अक्षय शर्मा
दिल्ली । साल 2014 भारतीय राजनीति का एक निर्णायक मोड़ था। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं का नया अध्याय भी था। देश ने ऐसे सपने देखे, जिनकी चर्चा वर्षों से होती रही थी भारत को विश्व पटल पर अग्रणी शक्ति बनाना, गरीबी और असमानता को कम करना, और एक ऐसा राष्ट्र खड़ा करना जहाँ अवसर केवल कुछ लोगों तक सीमित न रहें बल्कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचें।
इन वर्षों में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति मजबूत की है। दुनिया आज भारत को नई दृष्टि से देखती है और उसकी आर्थिक तथा रणनीतिक शक्ति को स्वीकार करती है। लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक मजबूती केवल उसकी बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती, बल्कि उससे तय होती है कि उसके भीतर समाज और व्यवस्था कितनी ईमानदार, समर्पित और वैचारिक रूप से मजबूत है।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है, क्या केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था बदल जाती है, या व्यवस्था के भीतर मौजूद लोग उस परिवर्तन की दिशा तय करते हैं?
समाज और राजनीति का एक कठोर सत्य यह है कि समय के साथ कई चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन उनका मूल चरित्र नहीं बदलता। विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता और अवसरवाद के बीच की रेखा अक्सर धुंधली कर दी जाती है। कल जो लोग एक विचार के समर्थक थे, वे आज परिस्थितियों और सत्ता की दिशा देखकर दूसरे पाले में खड़े दिखाई देते हैं। यह केवल राजनीति तक सीमित नहीं है; पत्रकारिता, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है।
पत्रकारिता, जिसे समाज का आईना कहा जाता है, उससे स्वाभाविक रूप से वैचारिक ईमानदारी और नैतिक साहस की अपेक्षा की जाती है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इस पेशे में अवसरवाद के उदाहरण कम नहीं हैं। ऐसे अनेक चेहरे समय के साथ अपनी भाषा, विचार और निष्ठा बदलते रहे हैं। जो कभी एक विचारधारा के पैरोकार थे, वे बदलते राजनीतिक माहौल के अनुसार दूसरी पहचान ओढ़ लेते हैं।
प्रश्न विचार बदलने का नहीं है,क्योंकि विचार समय, अनुभव और आत्ममंथन से विकसित हो सकते हैं। प्रश्न उस बदलाव के उद्देश्य का है। यदि परिवर्तन विश्वास और वैचारिक स्पष्टता से आया हो तो वह सम्मानजनक है, लेकिन यदि वह केवल पद, प्रभाव और स्वार्थ के लिए हो, तो वह समाज और विचार दोनों के साथ छल है।
यहीं वैचारिक और राष्ट्रवादी संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी होती है। समरसता और विस्तार आवश्यक हैं, लेकिन विस्तार और आत्मविस्मृति में एक महीन अंतर होता है। किसी भी विचार को मजबूत करने के लिए केवल संख्या नहीं, बल्कि निष्ठा, चरित्र और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। यदि संगठन अपने मूल विचार के लोगों को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने की बजाय केवल प्रभावशाली चेहरों को अपनाने लगें, तो धीरे-धीरे विचार की आत्मा कमजोर होने लगती है।
इतिहास गवाह है कि कठिन समय में वही लोग साथ खड़े रहते हैं जिनकी प्रतिबद्धता सिद्धांतों से होती है, व्यक्तियों या सत्ता से नहीं। जो लोग परिस्थितियों के अनुसार अपना रंग बदलते हैं, वे समय बदलने पर दिशा भी बदल लेते हैं। इसलिए किसी भी वैचारिक परिवार के लिए यह समझना आवश्यक है कि हर समर्थक समान नहीं होता और हर मुखर चेहरा विश्वसनीय नहीं होता।
आज भारत एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वैश्विक मंच पर बढ़ती प्रतिष्ठा के साथ-साथ भीतर वैचारिक स्पष्टता और नैतिक मजबूती की आवश्यकता पहले से अधिक है। राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों से नहीं होता; वह उन लोगों के चरित्र, निष्ठा और तपस्या से होता है जो विचारों को जीवित रखते हैं।
इसलिए पहचान जरूरी है व्यक्तियों की नहीं, प्रवृत्तियों की। यह समझना आवश्यक है कि कौन विचार से जुड़ा है और कौन केवल समय से। क्योंकि राष्ट्रों की सबसे बड़ी कमजोरी बाहरी चुनौतियाँ नहीं, बल्कि भीतर पनपता अवसरवाद होता है।
हमारे पूर्वजों ने जिन मूल्यों, त्याग और संघर्ष के आधार पर एक मजबूत भारत की कल्पना की थी, उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी आज की पीढ़ी पर है। दुनिया भारत की ताकत को स्वीकार करे, यह गर्व की बात है; लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम भीतर से उतने ही मजबूत हैं जितने बाहर दिखाई देते हैं।
क्योंकि अंततः राष्ट्र की असली शक्ति उसकी सीमाओं में नहीं, बल्कि उसके चरित्र और वैचारिक निष्ठा में बसती है।



