अकादमिक चोगे में छिपा एजेंडा: प्रोफेसर अपूर्वानंद और बौद्धिक आतंकवाद का चेहरा

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आदर्श उपाध्याय

दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के हिंदी विभाग में बैठकर छात्रों को दिशा देने का दावा करने वाले प्रोफेसर अपूर्वानंद आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। लेकिन उनकी यह पहचान किसी महान साहित्यिक योगदान के कारण नहीं, बल्कि देश की जड़ों को खोखला करने वाले बयानों और समाज को बांटने वाली उनकी जहरीली सोच के कारण बनी है। अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों का चोगा ओढ़कर भारत की संप्रभुता और बहुसंख्यक समाज पर लगातार हमले करना इनकी पहचान बन चुका है। आलोचकों और प्रखर राष्ट्रवादियों के लिए अपूर्वानंद उस ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता के सबसे सटीक उदाहरण हैं, जो बंद कमरों और वातानुकूलित स्टूडियो में बैठकर देश के खिलाफ साजिशों का ताना-बाना बुनते हैं।

एक हालिया पॉडकास्ट में प्रोफेसर अपूर्वानंद ने जो घिनौना बयान दिया, उसने उनकी सोच की सारी सीमाएं पार कर दीं। हर हिंदू घर में ‘संभावित हत्यारा’ और ‘संभावित बलात्कारी’ देखने वाली यह कुत्सित दृष्टि किसी सामान्य व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक गहरे पूर्वाग्रह से ग्रसित एजेंडावादी की ही हो सकती है। जो व्यक्ति एक पूरे समाज को अपराधी और हिंसक घोषित करने की सनक रखता हो, वह दिल्ली विश्वविद्यालय में बैठकर युवा पीढ़ी को क्या शिक्षा दे रहा होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। यह बयान कोई आकस्मिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि बहुसंख्यक समाज को हीनभावना से ग्रसित करने और समाज में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की एक सोची-समझी क्रूर कोशिश थी।

यह कोई संयोग नहीं है कि जब 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की आग में झुलस रही थी, तब इस हिंसा की साजिश के तार अपूर्वानंद जैसे बुद्धिजीवियों से जाकर जुड़े। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा इनसे घंटों पूछताछ किया जाना इस बात का पुख्ता प्रमाण था कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में जो हिंसक तांडव रचा गया, उसे बौद्धिक हवा देने में इनका बड़ा हाथ था। सड़कों पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंकने वाले तो सिर्फ मोहरे थे, असली शतरंज के खिलाड़ी तो अपूर्वानंद जैसे लोग थे, जो ‘शांतिपूर्ण विरोध’ के नाम पर युवाओं को भड़का रहे थे और देश की राजधानी को बंधक बनाने की पटकथा लिख रहे थे।

अपूर्वानंद और उनके वामपंथी कुनबे का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि इन्हें देश की सेना, देश के कानून और देश की सुरक्षा एजेंसियों पर कभी भरोसा नहीं होता, लेकिन देश पर हमला करने वाले आतंकियों के प्रति इनकी संवेदनाएं तुरंत जाग जाती हैं। संसद हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को ‘आतंकी’ न मानना और उसकी फांसी पर विलाप करना इसी देशद्रोही सोच का हिस्सा है। मानवाधिकारों के नाम पर आतंकवादियों का मानवीयकरण करना और देश की न्यायिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना, अर्बन नक्सलवाद की सबसे बड़ी पहचान है। इनके लिए राष्ट्र की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती, इनका एकमात्र मकसद है – देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से खोखला करना।

प्रोफेसर अपूर्वानंद जैसे लोग अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर देश के टैक्सपेयर्स के पैसे पर पलते हैं, लेकिन वफादारी उस विचारधारा के प्रति निभाते हैं जिसका लक्ष्य भारत के टुकड़े-टुकड़े करना है। यह ‘बौद्धिक आतंकवाद’ बंदूक वाले आतंकवाद से कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह सीधे देश के युवाओं के दिमाग पर हमला करता है। अब समय आ गया है कि शिक्षा जगत में छिपे इन ‘अर्बन नक्सलियों’ के मुखौटों को पूरी तरह से उतार फेंका जाए और समाज को इनके इस जहरीले एजेंडे से सुरक्षित किया जाए।

(सोशल मीडिया से साभार)

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