अदृश्य सेवा का योद्धा: अरुण मुखर्जी

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दिल्ली। मूलतः कानपुर के निवासी अरुण मुखर्जी एक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लंबे समय तक उन्होंने पत्रकारिता की। आज वे दिल्ली में रहकर बंगाली समाज के अधिकारों के लिए निरंतर आवाज उठा रहे हैं। जब तृणमूल कांग्रेस के अत्याचारों से त्रस्त होकर बड़ी संख्या में परिवार पश्चिम बंगाल छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो रहे थे, तब अरुण मुखर्जी ने दिल्ली में दो सौ से अधिक लोगों को अपने आश्रय में जगह दी। उन्होंने न केवल छत दी, बल्कि उनके पुनर्वास और सुरक्षा की व्यवस्था भी की।
लेफ्ट उदारवादी समूह अपने लोगों के छोटे-छोटे कार्यों का भी जोर-शोर से प्रचार करते हैं। अरविंद केजरीवाल जब संघ के स्वयंसेवक गोधिला जी के साथ काम कर रहे थे, तब उन्हें यह बात मानने में कठिनाई हुई कि समाज में ऐसे लोग भी हैं जो अपना पैसा खर्च करके निस्वार्थ सेवा करते हैं। अरविंद ने उन्हें एनजीओ और फंडिंग का गणित समझाया। गोधिला जी पुराने संघी थे, इसलिए उन्हें यह समझ नहीं आया कि समाज सेवा के नाम पर भी पैसा कमाया जा सकता है। अरविंद ने दिल्ली में रहकर न केवल धन अर्जित किया, बल्कि मुख्यमंत्री की कुर्सी भी हासिल की। दिल्ली की जनता के साथ उन्होंने क्या किया, यह लिखने की आवश्यकता नहीं।
अरुण मुखर्जी ने इतना कुछ करने के बावजूद कभी गर्व या अहंकार नहीं दिखाया। उनके अंदर कभी यह भाव नहीं आया कि “मैंने इतना बड़ा काम किया है।”
यदि यही काम किसी इरफान, गुफरान या मोहम्मद दीपक ने किया होता, तो अजीत अंजुम जैसे लोग ग्यारह हजार का शगुन देकर उनकी पंद्रह-बीस लाख की कमाई करा देते। कई यूट्यूबर ऐसे कामों से पैसा इकट्ठा कराकर अपना कमीशन भी लेते हैं। अजीत अंजुम कमीशन लेकर भी इतनी कमाई करा देते, तो लाभार्थी के लिए यह घाटे का सौदा नहीं होता।
यदि अरुण मुखर्जी ने भी बंगाल के पीड़ित हिंदुओं के प्रति समानुभूति न दिखाकर पचास बांग्लादेशी रोहिंग्याओं को अपने पास रख लिया होता, तो देशभर की मुख्यधारा की मीडिया और यू ट्यूबर्स के कैमरे उनकी ओर मुड़ जाते। अजीत अंजुम जैसा कोई अराजकता समर्थक यू ट्यूबर अरुणजी के लिए पैसे इकट्ठे कर रहा होता। वे कथित राष्ट्रीय नायक बन जाते। जो शाहीन बाग, किसान आंदोलन, जंतर मंतर जैसे किसी भी वामपंथ इको सिस्टम के इवेंट से दो—चार की संख्या में निकलते ही हैं। हो सकता था कि अरुण, रवीश कुमार के बाद एक और भारतीय पत्रकार के रूप में मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त कर लेते-पत्रकारिता के लिए नहीं, बल्कि रोहिंग्याओं को खिलाने के लिए।

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