँ उच्च व अभिजात्यवर्ग के बच्चे, शासकीय अधिकारी व कर्मचारी व व्यापारियों के बच्चे पढ़ते थे ।सप्रे स्कूल, आर.डी. तिवारी, शहीद स्मारक, बी.पी. पुजारी, कटोरा तालाब कन्या शाला जैसे स्कूल सामान्य परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा का मजबूत आधार थे।
और हमारे जैसे थोड़े शरारती, नेता टाइप छात्रों के लिए राष्ट्रीय स्कूल, लाखे स्कूल, आर.के. सिंधी स्कूल और गणपत सिंधी स्कूल जिंदाबाद थे!तब शिक्षा का अर्थ सेवा था।आज शिक्षा कई जगह व्यापार बन चुकी है। तब किताब जहां से मिले खरीद लो, कोई कमीशन की चिंता नहीं। आज स्कूलों की फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, बस और न जाने कितने खर्च—माता-पिता की कमर तोड़ देते हैं।
मॉल नहीं थे, लेकिन स्वाद था… और अपनापन भी आज होटल और रेस्टोरेंट की भरमार है। लेकिन उस समय मधु स्वीट के समोसे और मिठाइयों का स्वाद था।अल्का होटल का डोसा।
भागीरथी का पोहा, भजिया और लाल चटनी।भक्ता के छोले-भटूरे और लस्सी।
आजाद चौक के पांडे होटल का समोसा।
मंजू-ममता का डोसा, मलाई चाप और रसमलाई। रामजी हलवाई की नमकीन और बालूशाही।गंजपारा बाजार के महाराज की कचौड़ी।कोतवाली चौक के नागा महाराज की कचौड़ी और मूंग बड़ा।सुलभ दूध भंडार का पेड़ा, खोवा, जलेबी और रबड़ी।आमानाका में अम्मा का टिकली बड़ा।तेलीबांधा के जनता होटल का नाश्ता।टिकरापारा का शारदा होटल।गुप्ता का चना भेल जैसे अनगिनत ठिकाने थे,आज भी इनका स्वाद याद आते ही मुंह में पानी आ जाता है। तब दुकानें कम थीं, लेकिन स्वाद ज्यादा था।आज विकल्प ज्यादा हैं, लेकिन वह अपनापन कम है।
सिनेमा तब मनोरंजन नहीं, उत्सव था
मॉल नहीं थे। मल्टीप्लेक्स नहीं थे।
राज टॉकीज, श्याम टॉकीज, अमरदीप, आनंद, शारदा, जयराम, प्रभात और सम्राट टॉकीज हुआ करते थे। 80 पैसे या 1 रुपया 20 पैसे में लोअर की टिकट लेकर फिल्म देखने का आनंद ऐसा था कि आज 400 रुपये की मल्टीप्लेक्स टिकट भी वह आनंद नहीं दे पाती।
कभी कभी तो लोवर में फिल्म देखने के  लिए 80 पैसे भी नहीं होता था तब वीडियो सेंटर में जाकर  25 पैसे में जमीन में बैठकर वीडियो देखे थे और 50 पैसे में टीन के कुर्सी में बैठकर वीडियो देखे थे।शोभना वीडियो सेंटर सहित आउटर में अनेक वीडियो केंद्र था वहां पर चलता है नाम। स्कूल में परीक्षा का आखिरी दिन हो और उसके बाद फिल्म देखने निकलना—यह अपने आप में उत्सव था।फिल्म के बाद जी.ई. रोड या डी.के. हॉस्पिटल के कॉफी हाउस में डोसा खाना और दोस्तों के बीच खुद को बड़ा आदमी समझना—उस खुशी की कोई कीमत नहीं थी।
तब शहर छोटा था, लेकिन समाज बड़ा था सबसे बड़ा फर्क सिर्फ शहर में नहीं आया।हमारे समाज में आया है।
पहले पान की दुकान पर स्कूली बच्चे और युवा यूं ही खड़े दिखाई नहीं देते थे। अगर कभी कोई बच्चा वहां पहुंच भी गया और मोहल्ले के किसी बुजुर्ग, पड़ोसी, भैया या पिता के दोस्त को देख लिया तो ऐसे भागता था जैसे चोरी करते पकड़ा गया हो। बड़ों का डर नहीं, सम्मान था। आज चौक-चौराहों से लेकर आउटर की सड़कों तक तस्वीर बदल गई है। नशा, शराब, असामाजिक गतिविधियां और अनुशासनहीनता सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। लड़कियों सिगरेट ब बियर पीते खुलेआम दिखते है यह बदलाव केवल कानून का प्रश्न नहीं है।
यह परिवार, समाज और संस्कारों के कमजोर पड़ने का भी प्रश्न है।
रायपुर में अपराध बढ़ा, सुकून घटा
पुराने रायपुर में संसाधन कम थे, लेकिन लोगों में एक-दूसरे के प्रति भरोसा ज्यादा था।मोहल्ले में हर बच्चा किसी न किसी का बच्चा था।गलती करने पर सिर्फ पिता नहीं, पूरा मोहल्ला डांट देता था।
आज आदमी अपने पड़ोसी को पहचानता तक नहीं।
शहर बड़ा हुआ, घर बड़े हुए, गाड़ियां बड़ी हुईं, बाजार बड़े हुए—लेकिन कई जगह दिल छोटे हो गए।और इसी के साथ अपराध भी बढ़ा है, असुरक्षा बढ़ी है और सामाजिक दूरी भी।
क्या हम विकास की कीमत गलत तरीके से चुका रहे हैं?मैं विकास का विरोधी नहीं हूं।बिल्कुल नहीं।मुझे सड़कें चाहिए।
मुझे अच्छे अस्पताल चाहिए।मुझे आधुनिक स्कूल चाहिए।मुझे मॉल चाहिए।मुझे टेक्नोलॉजी चाहिए।
मुझे चौड़ी सड़कें चाहिए।मुझे आधुनिक परिवहन चाहिए।
लेकिन सवाल यह है—
क्या आधुनिक बनने के लिए हमें अपनी प्रकृति को मारना जरूरी है?
क्या विकास का मतलब हर खाली जमीन पर इमारत खड़ी करना है?
क्या विकास का मतलब हर तालाब के आसपास कंक्रीट बिछाना है?
क्या विकास का मतलब पेड़ काटना है?
क्या विकास का मतलब भूजल खत्म करना है?क्या विकास का मतलब सड़कों को गाड़ियों से भर देना और फिर फ्लाईओवर बनाते रहना है?क्या विकास का मतलब ऐसा शहर बनाना है जहां सांस लेने के लिए भी साफ हवा तलाशनी पड़े?नहीं।विकास वह है जिसमें शहर आधुनिक भी बने और रहने लायक भी रहे।
हमें वह पुराना रायपुर वापस नहीं चाहिए, लेकिन उसका स्वभाव जरूर चाहिएहम अतीत में वापस नहीं जा सकते। हमें जाना भी नहीं चाहिए।
टेक्नोलॉजी आगे बढ़ेगी। शहर बढ़ेगा। नई सड़कें बनेंगी। नई इमारतें बनेंगी। नई अर्थव्यवस्था आएगी। लेकिन इस विकास में पुराने रायपुर की हरियाली, पानी, हवा, अपनापन, सामाजिक अनुशासन, स्थानीय स्वाद और सांस्कृतिक आत्मा बची रहनी चाहिए।
हमने टिकरापारा का वह नाका देखा है।
हमने पचपेड़ी नाका देखा है।हमने तेलीबांधा देखा है।अमलीडीह देखा है।
मठपुरैना और भाठागांव का गांव देखा है। देवपुरी लालपुर बोरिया सरोना पुरैना चंगोराभाठा देखा है। भनपुरी का गांव वाला स्वरूप देखा है।तेलीबांधा तालाब के किनारे का बड़ा मौली माता मंदिर देखा है।सिटी बस रिक्शा और ऑटो में बैठकर तेलीबांधा, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से होते हुए टाटीबंध तक जाने वाला रायपुर देखा है।
हम भाग्यशाली हैं कि हमने वह रायपुर देखा है।एक ऐसा रायपुर जहां विकास कम था, लेकिन सुकून ज्यादा था।जहां घर छोटे थे, लेकिन आंगन बड़े थे।
जहां बाजार छोटे थे, लेकिन रिश्ते बड़े थे।जहां साधन कम थे, लेकिन संतोष ज्यादा था।जहां पेड़ ज्यादा थे और प्रदूषण कम।जहां तालाब ज्यादा थे और जलभराव कम।जहां आसमान दिखाई देता था और अब इमारतें दिखाई देती हैं।
रायपुर से मेरी शिकायत नहीं, मेरी चिंता हैमैं आज के रायपुर से नाराज नहीं हूं।
मैं अपने रायपुर को लेकर चिंतित हूं।
क्योंकि इस शहर को मैंने सिर्फ बढ़ते हुए नहीं देखा है, मैंने इसे बदलते हुए देखा है।मैंने खेतों को कॉलोनियां बनते देखा है।पेड़ों को गिरते देखा है।तालाबों को सिकुड़ते देखा है।खुले मैदानों को कंक्रीट में बदलते देखा है।कुओं को सूखते देखा है।सड़कों को जाम होते देखा है।हवा को बदलते देखा है।और सबसे ज्यादा—लोगों के जीवन से सुकून को धीरे-धीरे जाते देखा है।
आज भी रायपुर मेरा शहर है।
आज भी मुझे इससे उतना ही प्यार है।
लेकिन दिल से एक सवाल निकलता है
क्या हम ऐसा रायपुर नहीं बना सकते, जहां आधुनिकता भी हो और मिट्टी की खुशबू भी?जहां मॉल भी हों और पेड़ भी?जहां चौड़ी सड़कें भी हों और तालाब भी?जहां ऊंची इमारतें भी हों और खुला आसमान भी?जहां विकास भी हो और प्रकृति भी?जहां पैसा भी हो और अपनापन भी?क्योंकि अंततः हमें लौटना अपनी जड़ों की ओर ही है।
प्रकृति से काटकर किया गया विकास कुछ समय के लिए चमक सकता है, लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं सकता।
रायपुर को केवल स्मार्ट सिटी नहीं बनाना है।रायपुर को फिर से रहने लायक, सांस लेने लायक और दिल से जीने लायक शहर बनाना है।क्योंकि हमने वह रायपुर देखा है—जहां शहर छोटा था, मगर दिल बहुत बड़ा था।
और सच कहूं तो—मेरा बचपन वाला रायपुर आज के रायपुर से बहुत बेहतर था।वह रायपुर अब लौटकर नहीं आएगा।लेकिन उसकी हवा, हरियाली, पानी, संस्कार और अपनापन तो हम आज भी बचा सकते हैं।
सवाल सिर्फ इतना है—क्या हम विकास की रफ्तार थोड़ी धीमी करके आने वाली पीढ़ियों के लिए रायपुर की सांस बचाने को तैयार है।

— सोशल मीडिया से साभार

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