नरेन्द्र कुमार वर्मा
दिल्ली । दिल्ली के जंतर-मंतर पर चलने वाला कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त हो गया। इस आंदोलन को देश के जेन जी आंदोलन के नाम पर खड़ा करने का प्रयास किया गया जो कुछ हद तक सफल भी रहा। नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने इस आंदोलन ने कई अहम सवाल खड़े करने का काम किया। इन सभी सवालों के जवाब अगर नहीं तलाशे गए तो भविष्य में इससे भी बड़ा आंदोलन पृथकतावादी ताकतें खड़ा कर सकती है।
इस आंदोलन का इंफ्रास्ट्रक्चर इस तरह से तैयार किया गया कि देश की खुफिया एजेंसियों को भी भनक नहीं लगी। नेपाल, बंग्लादेश, श्रीलंका और हांगकांग में युवाओं के प्रदर्शन का विश्लेषण हमारी खुफिया एजेंसियों ने तो नहीं किया। मगर आम आदमी पार्टी ने पडोसी देशों में होने वाले इन आंदोलनों का बहुत गहराई के साथ विश्लेषण किया। आम आदमी पार्टी के कॉडर से जुड़े एंथ्रोपोलॉजिस्टों की टीम ने समाज को भ्रमित करने के लिए बेहद होशियारी के साथ डीएससी फॉर्मेट का इस्तेमाल किया। डीएससी यानि डिस्टर्बेंस (उपद्रव) सेंसिटिविटी (भावुकता) और कन्फ्यूजन (भ्रम) के व्दारा समाज के एक तबके को जंतर मंतर पर जुटाने का काम किया।
यह बात सारा देश जानता था कि कॉकरोच जनता पार्टी के चार प्रमुख चेहरे अभिजित दीपके, सौरभदास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका आम आदमी पार्टी की बनाई पिच पर खेल रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि देश की खुफिया एजेंसियों के पास इनके इतिहास से जुड़ी कोई जानकारी पूर्व में नहीं थी। इनके आंदोलन के शुरूआती दिनों में जब जंतर-मंतर पर भीड़ नहीं जुट पाई तो सरकार विरोधी रेमन मैग्सेसे पुरस्कार लॉबी सक्रिय हुई। जिसके बाद सोनम वांगचुक को एक डील के तहत अनशन के लिए लाया गया। इसके बाद बॉलीवुड सितारो को उनकी भारी भरकम फीस चुका कर जंतर-मंतर पर लाकर माहौल को तैयार किया गया। इसके बाद भी जब बात नहीं बनी तो एनआरसी और सीएए के विरोधियों को जंतर-मंतर पर पहुंचने को कहा गया।
आंदोलनकारियों ने पूर्व में ही इस बात का अध्ययन कर रखा था कि आंदोलन आरंभ होते ही दिल्ली पुलिस डिजिटल सेंसरशिप लगा देगी। लिहाजा आंदोलनकारियों ने बड़ी संख्या में ऐसे मोबाइल ऐप का इस्तेमाल भीड़ जुटाने के लिए किया गया जो बिना इंटरनेट के आसानी से चलते है। दिल्ली पुलिस की साइबर सेल अब इस बात का विश्लेषण कर रही है कि बड़ी संख्या में ब्रिजफाई, फायरचैट, बिट चैट और ब्रायर जैसे मोबाइल ऐप जंतर मंतर पर कैसे सक्रिय थे।
कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने आंदोलन के दौरान 20 हजार से ज्यादा इंस्टाग्राम रिल्स को अपलोड किया। जिन्होंने समाज में एक बड़ा भ्रम फैलाने और सरकार के खिलाफ माहौल खड़ा करने का काम किया। दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन कहे जाने वाला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इन इंस्टाग्राम रीलों के जवाब में चंद वीडियो भी नहीं बना पाया। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की सोशल मीडिया सेल भी पंगु हो गई और हाथ पर हाथ रख कर बैठी रही। मेजदार बात यह है कि बीजेपी की सोशल मीडिया टीम पर प्रति माह करोड़ो रूपया खर्चा होता है।
अब बात करते है इस आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले जेन जी की। दरअसल 90 के दशक में पश्चिम देशों के कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित समाज शास्त्रियों ने जेन जी वर्ल्ड को इजाद किया। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि 15 से 25 साल के युवा को रोजगार, शिक्षा, भाषा, खानपान, पहनावा, जीवन जीने के अंदाज और स्वयं फैसले लेने के आधार पर आसानी से भड़काया जा सकता है। उनके गुस्से और मुद्दों को हवा देकर सरकारों के सामने संकट पैदा किया जा सकता है। भारत में 1999 से 2012 के बीच पैदा होने वाले बच्चों को जेन जी के दायरे में रखा गया। दुनिया के कई देशों नें इस पीढ़ी के बाद अब एंथ्रोपोलॉजिस्ट जेन वाई और जेन एक्स की अवधारणा पर भी काम कर रहे हैं।
सीजेपी के आंदोलन में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट के कुछ छात्र शुरूआत में अवश्य नजर आए। मगर धीरे-धीरे उन्हें समझ में आ गया कि यह आंदोलन नीट के मुद्दे पर है ही नहीं। छात्रों की संख्या घटने के बाद जामिया, जेएनयू के छात्रों ने मोर्चा संभाल लिया। इस दौरान बड़ी संख्या में एनसीआर से छात्र और राजनीतिक दलों के लोग जंतर मंतर पहुंचना शुरू हो गए। 20 जुलाई को सीजेपी के संसद मार्च के आव्हान से पूर्व कई नेताओं ने संसद के भीतर घुसने और पुलिस पर आक्रमण करने के लिए छात्रों का भड़काया। पुलिस के साथ झड़प में घायल छात्रों में कोई भी नीट या अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं का छात्र नहीं है पुलिस इसकी तस्दीर कर चुकी है।
दरअसल सीजेपी के आंदोलन के दो दिन बाद ही कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों को इस बात का भान हो गया था। यह मूवमेंट नीट के लिए नहीं बल्कि सरकार के विरोध के लिए खड़ा किया गया। इस आंदोलन को इस तरह के डिजाइन किया गया कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। पहले से ही यह तय था कि पत्रकारों को कौन शिकार बनाएंगा। यूट्यूबर्स को कौन भगाएगा। सोशल मीडिया पर लगातार कितनी पोस्ट की जाएंगी। आंदोलन स्थल पर खान-पान की व्यवस्था को कैसे संभाला जाएगा। भीड़ को कैसे और किस-किस रास्ते से लाया जाएगा। कौन सा ग्रुप सरकार और मोदी विरोधी नारों की अगुवाई करेगा। कौन सा ग्रुप आंदोलन के समर्थक नेताओं को सुरक्षा चेन बना कर मंच तक लाएगा। मोदी विरोधी संगठनों से जुड़े नेताओं को कब-कब मंच पर लाया जाएगा। कौन सा ग्रुप किस तरह के पोस्टर बैनर बनाएंगा और हवा के खिलाफ बात करने वाले पत्रकारों और यूट्यूबर्स के खिलाफ कौन सा ग्रुप आवाज उठाएगा। इस तरह की सभी व्यवस्थाओं को आंदोलन के डिजानर्स ने बड़ी जिम्मेदारी से संभाला।
इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे चार प्रमुख लोग अभिजित दीपके, आशुतोष रांका, सौरभदास और विजेता दहिया सभी विदेशों से पढ़े लिखे है। यह सभी विदेश में ही नौकरी पर थे। सभी आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। इस आंदोलन में भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए गए और वंदे मातरम से परहेज किया गया। आंदोलन स्थल पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ घन-घोर आपत्तिजनक नारे लगाए गए जिन्हें पहले से ही तैयार करके लाया गया था।
अंत में बात करते है धर्मेन्द्र प्रधान के त्यागपत्र की। सरकार ने धर्मेन्द्र प्रधान का त्यागपत्र इसलिए लिया कि आंदोलनकारी हिंसक न हो जाएं। सरकार को इस बात की जानकारी मिली थी कि अगर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया तो आंदोलनकारी हिंसक हो उठेंगे। आपको ध्यान होगा कि दिल्ली के जंतर-मंतर के 500 मीटर के दायरे में संसद, मंत्रियों के बंगले, सरकारी दफ्तर, पुलिस थाना और बहुत सारे कॉरपोरेट ऑफिस है।आंदोलनकारियों की मंशा इन्हें निशाना बनाने की थी। आंदोलनकारियों की भीड़ में बड़ी संख्या में वह लोग थे जिन्होंने 2020 में दिल्ली में दंगा कराने का साजिश रची थी। अगर सरकार धर्मेद्र प्रधान का त्यागपत्र नहीं लेती तो आंदोलनकारी किसी भी हद तक जा सकते थे। दुर्भाग्य से अगर ऐसा हो जाता तो नरेन्द्र मोदी की छवि का भारी नुकसान पहुंचता।



