– चुने गए सदस्यों का आरोप दो दशकों से महासभा अनाधिकृत नियंत्रण में
– स्वघोषित अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणी महाराज की पहचान और दस्तावेज पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं
नई दिल्ली : अखिल भारत हिंदू महासभा (ABHM) से जुड़ा एक लंबे कानूनी और प्रशासनिक विवाद की आगामी पांच अगस्त को पटियाला हाउस कोर्ट में अहम सुनवाई होगी। अखिल भारतीय हिंदू महासभा एक दशक से भी पुराना ऐतिहासिक महत्व वाला सामाजिक राजनीतिक संगठन है। महासभा के चयनित सदस्यों का आरोप है कि सबसे पुराने और राजनीनिक महत्व के हिंदुओं के इस अहम संगठन पर अनाधिकृत लोगों ने कब्जा कर रखा है। सदस्यों ने जारी एक बयान में कहा कि उन्होंने न्यायपालिका से आग्रह किया है कि वह हिंदु महासभा की संपत्तियों और दस्तावजों पर कब्जा करने वाले स्वामी चक्रपाणि नाम के व्यक्ति की पहचान और सदस्यता की गंभीर पड़ताल करें।
मालूम हो कि अखिल भारतीय हिंदू महासभा की चयनित सदस्यों में श्री दिनेश चंद्र त्यागी को वर्ष 2006 में संगठन के वैध राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चुना गया। उनका दावा है कि लीडरशिप को लेकर चल रही कानूनी चुनौती के बावजूद, स्वामी चक्रपाणि ने भारत के चुनाव आयोग और मीडिया के सामने खुद को ABHM के अधिकृत पदाधिकारी के रूप में पेश किया। चुनी हुई टीम का यह भी आरोप है कि बाद में संगठन के नाम और प्रतिष्ठा का इस्तेमाल निजी हितों के लिए किया गया, जिससे लंबे समय तक कानूनी मुकदमे और प्रशासनिक विवाद हुए।
इस मामले को संगठन के अंदरूनी विवाद से कहीं आगे का मामला बताते सदस्यों का कहना है कि महासभा के नये चयनित सदस्यों ने लीडरशिप ने सभी दस्तावेज़ी सबूतों की पारदर्शी न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इसके नतीजे का असर ऐतिहासिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे पर पड़ेगा। यह मामला अभी नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में चल रहा है और अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 को तय की गई है।
इस मामले को संगठन के अंदरूनी विवाद से कहीं आगे का मामला बताते सदस्यों का कहना है कि महासभा के नये चयनित सदस्यों ने लीडरशिप ने सभी दस्तावेज़ी सबूतों की पारदर्शी न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इसके नतीजे का असर ऐतिहासिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे पर पड़ेगा। यह मामला अभी नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में चल रहा है और अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 को तय की गई है।
प्रेस बयान में स्वघोषित अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि की पहचान पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें उन दस्तावेजों का हवाला दिया गया है जो कथित तौर पर अदालत के सामने पेश किए गए हैं। महासभा के चयनित सदस्यों के अनुसार वर्ष 2005 में जारी राशन कार्ड में “चक्रपाणि महाराज” की पहचान बी. लाल के बेटे के रूप में की गई है, जिनका जन्म वर्ष 1933 है। हालांकि, उनका आरोप है कि 2007 में जारी पासपोर्ट में व्यक्ति का जन्म वर्ष 1975 दर्ज है, जिसमें जनार्दन देव और श्याम प्यारी देवी को उनके माता-पिता के रूप में नामित किया गया है। वे इसके तुरंत बाद जारी एक गजट अधिसूचना की ओर भी इशारा करते हैं, जिसमें कथित तौर पर बी. लाल के बेटे राजेश श्रीवास्तव से स्वामी चक्रपाणि महाराज में नाम परिवर्तन दर्ज है, जबकि उनका दावा है कि गजट में दी गई जानकारी पासपोर्ट और पहले के राशन कार्ड, दोनों से अलग है।
चयनित लीडरशिप ने वर्ष2012 में जारी जन्म प्रमाण पत्र और वर्ष 2022 में फिर से जारी पासपोर्ट का भी जिक्र किया है, और आरोप लगाया है कि इन दस्तावेजों में व्यक्ति के माता-पिता और पहचान के संबंध में और भी विसंगतियां हैं। उनका दावा है कि चक्रपाणि जी महाराज के मूल जन्म पहचान स्थापित करने वाला कोई ठोस दस्तावेजी सबूत अदालत के सामने पेश नहीं किया गया है और आरोप है कि स्थायी आवासीय पते के बजाय ABHM के पंजीकृत कार्यालय के पते का उपयोग करके कई पहचान दस्तावेज जारी किए गए थे।
अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्यों का यह भी कहना है कि अदालतों ने पिछले कुछ सालों में संगठन में किसी व्यक्ति की सदस्यता और चुनाव से जुड़े मामलों की जांच नहीं की है। उनका यह भी दावा है कि तथाकथित स्वामी चक्रपाणि ने वर्ष 2012 और 2022 में सुप्रीम कोर्ट में जो अपीलें दायर की थीं, उन्हें खारिज कर दिया गया था। इसके अलावा, चुनी हुई लीडरशिप ने धार्मिक संस्थाओं से जुड़े घटनाक्रमों का ज़िक्र करते हुए आरोप लगाया है कि भले ही अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने 2018 में स्वामी चक्रपाणि को ब्लैकलिस्ट कर दिया था, लेकिन बाद में जूना अखाड़ा ने उन्हें जगद्गुरु शंकराचार्य घोषित कर दिया। प्रेस बयान में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है और कानूनी कार्यवाही चल रही है। बयान में स्वामी चक्रपाणि या उनके प्रतिनिधियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं थी।



