रामेश्वर मिश्र पंकज
दिल्ली । अपने को खुला रखें और ज्ञान को पूरी तरह विवेक पूर्वक स्वीकार करें तो आपकी बहुत सारी मान्यताएं बदल सकती हैं ।
इससे परेशान नहीं हों।
मैं स्वयं पहले अपने से गुरुजनों की बात सुनकर यह सोचता था कि हमारा 18वीं शताब्दी ईस्वी तक का इतिहास तो गौरवशाली है , हमने मुसलमानों को ठीक से पीटा है परंतु अंग्रेजों के आने के बाद हम बिखरते चले गए और हमने संगठन की सामर्थ्य खो दी ।
बाद में रामस्वरूप जी और सीताराम गोयल जी को पढ़कर उनसे मिलकर बातें कर कभी-कभी यह भी लगने लगा कि शायद मुसलमानो का भी कोई बहुत शक्तिशाली संगठन है इन दिनों।
यद्यपि हमें यह पता था कि हमने मुसलमान को किस तरह पीटा है और संसार में इतना अधिक मुसलमान को किसी ने नहीं पीटा जितना हिंदुओं ने और यह मैं पहले लिख भी चुका था फिर भी मैं कई मामलों में मुसलमान को भी भारत में समकालीन राष्ट्रीय जीवन में हिंदुओं से अधिक संगठित मानने लगा।अंग्रेजों और यूरोपीय ईसाइयों के संगठन का भी मैं अध्ययन करना चाहता था कि वह कैसे दुनिया में फैल गए ।
परंतु प्रोफेसर कुसुम लता केडिया जी से जब इसी विषय पर बातचीत हुई तो उन्होंने प्रमाणपूर्वक स्पष्ट दिखा दिया कि ईसाइयों को तो संगठन आता ही नहीं और मुसलमान तो कभी संगठित न थे , न है ,ना होने की संभावना है और पैशाचिक क्रूरता तथा अकस्मात लूटपाट के बलसे कुछ वर्ष तक वह बहुत जगह छा गए ।इससे उनकी बुद्धि की या संगठन की विशेषता नहीं प्रमाणित होती और तथ्यों और तर्कों के प्रकाश में मेरी यह समझ में आ गया और मैंने यह उनकी बात मान ली कि हिंदू समाज विश्व का सबसे संगठन कुशल समाज है और हिंदू स्वभाव से वीर योद्धा हैं ।
इसलिए हमें सदा अपने को खुला रखना चाहिए ।
अभी तक भी आपने जो कुछ सुना है या पुस्तकों में पढ़ा है वह अपने से बड़ों के द्वारा ही कही गई बात है।
परंतु यह मत मान लीजिए कि वही सब अंतिम बात है ।और भी नए लोग बड़े लोग , श्रेष्ठ लोग मिल सकते हैं। वह कुछ भिन्न बात कहते हैं तो उसे ध्यान से सुनिए।
तर्क और विवेक की कसौटी पर विवेचन कीजिए और फिर अपनी पूर्व स्थापना का आग्रह मत रखिए क्योंकि आप कोई भी स्थापना जन्म से लेकर नहीं पैदा हुए तो नया सीखने को भी सदा तैयार रहिए।



